आत्मकथा भाग-3 अंश-18

सेवा शाखा का कार्य
मैं बता चुका हूँ कि उस समय हमारे बैंक की कानपुर की सेवा शाखा का काफी कार्य भी हमारे ही कम्प्यूटर सेंटर पर होता था, हालांकि उसे उनके ही कर्मचारी और अधिकारी करते थे। हमें इसमें लगातार तकनीकी मदद करनी पड़ती थी। उस समय सेवा शाखा का जो कार्य हमारे सेंटर में होता था, उसमें मुख्य था ड्राफ्टों का मिलान। इसका अर्थ है कि भारत के विभिन्न भागों से आये हुए जिन ड्राफ्टों का भुगतान कानपुर सेवा शाखा के माध्यम से होता था, उनकी प्रामाणिकता की जाँच और शाखाओं द्वारा भेजी गयी सूचनाओं का उनसे मिलान किया जाता था, ताकि कोई ड्राफ्ट में अधिक राशि भरकर भुगतान न ले ले। हालांकि यह मिलान भुगतान हो जाने के बाद ही किया जाता था, क्योंकि भुगतान से पहले ऐसी जाँच करना सम्भव नहीं है।
उस समय जिस प्रोग्राम के द्वारा यह कार्य किया जाता था, उसमें बहुत कमियाँ थीं और सेवा शाखा में पदस्थ कम्प्यूटर अधिकारी श्री पवन सक्सेना, जो हमारे सेंटर में बैठकर ही कार्य करते थे, बहुत परेशान रहते थे। दूसरी बात, वे यह चाहते थे कि ड्राफ्टों के मिलान का कुछ प्रारम्भिक कार्य कम्प्यूटर द्वारा डाटा प्रविष्टि के साथ ही कर लिया जाये, जिसका प्रावधान उस प्रोग्राम में नहीं था। इसलिए पवन जी ने मुझसे निवेदन किया कि मैं इस कार्य के लिए एक नया प्रोग्राम कोबाॅल भाषा में लिख दूँ। उस समय अर्थात् 1999 में मेरे पास अधिक कार्य नहीं था, इसलिए मैंने यह प्रोग्राम लिखना स्वीकार कर लिया। लगभग दो-तीन सप्ताह की मेहनत और अनेक बार सुधार करने के बाद वह प्रोग्राम पवन जी की इच्छा के अनुसार ही तैयार हो गया। फिर पुराने डाटा को उस प्रोग्राम की आवश्यकता के अनुसार थोड़ा सुधारा गया और उस प्रोग्राम का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया गया।
उस प्रोग्राम में ऐसी व्यवस्था थी कि यदि ड्राफ्ट में कोई विशेष प्रकार की अनियमितता होती थी, तो वह तुरन्त पकड़ लेता था और उसकी चेतावनी देता था। उस चेतावनी को विशेष रूप से ध्यान देकर जाँचा जाता था। ऐसे ही एक बार प्रोग्राम ने एक ड्राफ्ट के बारे में चेतावनी दी। जब उसकी जाँच की गयी तो पता चला कि किसी ने मात्र 50 रुपये के ड्राफ्ट को बड़ी सफाई से जालसाजी द्वारा लगभग साढ़े चार लाख का बना लिया था और उसका भुगतान ले लिया था। यह पता चलते ही पूरा बैंक हरकत में आ गया। जालसाजी करने वालों का पता लगाया गया, तो ज्ञात हुआ कि वे अपने खाते से ड्राफ्ट का सारा रुपया निकालकर पहले ही चम्पत हो चुके थे। बाद में वे पकड़े गये और शायद काफी रुपया भी वसूल हो गया।
इस जालसाजी को मेरे द्वारा लिखे गये प्रोग्राम ने पकड़ा था, इससे मेरी धूम मच गयी। मंडलीय कार्यालय ने उस प्रोग्राम को और कड़ा करने का आदेश दिया, ताकि इससे मिलती-जुलती जालसाजी भी पकड़ी जा सके। मैंने उनके आदेश के अनुसार प्रोग्राम में कई सुधार कर दिये। वह प्रोग्राम कई साल तक चलता रहा और उसका उपयोग तभी बन्द हुआ, जब हमारे बैंक द्वारा सेवा शाखाओं हेतु एक बिल्कुल नया पैकेज खरीद लिया गया।
वैसे कभी-कभी मैं मुख्य शाखा की भी तकनीकी सहायता किया करता था। वहाँ के विदेश विनिमय विभाग में बेसिक भाषा में लिखा हुआ एक प्रोग्राम चलता था। उसमें समय-समय पर सुधार करना पड़ता था। उस समय वहाँ जो अधिकारी नियुक्त थे श्री शैलेश कुमार, उनको बेसिक भाषा का कोई ज्ञान नहीं था, इसलिए उस प्रोग्राम में सुधार मैं जाकर कर देता था।
बम्बईवाली
उस समय हमारे मंडलीय कार्यालय में एक नई महिला कार्य करने आयीं। वे थीं बम्बई की श्रीमती नेहा नाबर। जब मैंने पहली बार उनको देखा, तो बहुत आश्चर्यचकित हुआ कि कोई महिला इतनी सुन्दर भी हो सकती है। उनका चेहरा ऐश्वर्या राय से बहुत हद तक मिलता है। मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था और वे किसी से फोन पर बातें कर रही थीं। इससे मैंने अनुमान लगाया कि वे किसी अधिकारी की पत्नी हैं और वहाँ ऐसे ही अचानक आ गयी हैं। लेकिन अगली बार जब मैं गया, तो उनको फिर वहीं देखा। तब एक अधिकारी ने उनसे मेरा परिचय कराया। वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हुईं कि मैं कम्प्यूटर विभाग का वरिष्ठ प्रबंधक हूँ। वे कम्प्यूटर में रुचि रखती थीं और उस पर कार्य करना सीखना चाहती थीं।
उस समय तक विंडोज आधारित पर्सनल कम्प्यूटर आम हो गये थे और केवल डाॅस आधारित कम्प्यूटर नाम मात्र के रह गये थे। नेहा जी ऐसे कम्प्यूटरों पर पेण्ट प्रोग्राम पर कार्य कर लेती थीं। उन्होंने उसमें एक रंग-बिरंगी गुड़िया का चित्र बनाया था। वह गुड़िया मुझे बहुत अच्छी लगी। मेरी नयी पुस्तक में क्योंकि पेण्ट प्रोग्राम पर एक अध्याय था, इसलिए मैंने उस गुड़िया को उदाहरण के रूप में अपनी पुस्तक में शामिल करने की इच्छा व्यक्त की। वे खुशी से तैयार हो गयीं। इसलिए मैंने उसे भी शामिल कर लिया और चित्र के साथ इस बात का भी उल्लेख किया कि यह चित्र इलाहाबाद बैंक की श्रीमती नेहा नाबर द्वारा पेण्ट प्रोग्राम में बनाया गया है। जब वह पुस्तक छपकर आयी, तो मेरे कम्प्यूटर केन्द्र की चारों महिला अधिकारियों को यह देखकर बहुत जलन हुई कि उनमें से किसी का भी नाम उस पुस्तक में नहीं था, जबकि मैंने नेहा जी का नाम छाप दिया था।
नेहा जी ने बाद में भी हमारे कार्यों में बहुत सहयोग किया था। एक बार मंडलीय कार्यालय के तत्कालीन राजभाषा अधिकारी श्री मेवा लाल पाल ने मंडल की वार्षिक पत्रिका ‘इला संगम’ (या ऐसा ही कोई नाम था) निकाली थी। उसका सम्पादन हम दोनों (श्री पाल और मैं) ने मिलकर किया था। उस पत्रिका का रंगारंग कवर श्रीमती नेहा नाबर ने तैयार किया था, जो सबको बहुत पसन्द आया।
(पादटीप- श्री पाल काफी पहले अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और नेहा जी पहले कानपुर की किसी और शाखा में चली गयी थीं, बाद में मुम्बई, क्योंकि उनके पति एक विदेशी बैंक में उच्च पद पर हैं। कई साल बाद मुम्बई में मुझे नेहा जी से मिलने का अवसर मिला था। मुझसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुईं। वे इस समय स्केल 2 में वहीं किसी शाखा में अधिकारी हैं।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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