आत्मकथा भाग-3 अंश-22
पुस्तक लेखन
बैंक के कार्य के साथ ही मेरा पुस्तक लेखन का कार्य भी चल रहा था। अपनी पहली प्रमुख पुस्तक ‘रैपिडेक्स कम्प्यूटर कोर्स’ के बाद मैंने अपनी पुस्तकें सीधे कम्प्यूटर पर टाइप करने का कार्य स्वयं करने का निर्णय किया था। इससे मेरा बहुत-सा समय बच सकता था और कार्य भी मेरी पूर्ण संतुष्टि के अनुसार अच्छे से अच्छा हो सकता था, क्योंकि कहावत है- ”आप काज महा काज“। इसलिए मैंने एक कम्प्यूटर खरीदना तय किया। पहले की तरह पुराना (सेकेंड हैंड) कम्प्यूटर लेने की बजाय मैंने एकदम नया और नवीनतम काॅनफिगरेशन वाला कम्प्यूटर लेना तय किया, जिससे कि वह लम्बे समय तक काम दे सके।
मेरे मित्र श्री मनीष श्रीवास्तव, जिन्होंने मेरी रैपिडेक्स वाली पुस्तक तैयार की थी, कम्प्यूटर असेम्बल भी किया करते थे। मैंने यह कार्य उनसे ही कराया। उन्होंने कम्प्यूटर के सभी भाग मौलिक खरीदे और विश्वसनीय डीलर से खरीदे। इस प्रकार असेम्बल करके मुझे जो कम्प्यूटर मिला, वह बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। मेरी आगामी सभी किताबें उसी पर तैयार हुईं।
प्रारम्भ में मैं हिन्दी ठीक से टाइप नहीं कर पाता था। केवल तर्जनी उँगली का उपयोग करके एक-एक अक्षर टाइप करता था। इसमें समय अधिक लगता था। इसलिए मेरे मित्र श्री प्रवीण कुमार ने मुझे सलाह दी कि मैं हिन्दी टाइपिंग सीख लूँ। यह सलाह मुझे जँच गयी। मैंने अपनी पुरानी किताबों के ढेर में से हिन्दी टाइपिंग सिखाने वाली किताब खोज ली, जो कभी मेरी बहिन सुनीता ने अपने लिए खरीदी थी। वह किताब यहाँ बहुत काम आयी। उसी किताब के आधार पर मैंने अपने ही कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर हिन्दी टाइपिंग सीखना प्रारम्भ कर दिया। सौभाग्य से मात्र 30 दिन में मैं पर्याप्त रूप में हिन्दी टाइपिंग सीख गया। बाद में धीरे-धीरे मेरी गति भी बढ़ गयी और अब तो मैं किसी भी अन्य टाइपिस्ट की तरह हिन्दी में टाइप कर लेता हूँ। इस उपयोगी सलाह के लिए मैं प्रवीण जी का बहुत आभारी हूँ।
प्रारम्भ में मेरे पास केवल एक प्रकाशक मै. पुस्तक महल की पुस्तकों का आदेश था। उन्होंने अपनी ‘रैपिडैक्स कम्प्यूटर कोर्स’ नामक पुस्तक को नये साॅफ्टवेयर विंडोज 95 और एमएस-ऑफिस के अनुसार लिखवाया था। इसमें इंटरनेट एक्सप्लोरर पर भी जोर दिया गया था। इस पुस्तक का केवल टाइटिल पुराना था, सारी सामग्री पूरी तरह नयी थी जो मैंने कड़ी मेहनत से तैयार की थी। प्रारम्भ में उस पुस्तक पर मुझे केवल 6 प्रतिशत रायल्टी देने का एग्रीमेंट हुआ था, वह भी बिक्री मूल्य पर। इस प्रकार वह वास्तव में केवल 4 प्रतिशत के बराबर थी।
मैं इतने पर भी संतुष्ट रहता, अगर वे राॅयल्टी का भुगतान करते, परन्तु उन्होंने कानूनी कठिनाइयों का बहाना करके एग्रीमेंट बदल दिया और केवल पेज के हिसाब से भुगतान करने को तैयार हुए। मुझे बहुत निराशा हुई। परन्तु मैं एक नया लेखक था और अधिक जोर नहीं दे सकता था, इसलिए मन को समझा लिया। मैंने उनके लिए 5-6 पुस्तकें और लिखीं। सभी का भुगतान पेजों के अनुसार हुआ। फिर मेरा मन उनसे उचट गया और मैंने उनके लिए पुस्तकें लिखना बन्द कर दिया। वैसे भी उनके पास मेरे लिए अधिक काम नहीं था।
फिर मैंने अन्य प्रकाशकों से सम्पर्क बनाना प्रारम्भ किया। सबसे पहले तो अपने पुराने प्रकाशक मै. विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा के लिए बच्चों की पुस्तकें तैयार कीं। कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों के लिए ‘बाल कम्प्यूटर शिक्षा’ नामक सीरीज लिखी, जिन पर मैंने अपने बजाय अपनी श्रीमती जी का नाम लेखिका के रूप में दिया। ये पुस्तकें अंग्रेजी में भी छपीं।
इनके अलावा मै. विद्या प्रकाशन, मेरठ की अनेक पुस्तकों को मैंने लिखा। उन्होंने पहले से ‘कम्प्यूटर टुडे’ नामक सीरीज कक्षा 1 से कक्षा 10 तक के विद्यार्थियों के लिए किसी और से लिखवाकर छाप रखीं थीं। उन सभी को मैंने फिर से लिखा और अपना ही नाम लेखक के रूप में दिया। ये पुस्तकेें अंग्रेजी में भी छपीं और उन पर भी मैंने अपना नाम दिया। हालांकि इन सभी पुस्तकों का भुगतान भी मुझे पेजों के अुनुसार ही मिला, क्योंकि प्रकाशक के अनुसार बच्चों की पुस्तकों में राॅयल्टी देना सम्भव नहीं होता।
फिर मै. विद्या प्रकाशन ने मुझसे उत्तर प्रदेश बोर्ड के हाईस्कूल के विद्यार्थियों के लिए कम्प्यूटर की पुस्तकें लिखवायीं। ये पुस्तकें भी हिन्दी में थीं। पर इन पर मैं राॅयल्टी लेने के लिए अड़ गया और कुछ ना-नुकर के बाद वे भी तैयार हो गये। वे एक बार में एक पुस्तक की लगभग 5000 प्रतियाँ छपवाते हैं और उनकी राॅयल्टी पेजों के अनुसार किये जाने वाले भुगतान से अधिक ही होती है। इस तरह यदि राॅयल्टी का भुगतान सही-सही किया जाये, तो लेखक फायदे में ही रहता है। परन्तु सभी प्रकाशक इसके लिए तैयार नहीं होते।
वास्तव में प्रकाशक किसी लेखक को एक मामूली बेरोजगार व्यक्ति से ज्यादा नहीं समझते। वे यह मानते हैं कि जिस आदमी के पास कोई काम और पूँजी नहीं होती, केवल ज्ञान होता है, वही लेखक बनता है और उसको मूँगफलियाँ खिलाकर मनचाहा काम कराया जा सकता है। उनके लिए पुस्तकें बेचने की कला ही महत्वपूर्ण है, लिखने की कला दो कौड़ी की भी नहीं है। यही कारण है कि पुस्तक विक्रेताओं को 35-40 प्रतिशत तक कमीशन देने को तैयार रहने वाले प्रकाशक लेखक को 5 प्रतिशत राॅयल्टी देने में भी रोते हैं। लेखक भी मजबूर होता है, इसलिए कुछ कर नहीं पाता। परन्तु मेरे साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी। इसलिए मैं अपनी शर्तों पर ही लिखता था और अभी भी लिखता हूँ। बीच-बीच में कई प्रकाशकों ने मुझसे पुस्तकें लिखवाने के लिए सम्पर्क किया, परन्तु मेरी शर्तों को सुनकर भाग खड़े हुए। वैसे भी मैंने यह तय कर रखा था कि किसी नये प्रकाशक के लिए नहीं लिखूँगा, क्योंकि उनका बेचने का नेटवर्क अच्छा नहीं होता। उनसे पारिश्रमिक भी कम मिलता है।
मनीषा का विवाह
सन् 2000 में कानपुर वाले भाईसाहब श्री सूरजभान की दूसरी पुत्री मनीषा का विवाह निश्चित हुआ। वह झाँसी मेडीकल कालेज से एम.बी.बी.एस. कर चुकी थी, परन्तु पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में एडमीशन न होने के कारण लगभग बेरोजगार थी। उसका विवाह उसकी बड़ी बहन डा. समीक्षा के ननदेऊ कानपुर के श्री अश्वनी कुमार गुप्ता ने तय कराया था। उसकी सगाई होने की तारीख तय हो चुकी थी और आगरा से डा. समीक्षा तथा उसके पति डा. अनुपम भी आ गये थे। परन्तु भाईसाहब ने इस कार्यक्रम में हमें नहीं बुलाया। हमें तो कुछ पता ही नहीं था कि क्या हो रहा है। जब सगाई का कार्यक्रम पूरा हो गया, तब दूसरे दिन भाईसाहब ने हमें मिठाई भिजवायी।
हमें उसका विवाह तय होने की प्रसन्नता थी, परन्तु अपनी उपेक्षा पर बहुत गुस्सा भी आया। पूरे खानदान से केवल हमारा परिवार कानपुर में था, इसलिए हमें जरूर बुलाना चाहिए था। परन्तु भाईसाहब ने बहाना बनाया कि कार्यक्रम अचानक तय हुआ था और बुलाने का समय नहीं था। यह बात भी झूठ थी, क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों की तैयारी में ही घंटों लग जाते हैं और केवल एक बार फोन कर देने पर मात्र 15 मिनट में हम पहुँच सकते थे। संयोग से मुकेश भी उस दिन कानपुर में ही था और यह बात भाईसाहब को मालूम थी, क्योंकि वह भी डा. समीक्षा और डा. अनुपम के साथ ही आगरा से उसी गाड़ी में आया था। परन्तु उसको भी नहीं बुलाया गया और न कुछ बताया गया। यह एक प्रकार से हमारा अपमान ही था। इसलिए मैंने तय कर लिया कि मैं मनीषा की शादी में नहीं जाऊँगा और न शादी का कोई काम करूँगा। परन्तु जब विवाह का दिन आ गया और आगरा-मथुरा से ढेर सारे रिश्तेदार भी आ गये, तो लोकलाज के कारण मजबूरी में मुझे भी जाना पड़ा। वैसे भी बीमार आदमी का दिल दुखाना अच्छा नहीं होता।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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