आत्मकथा भाग-3 अंश-20
वर्ष 2000 की समस्या
उस वर्ष 1998-99 में कम्प्यूटर वाले एक विचित्र समस्या से जूझ रहे थे। उस समय कम्प्यूटर में तारीखों में वर्ष को 2 अंकों में दिखाया जाता था। सन् 2000 आने पर इससे काम चलना संदिग्ध था और कई कम्प्यूटरों के बेकार हो जाने की आशंका थी। इस आगामी संकट का पता काफी देर से चला। यदि एक-दो वर्ष पहले पता चल जाता, तो शायद संकट इतना गहरा न होता। भारत में हालांकि कम्प्यूटरीकरण उस समय तक कम मात्रा में ही था, इसलिए संकट कम था। लेकिन विकसित देशों में इसको बहुत गहराई से अनुभव किया जा रहा था। हमारे कम्प्यूटर भी पुराने थे, लेकिन हमने अपने प्रोग्रामों में सुधार करके इस संकट से बचने के उपाय कर लिये थे।
इस समस्या से निबटने का प्रशिक्षण लेने के लिए मुझे दो बार कोलकाता और एक बार मुम्बई का भ्रमण करना पड़ा। हालांकि इन प्रशिक्षणों से हमें कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन इसी बहाने भ्रमण हो गया। मुम्बई में मेरे सहयोगी अधिकारी श्री के.सी. श्रीवास्तव मेरे साथ गये थे और इलाहाबाद से मेरे मित्र श्री सुधीर श्रीवास्तव भी आये थे। हम मुम्बई खूब घूमे। सिद्ध विनायक मंदिर, हाजी अली की कब्र या दरगाह, महालक्ष्मी मंदिर, चौपाटी आदि गर घूमने और जुहू बीच पर भी गये। हमारा कालेज दादर में समुद्र के किनारे पर है। खाली समय में हम समुद्र तट पर घूमने चले जाते थे। हालांकि वहाँ का पानी रुका होने के कारण बदबू काफी थी।
फिर हमने वर्ष 2000 की समस्या पर अपने मंडल की शाखाओं के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया। हमारी रायपुरवा शाखा में काफी स्थान खाली था। हमने वहीं टैंट हाउस से कुर्सियाँ किराये पर लेकर प्रशिक्षण आयोजित किये। हमने एक-दो बार अपने केन्द्र पर भी प्रशिक्षण कार्यक्रम किये थे, जब सहभागियों की संख्या कम होती थी। ऐसे ही एक मौके पर हमें दो दिन प्रशिक्षण देना था और आपस में यह चर्चा कर रहे थे कि कौन-कौन क्या पढ़ायेगा। उस समय श्रीमती रेणु सक्सेना किसी अन्य शाखा में लगी हुई थीं। इसलिए मैंने मजाक में कहा- यदि रेणुजी होतीं तो बहुत मदद मिलती, क्योंकि वे 10 बजे से 5 बजे तक नाॅन-स्टाॅप बोल सकती हैं। इस पर सब लोग खूब हँसे।
अतुल भारती का कार्य
बैंकों के प्रधान कार्यालय में प्रायः मंडलीय प्रमुखों की बैठकें हुआ करती हैं। हमारे मंडलीय प्रमुख भी ऐसी बैठकों में पूरी तैयारी के साथ जाया करते थे। उनकी तैयारी कराने का दायित्व मुख्यतया विकास विभाग पर होता था और इस कार्य में वे विभिन्न विभागों की मदद लिया करते थे। उस समय हमारे मंडलीय कार्यालय के विकास विभाग में श्री मोहम्मद इस्माइल पदस्थ थे। एक बार एक बैठक के लिए चार्ट आदि कम्प्यूटर से बनाने के लिए उन्होंने मेरे कम्प्यूटर सेंटर के अधिकारी श्री अतुल भारती को शाम को बुला लिया। उन्होंने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया। उस दिन रात को करीब 9 बजे हमारे पास श्री भारती की पत्नी श्रीमती निवेदिता का फोन आया कि भारती जी अभी तक नहीं लौटे हैं और फोन करने पर कह रहे हैं कि मंडलीय कार्यालय में कुछ काम है और जल्दी ही आ जायेंगे। मैंने कहलवा दिया कि आ जायेंगे, चिन्ता मत कीजिए।
लगभग 12 बजे फिर उनका फोन आया कि भारती जी अभी तक नहीं आये हैं और फोन पर कह रहे हैं कि बस आने वाले हैं। मैंने कहलाया कि हो सकता है काम लम्बा हो गया हो। आ जायेंगे। लेकिन सुबह ढाई-तीन बजे फिर उनका फोन आया कि वे अभी भी नहीं आये हैं। अब मुझे चिन्ता हुई। इसलिए मैं तत्काल पैदल ही मंडलीय कार्यालय गया। वहाँ जाकर देखा कि भारती जी चार्ट बनाने में लगे हुए थे। उनको चार्ट बनाने का पर्याप्त ज्ञान नहीं था। इससे चार्ट सही नहीं बन रहा था और वे उससे परेशान थे, परन्तु काम बीच में छोड़ना भी नहीं चाहते थे। यह देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया। पहले तो मैंने भारती जी को डाँटा कि जब आपको इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो यह काम क्यों हाथ में लिया है? इस तरह तो आप हफ्ते भर में भी सारे चार्ट नहीं बना पायेंगे। फिर मैंने मो. इस्माइल को भी डाँटा कि जब इनसे काम नहीं हो रहा था, तो मुझे क्यों नहीं बुलाया?
फिर मैंने वह काम स्वयं किया और केवल एक घंटे में सभी चार्ट बनाकर दे दिये। तब मैं घर जाकर सोने गया। इसके बाद यह कार्य मैं स्वयं करने लगा था। बाद में श्रीमती शालू सेठ और कु. तेजविंदर सिंह के आ जाने के बाद वे दोनों भी चार्ट आदि बना देती थीं। वे दोनों इस कार्य में बहुत कुशल थीं।
कानपुर में दंगे
हमें कानपुर में रहते हुए 3-4 साल हो गये थे। कानपुर पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा बल्कि दौड़ रहा था। एक दिन श्रीमती वीनू ने मुझसे कहा कि जब हम वाराणसी में थे, तो बहुत सुना करते थे कि कानपुर में बहुत दंगे होते हैं, पर यहाँ तो कुछ नहीं होता। यह सन् 1999 की बात है। संयोग की बात कि इसके कुछ महीने बाद ही कानपुर में भयंकर दंगे हुए। इनकी शुरूआत भी चमनगंज के कुख्यात मुस्लिमबहुल क्षेत्र से हुई। बात बहुत मामूली थी, एक हिन्दू दुकानदार और मुस्लिम ग्राहक के बीच कहा-सुनी हो गयी थी। यही बात बढ़ते-बढ़ते साम्प्रदायिक दंगों का रूप ले गयी। जैसा कि हमेशा होता है, प्रारम्भ में हिन्दुओं का बहुत नुकसान हुआ, जिससे पुलिस सक्रिय हो गयी और फिर दंगों का रूप मुस्लिम-पुलिस संघर्ष हो गया। इसके बाद मुस्लिमों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। किसी तरह शांति हुई, परन्तु पुलिस तैनात रही।
एक दिन नई सड़क इलाके में पुलिस गश्त कर रही थी। तभी किसी मसजिद से या उसके पीछे के किसी मकान से चली एक गोली ने एक पुलिस अधिकारी के प्राण ले लिये। इस मूर्खतापूर्ण हरकत का परिणाम बहुत बुरा हुआ। पुलिस ने इसका बदला सामान्य मुसलमानों से चुकाया। लगभग एक माह दंगों में झुलसने के बाद शहर में शान्ति स्थापित हुई।
इन दिनों हमारा बैंक लगभग बन्द था। जो इलाके दंगों के क्षेत्र से बाहर थे, वहाँ की शाखाएँ चल रही थीं, परन्तु बहुत से कर्मचारी और अधिकारी जो दूर से आते थे, उनको छुट्टी दी जाती थी। मुझे भी कई दिन अपना कम्प्यूटर सेंटर बन्द रखना पड़ा, क्योंकि उसका रास्ता परेड से होकर जाता था, जो नई सड़क के मुस्लिमबहुल इलाके से सटा हुआ है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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