आत्मकथा भाग-3 अंश-21

नये ए.जी.एम. साहब
उन्हीं दिनों हमारे कानपुर मंडल में नये सहायक महाप्रबंधक आये। वे थे श्री शिव नन्दन प्रसाद सिंह (संक्षेप में, श्री एस.एन.पी. सिंह)। वे भी बिहारी थे, लेकिन पिछले साहब श्री एस.के. सिन्हा की तुलना में एकदम विपरीत थे। उनका स्वभाव बहुत मधुर था और एक मधुर मुस्कान हमेशा उनके चेहरे पर खेलती रहती थी। इनकी विशेषता यह थी कि वे किसी को छुट्टी देने से मना नहीं करते थे। इसी विशेषता के कारण वे सभी अधिकारियों में बहुत लोकप्रिय थे। मेरे ऊपर भी उनका बहुत स्नेह था। प्रारम्भ में शायद मेरी क्षमताओं में उनको कोई सन्देह था, लेकिन तभी मैंने एक कार्य ऐसा किया कि उनको मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास हो गया।
हुआ यह कि पहले बैंकों की शाखाओं में आपस में जो लेन-देन होता था, वह दो प्रकार से होता था। एक तो यह कि एक शाखा दूसरी शाखा के नाम जमा सूचना (क्रेडिट एडवाइस) जारी करती थी, जिसकी पावती दूसरी शाखा पहली शाखा को भेज देती थी। दूसरा तरीका यह था कि एक शाखा दूसरी शाखा को नामे सूचना (डेबिट एडवाइस) जारी करती थी और दूसरी शाखा उनको उतनी राशि का क्रेडिट एडवाइस भेजकर लेन-देन पूरा कर देती थी। इनमें पहली विधि पूरी तरह सुरक्षित थी, क्योंकि लेन-देन शीघ्र ही पूरा हो जाता था। परन्तु दूसरी विधि बहुत गड़बड़ थी, क्योंकि दूसरी शाखा लापरवाही से या जानबूझकर किसी कारण से अपनी क्रेडिट एडवाइस नहीं भेजती थी। इससे वह राशि पहली शाखा के बकाया वसूली खाते में पड़ी रहती थी, जिसे बिल्स रेमिटेड खाता (बी.आर. खाता) कहा जाता था। ऐसा प्रायः तब होता था जब किसी बाहरी शाखा का चेक जमा किया जाता था और उसका भुगतान पहले ही कर दिया जाता था।
लगभग सभी शाखाओं में बी.आर. खाते में एक बड़ी राशि इकट्ठी हो गयी थी, जिसकी वसूली नहीं हो रही थी। इसलिए बैंक ने पहला निर्णय तो यह किया कि डेबिट एडवाइस पूरी तरह खत्म कर दिये। केवल क्रेडिट एडवाइस जारी होने लगे। दूसरा निर्णय यह किया कि बी.आर. खाते में जितनी भी पुरानी प्रविष्टियाँ थीं, उनको समाप्त करने का आदेश दिया। इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी कानपुर मंडल में मुझे दी गयी। हमारे तत्कालीन मुख्य प्रबंधक श्री पटनायक इसकी देखरेख कर रहे थे। उन्होंने सभी शाखाओं से बी.आर. खाते में बकाया प्रविष्टियों की सूची मँगायी और उसको कम्प्यूटर में भरने के लिए मुझे भेज दिया। उस समय हमारे मंडल में लगभग 20-22 करोड़ की रकम इस खाते में पड़ी हुई थी।
मैंने इस सूची को कम्प्यूटर में भरकर उस डाटा के आधार पर सभी शाखाओं के लिए पत्र छपवाये और उनसे तत्काल प्रविष्टि समाप्त करने का अनुरोध किया। जो रकम किसी खातेदार से वसूली जानी थी, वह भी वसूलने का आदेश दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मात्र एक माह के अन्दर ही यह सारी रकम प्राप्त हो गयी और बी.आर. खाता लगभग खाली हो गया। इस कार्य में बैंक का अधिक खर्च भी नहीं हुआ, केवल एक-एक बार शाखाओं को पत्र भेजने का ही खर्च हुआ। इस कार्य से हमारे सहायक महाप्रबंधक महोदय बहुत प्रसन्न हुए और मेरी क्षमताओं में उनको विश्वास हो गया।
मंडलीय कार्यालय में कम्प्यूटर शिक्षा
उस समय तक हमारे बैंक के सभी मंडलों में लगभग सभी विभागों में पी.सी. लगा दिये गये थे और अधिकारी तथा कुछ बाबू भी उन पर कार्य करते थे। कार्य अधिकतर एमएस-ऑफिस पैकेज पर किया जाता था, जिससे पत्र, रिपोर्ट, चार्ट आदि तैयार किये जा सकते थे। कई अधिकारियों ने यह कार्य अपने ही स्तर पर सीख लिया था और कई को प्रशिक्षण भी दिया गया था। फिर भी वे इस कार्य में कई बार कठिनाई अनुभव करते थे। जब भी मैं अपने कम्प्यूटर सेंटर से मंडलीय कार्यालय जाता था, तो वे अपनी कठिनाइयाँ मुझे बताते थे और मैं उनका समाधान कर दिया करता था।
तभी कुछ लोगों ने अनुभव किया कि उन्हें एमएस-ऑफिस में कार्य करने के बारे में बाकायदा प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता है। उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि मैं उन्हें प्रशिक्षित कर दूँ। उनको इस कार्य के लिए बैंक से छुट्टी देना सम्भव नहीं था और कार्यालय समय में सब एक साथ खाली हों ऐसा होना भी कठिन था। इसलिए हमने यह तय किया कि शाम को 4.30 बजे मैं रोज मंडलीय कार्यालय आ जाया करूँगा और फिर 5.30 या 6.00 बजे तक उनको प्रशिक्षण दूँगा।
ऐसा ही किया गया। मैंने कम्प्यूटर के प्रारम्भिक ज्ञान से प्रारम्भ करके एमएस-ऑफिस सिखाना शुरू कर दिया। इस प्रशिक्षण में पहले 10-12 लोग आ जाते थे। परन्तु धीरे-धीरे यह संख्या 7-8 पर सिमट गयी। इनमें सबसे अधिक उत्साह से मुम्बई वाली श्रीमती नेहा नाबर भाग लेती थीं। कभी-कभी हमारे स.म.प्र. महोदय श्री एस.एन.पी. सिंह भी कक्षा में बैठ जाते थे। मेरी पढ़ाने की शैली का उनके ऊपर अच्छा प्रभाव पड़ता था। यह प्रशिक्षण लगभग एक माह चला और इतने समय में वे लोग काफी सीख गये। इससे कार्यालय का काम भी सुचारु रूप से चलने लगा। मेरा विचार दूसरा बैच शुरू करने का था, परन्तु उसके लिए पर्याप्त लोग नहीं आये, इसलिए वह शुरू ही नहीं हुआ।
बैंक में पूर्ण कम्प्यूटरीकरण
उस समय तक हमारे बैंक की कुछ गिनी चुनी शाखाओं में ही कम्प्यूटर पर कार्य होता था। शेष सभी में परम्परागत तरीके से हाथ से ही सारा कार्य किया जाता था। कई बैंक अपनी शाखाओं में पूर्ण कम्प्यूटरीकरण कर चुके थे या कर रहे थे। इसलिए हमारे बैंक ने भी अपनी सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण करने का निर्णय किया। यह कार्य तीन चरणों में किया जाना था। पहले चरण में सभी शहरी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण होना था। दूसरे चरण में अर्द्ध-शहरी (कस्बाई) शाखाओं का और तीसरे चरण में शेष शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण किया जाना था। सभी मंडलों को अपनी-अपनी शाखाओं के लिए कम्प्यूटर खरीदने का कार्य अपने ही स्तर पर करने का आदेश बैंक से आया। अभी तक ऐसी खरीदारी प्रधान कार्यालय द्वारा की जाती थी, परन्तु अब इस कार्य का विकेन्द्रीकरण कर दिया गया था।
अपने कानपुर मंडल की लगभग 125 शाखाओं के लिए हार्डवेयर खरीदने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर आयी। पुराने कम्प्यूटर भी बदले जाने थे, क्योंकि वर्ष 2000 की समस्या के कारण वे अधिक उपयोगी नहीं रह गये थे।
हार्डवेयर खरीदने के लिए एक समिति बनायी गयी। इसमें स.म.प्र. महोदय के अलावा कानपुर, झाँसी और हमीरपुर क्षेत्रों के क्षेत्रीय प्रबंधक, हमारे मुख्य प्रबंधक, मैं, विकास विभाग के तत्कालीन प्रबंधक श्री अनिल कुमार वालिया और श्री अतुल भारती सम्मिलित थे। पहले हमने शाखाओं की संख्या और आकार के अनुसार यह तय किया कि कितने सर्वर, कितने नोड और कितने प्रिंटर खरीदने हैं। उनका काॅनफिगरेशन भी हमने तय कर लिया। फिर अपनी आवश्यकता के अनुसार खरीदारी के लिए टेंडर मँगाये गये। हमारे बैंक ने कम्प्यूटर सप्लाई करने वालों का एक पैनल बना दिया था। हम केवल पैनल में शामिल कम्पनियों से ही टेंडर ले सकते थे। हमने वही किया और उनके आधार पर एक टेंडर को मंजूर करना था।
कई बैठकों के बाद अन्त में दो टेंडर छाँटे गये, जो हर तरह से उपयुक्त थे। वे दो कम्पनियाँ थीं- एच.सी.एल. और काॅम्पैक। काॅम्पैक सप्लाई करने वाली कम्पनी ने लगभग 1 करोड़ का यह आर्डर लेने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। मैं स्वयं भी इसके पक्ष में था, क्योंकि इस कम्पनी के कम्प्यूटरों के साथ हमारा अनुभव अच्छा रहा था। लेकिन स.म.प्र. महोदय ने अन्ततः एच.सी.एल. के पक्ष में निर्णय किया, क्योंकि प्रधान कार्यालय ने भी पहले एच.सी.एल. के ही कम्प्यूटर खरीदे थे।
कम्प्यूटरों की इस खरीदारी के समय मेरे सम्बंध श्री ए.के. वालिया के साथ बहुत अच्छे हो गये थे। हम दोनों की अच्छी ट्यूनिंग हो गयी थी। हमने मिलकर लगभग 1 करोड़ के कम्प्यूटर खरीदे, परन्तु किसी ने हमारे ऊपर एक उँगली तक नहीं उठायी थी। 1-2 को छोड़कर सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण निर्धारित समय के अनुसार सफलतापूर्वक हो गया। मैंने इसमें बहुत भाग-दौड़ की थी। दूर-दूर की शाखाओं में भी साइट तैयार कराने, कम्प्यूटर स्थापित कराने और कार्य प्रारम्भ कराने में मैं स्वयं रुचि लेता था। मेरे साथी अधिकारी केवल स्थानीय अर्थात् कानुपर शहर की शाखाओं को देखते थे। बाहर ज्यादातर मैं स्वयं जाता था। इस कार्य के लिए कई बार मुझे आगरा, हमीरपुर, बाँदा, झाँसी, ललितपुर और फतेहपुर तक जाना पड़ा।
एक बार मैं आगरा में अपनी न्यू आगरा शाखा का कार्य कम्प्यूटर पर प्रारम्भ कराने के लिए गया। वहाँ कम्प्यूटर लग चुक थे, लेकिन शाखा वाले पुराने खातों का बैलेंस नहीं कर रहे थे, जिससे कम्प्यूटर पर कार्य प्रारम्भ नहीं हो पा रहा था। मुझसे कहा गया कि जाकर बैलेंस कराओ और काम चालू कराओ। मैंने दो-तीन दिन वहाँ जमकर कार्य किया। फिर जब मैं लौटने की सोचने लगा तो शाखा वालों ने कहा कि जब आप आ ही गये हैं तो दो-तीन दिन और रुक जाइये और काम चालू कराकर ही जाइये। मैं मान गया और सौभाग्य से केवल अगले तीन दिनों में ही काम प्रारम्भ हो गया।
लगभग एक हफ्ते बाद जब मैं अपने कार्यालय वापस पहुँचा, तो वे सोच रहे थे कि मैं आगरा में अपने घर में मस्ती करके आया हूँ। परन्तु जब मैंने बताया कि सारे कार्य को ऑन-लाइन कराके आया हूँ, तो सबने बहुत प्रशंसा की। इसी तरह एक-एक करके अधिकांश शाखाओं का कार्य कम्प्यूटरों पर होने लगा। जिस समय मैं कानपुर मंडल में आया था, तब केवल तीन शाखाओं का आंशिक कार्य कम्प्यूटरों पर होता था और जब मैंने कानपुर मंडल छोड़ा था, तो केवल बहुत दूर की तीन ठेठ ग्रामीण शाखाओं को छोड़कर सभी शाखाओं का कार्य कम्प्यूटरीकृत हो चुका था। यह कोई मामूली सफलता नहीं कही जा सकती।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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