आत्मकथा भाग-3 अंश-19

पेंशनभोगियों की सेवा
मैं लिख चुका हूँ कि हमारे कम्प्यूटर सेंटर पर हमारे मंडल की शाखाओं से पेंशन लेने वाले पेंशनरों की पेशनगणना की रिपोर्ट तैयार होती थी। हम हर महीने हिसाब लगाकर और छापकर भेजते थे कि किसी पेंशन भोगी के खाते में कितनी पेंशन दी जायेगी आदि। उन सबका डाटा हमारे कम्प्यूटर में सुरक्षित रहता था। उस डाटा को समय समय पर अपडेट किया जाता था अर्थात् सुधारा जाता था। इस सुधार के लिए एडवाइस हमें शाखाओं से भेजे जाते थे। कई बार बैंक शाखाएँ लापरवाही के कारण पेंशनरों की पेंशन में सुधार के एडवाइस हमको नहीं भेजती थीं और पेंशनभोगियों को यह कहकर टरका देती थीं कि कम्प्यूटर से गलत रिपोर्ट आ रही है और इसे सुधारने का काम कम्प्यूटर सेंटर से होगा।
ऐसे पेंशनभोगी वृद्ध अपनी शिकायतें लेकर प्रायः हमारे पास आते थे। प्रारम्भ में उनकी संख्या अधिक होती थी, क्योंकि पेंशनगणना में बहुत त्रुटियाँ थीं। मैं स्वयं ऐसे पेंशनभोगियों की शिकायतों की जाँच करता था। मैं पेंशनभोगियों को बैठाकर चाय पिलाता था और यदि कोई सुधार हमारे स्तर पर हो सकता था, तो मैं तत्काल कर देता था। यदि किसी सुधार के लिए शाखा से एडवाइस आना आवश्यक होता था, तो मैं तुरन्त शाखा के नाम पत्र लिखकर भेजता था कि इनकी शिकायत की जाँच करके उनकी पेंशन में सुधार की एडवाइस हमें भेजी जाये। उस पत्र की एक प्रति पेंशनभोगी को भी देता था, जिसे ले जाकर वे अपना कार्य शाखा से करा लेते थे। मैं अपने केन्द्र से किसी भी पेंशनभोगी को असन्तुष्ट नहीं जाने देता था। उनकी सहायता करके मुझे बहुत प्रसन्नता होती थी।
मेरे इस रवैये का परिणाम यह हुआ कि सभी पेंशनरों की पेंशन लगभग पूरी तरह सही बनने लगी और उनकी शिकायतें हमारे पास आना कम होता गया और अन्त में लगभग शून्य हो गया।
नैनीताल भ्रमण
मेरी घूमने-फिरने में बहुत रुचि है और सौभाग्य से हमारे दोनों बच्चे भी ऐसे ही हैं, लेकिन श्रीमती जी बड़ी मुश्किल से ही कहीं जाने को तैयार होती हैं। नैनीताल घूमने की मेरी बहुत इच्छा थी। सन् 1999 की जून में हमने वहाँ जाने का प्रोग्राम बना लिया। लखनऊ से सीधे ट्रेन काठगोदाम या लालकुआँ जाती है। हमने उसी में आरक्षण करा लिया। पहले कानपुर से एक ट्रेन में शाम को लखनऊ पहुँचे, वहाँ से नैनीताल एक्सप्रेस या ऐसी ही किसी छोटी लाइन की गाड़ी में बैठकर अगले दिन प्रातः लालकुआँ पर उतरे। जब हम वहाँ पहुँचे थे, तब हल्की बूँदें पड़ रही थीं। हमने एक अन्य यात्री के साथ टैक्सी साझा की और नैनीताल पहुँच गये। वहाँ हमारे बैंक का होलीडे होम है। हमारा प्रोग्राम अचानक बना था, इसलिए हम होलीडे होम बुक नहीं करा पाये थे। हमने सोचा था कि अगर होलीडे होम खाली न मिला तो किसी होटल में ठहर जायेंगे। सौभाग्य से होलीडे होम का एक सुईट दो दिन के लिए खाली था। वहाँ उस समय केवल एक चपरासी था। हमने उससे कहकर ताला खुलवा लिया और उसमें ठहर गये।
नैनीताल एक छोटा सा पहाड़ी नगर है। उसके दो प्रमुख मोहल्ले हैं- मल्ली ताल और तल्ली ताल। इन दोनों के बीच में है नैनी नामक प्रसिद्ध झील। उस झील के एक ओर किनारे-किनारे पर है माल रोड और दूसरी ओर हैं ऊँचे-ऊँचे पहाड़। बस इतना ही है नैनीताल। हमें नैनीताल बहुत पसन्द आया। पहले दिन बारिश बन्द हो जाने पर हम बाजार में घूमे और आस-पास के स्थान देखे। विशेष तौर से शाम को हम माल रोड की तरफ स्थित स्नो व्यू पाॅइंट देखने गये। वह लगभग 1 किमी ऊपर चढ़ाई पर स्थित है। श्रीमती जी इतना चढ़ नहीं सकती थीं, इसलिए केवल मैं दोनों बच्चों के साथ गया। वहाँ एक दूरबीन भी लगी है। अगर आसमान साफ हो, तो वहाँ से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियाँ जैसे नंदा देवी की चोटी दिखाई पड़ती हैं। परन्तु बादलों के कारण बर्फ तो हमें नहीं दिखाई दी, पर चारों ओर का दृश्य खूब देखा।
दूसरे दिन हमने घोड़े किराये पर किये और दूसरी ओर के स्थान देखने गये। उनमें से कुछ के नाम मुझे अभी भी याद हैं- डोरोथी सीट, लैंड्स एण्ड, टिफिन टाॅप, बारा पत्थर। इनमें डोरोथी सीट सबसे ऊपर है। वहाँ से पूरा नैनीताल साफ दिखाई देता है। ऊँचाई इतनी है कि नीचे देखने पर डर लगता है। लैंड्स एण्ड भी ऐसा ही एक बहुत ऊँचा स्थान है। वह लगभग सीधा पहाड़ है, जिसके नीचे कोई कस्बा (शायद राम नगर) बसा हुआ है। मैं सोच रहा था कि अगर इस पहाड़ से कोई पत्थर लुढ़क गया, तो राम नगर में बहुत तबाही हो जायेगी, परन्तु सौभाग्य से ऐसा नहीं होता।
नैनीताल में रोज सुबह-सुबह जब श्रीमती जी और दोनों बच्चे सोते रहते थे, तो मैं अकेला ही नैनी झील का पूरा चक्कर लगा आता था। उसके चारों ओर ऐसा रास्ता बना हुआ है। एक बार मैं रास्ता भटक गया और जरा ऊँचाई पर चढ़ गया, तो काफी दूर जाकर मुश्किल से नीचे उतरा। एक दिन सुबह मैं अकेला ही चिड़ियाघर तक पहुँच गया, जिसका रास्ता माल रोड से है। वहाँ रास्ते में बन्दर बहुत थे, परन्तु मैं हिम्मत करके चलता गया। चिड़ियाघर का गेट तब तक खुला नहीं था। इसलिए मैं चिड़ियाघर देखे बिना बाहर से ही वापस आ गया।
दूसरे दिन वहाँ हमारे बैंक के एक बाबू (अब वे ऑफीसर हो गये हैं) श्री अम्बर मनराय मेरठ से आये और बगल वाले सुईट में ठहरे। उनकी पहले से बुकिंग थी। हमारा सुईट केवल दो दिन के लिए खाली था और तीसरे दिन कोई परिवार उसमें आने वाला था। इसलिए हम एक दिन के लिए अम्बर जी वाले सुईट में ही ठहर गये। तीसरे दिन हम उनके साथ ही नैनीताल के आस-पास के स्थान टैक्सी से घूमने गये। वहाँ कई अच्छे स्थान हैं, जिनमें से कुछ के नाम मुझे याद हैं- नौकुचिया ताल, भीम ताल, भुआली, सात-ताल। कुल मिलाकर नैनीताल हमें बहुत अच्छा लगा। कम से कम शिमला से तो अच्छा ही था। शिमला में देखने लायक जाखू के अलावा कुछ नहीं है। हमारा मन रानीखेत और अल्मोड़ा जाने का था, परन्तु उसके लिए समय नहीं था, क्योंकि लौटने का आरक्षण अगले ही दिन था।
अगले दिन हमें वापस आना था। नैनीताल के पास हलद्वानी में हमारी सगी बुआ के दो लड़के रहते हैं, जिनका दवाइयों का थोक का काम है। हम उनसे मिलना चाहते थे। टेलीफोन करने पर उनसे सम्पर्क हो गया और हम एक बस से हलद्वानी पहुँच गये। वहीं अम्बर जी से हमने विदा ली। बस अड्डे पर ही मेरे फुफेरे भाई श्री राजकुमार (मेमो) मुझे लेने आ गये। वहाँ से हम उनके हिमालिया फार्म स्थित घर पर पहुँचे। वे यह जानकर बहुत नाराज हुए कि हम सीधे नैनीताल गये थे। उनका कहना था कि पहले हलद्वानी आना चाहिए था। यहाँ से सब जगह घूमने का अच्छा प्रबंध हो जाता।
शाम को हम राजकुमार और उनके बड़े भाई श्री हेमराज के परिवारों के साथ एक बाँध देखने गये, जो पास में ही काठगोदाम नामक स्थान पर एक पहाड़ी नदी पर बना हुआ है। वह काफी सुन्दर और शान्त स्थान है। हमें बहुत अच्छा लगा। रात्रि को जल्दी ही भोजन करके हम लालकुआँ रेलवे स्टेशन गये और वहाँ से अपनी ट्रेन पकड़कर लखनऊ आ गये। वहाँ से फिर ट्रेन में कानपुर। यह यात्रा हमने अपने ही खर्च पर की थी, क्योंकि अपनी एल.टी.सी. सुविधा का लाभ हम पिछले वर्ष ही गोवा घूमने में उठा चुके थे। नैनीताल की यह यात्रा अभी तक हमारी एक मात्र यात्रा ही है। वैसे भी श्रीमती जी का कहना है कि जहाँ एक बार जा चुके हैं वहाँ दूसरी बार जाना बेकार है, किसी नयी जगह जाना चाहिए।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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