आत्मकथा भाग-3 अंश-17
गोवा यात्रा
नवम्बर 1998 में हमारी योजना एल.टी.सी. सुविधा का लाभ लेकर गोवा घूमने की हुई। हम इससे पहले केवल जगन्नाथ पुरी और राजस्थान घूमने गये थे। गोवा के लिए पैकेज मिल रहा था, जिसमें हवाई जहाज से आना-जाना, 5 स्टार होटल में ठहरना और खाना-पीना सभी शामिल था। हमने इंडियन एयरलाइंस के पैकेज से घूमना तय किया। इससे पहले बच्चे और श्रीमती जी कभी हवाई जहाज से कहीं नहीं गये थे। आरक्षण कराने के बाद हम निर्धारित समय पर पहले ट्रेन से दिल्ली गये। वहाँ हम एक रात वीनू जी के मौसाजी के यहाँ उत्तम नगर में रुके। वहाँ से सुबह ही पालम हवाई अड्डे से उड़ान पकड़ी और बम्बई (अब मुम्बई) होते हुए दोपहर को लगभग 11 बजे गोवा पहुँच गये। वहाँ हमें लेने कम्पनी की तरफ से कार आयी हुई थी।
गोवा में हमें जिस होटल में ठहराया गया था, वह बहुत अच्छा था। वहाँ तैरने की सुविधा भी थी, परन्तु मेरे पास तैरने की पोशाक न होने के कारण मैं उसका लाभ नहीं उठा पाया, लेकिन दोनों बच्चों ने इसका खूब आनन्द लिया। वहीं एक अन्य सज्जन चंडीगढ़ के श्री गोयल साहब आये हुए थे। उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं। हम दोनों परिवारों ने मिलकर एक टैक्सी किराये पर ली थी और सब जगह घूम आये थे। एक दिन का टूर पैकेज की तरफ से भी था।
हमें गोवा बहुत अच्छा लगा। वहाँ के समुद्र तट बहुत सुन्दर हैं। हालांकि हम समुद्र में एक-दो बार ही नहाये थे, परन्तु मजा बहुत आया। एक दिन रात्रि को नाव पर संगीत कार्यक्रम भी हुआ, जिसमें हिन्दी फिल्मों के गानों पर सामूहिक नृत्य किया गया था। हालांकि मैंने उसमें नृत्य नहीं किया, लेकिन मुझे उनके द्वारा प्रस्तुत नृत्य देखकर बहुत आनन्द आया। गोवा से लौटने में हमें थोड़ी कठिनाई हुई। कारण कि इंडियन एयरलाइंस वालों ने जिस दिन की टिकट हमें दी थी, उस दिन उनकी दिल्ली के लिए कोई सीधी फ्लाइट ही नहीं थी। मजबूरी में हमने एक एजेंट से पहले बम्बई की फ्लाइट ली, फिर बम्बई से दिल्ली की फ्लाइट ली।
दिल्ली पहुँचते-पहुँचते हमें काफी देर हो गयी थी और हमारी लखनऊ की फ्लाइट का समय निकल गया था। इसलिए हम चिन्तित थे कि कानपुर कैसे पहुँचेंगे। परन्तु दिल्ली पहुँचने पर पता चला कि लखनऊ वाली उड़ान तीन-चार घंटे लेट है और एक-दो घंटे बाद छूटेगी। वह लखनऊ में रात्रि 1-2 बजे के आस-पास पहुँचने वाली थी। श्रीमती जी ने कहा कि इतनी रात में लखनऊ से कानपुर कैसे जायेंगे? मैंने कहा कि पहले तो लखनऊ पहुँचो, फिर कानपुर जाने के बारे में सोचा जाएगा। यह तय करके हमने अपना बोर्डिंग पास बनवा लिया। फिर जाकर खाना खाया, जो उड़ान लेट होने के कारण एयरलाइन की तरफ से मुफ्त खिलाया जा रहा था। खाना खाकर तृप्त होकर हम उड़ान में बैठे और रात्रि के लगभग 2 बजे लखनऊ पहुँच गये।
हम हवाई अड्डे से बाहर आये, तो बाहर ही टैक्सी वालों ने कहा कि टैक्सी से कानपुर चले जाओ, कोई खतरा नहीं है। हमने कुछ सोचकर ऐसा ही करना तय किया। सौभाग्य से हमें कोई कष्ट नहीं हुआ और हम सुबह 4 बजे के लगभग अपने घर कानपुर पहुँच गये। बच्चों ने इस यात्रा का पूरा आनन्द उठाया।
मुन्ना की जान बची
हमारे मकान मालिक के घर में एक नौकर था, जिसका नाम था मुन्ना। वह कम पढ़ा-लिखा था, परन्तु मेहनती बहुत था। घर का सारा काम सफाई, कपड़े धोना और खाना बनाना भी मुन्ना ही किया करता था। मकान मालिक श्री नरेन्द्र कुमार सिंह गणित के प्रोफेसर थे, परन्तु उन्हें गुटखा खाने और शराब पीने की बहुत बुरी आदत थी। उनके पुत्र अनिल कुमार सिंह भी नियमित गुटखा खाते थे और शराब भी पीने लगे थे। दोनों बाप-बेटे मिलकर शराब पीते थे। वे कभी-कभी मुन्ना को भी पिला दिया करते थे। तब तक मुन्ना का विवाह नहीं हुआ था। घरेलू समस्याएँ भी थीं। इन कारणों से वह धीरे-धीरे अवसाद में घिरता जा रहा था। एक दिन ऐसी ही मनःस्थिति में मुन्ना ने आत्महत्या के इरादे से नींद की ढेर सारी गोलियाँ एक साथ ले डालीं। इसका पता लगते ही सब घबरा गये। पुलिस के झंझट से बचने के लिए मकान मालिक उसे अस्पताल ले जा नहीं रहे थे। मुन्ना हालांकि होश में था, लेकिन उसे बहुत जोर के चक्कर आ रहे थे और हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।
सौभाग्य से उस दिन रविवार था और मैं घर पर ही था। मुझे पता चला तो मैं फौरन नीचे गया और भगौना भर के पानी गर्म करने का आदेश दिया। मैं जानता था कि ऐसे मामलों में कुंजर क्रिया रामबाण होती है। पानी गुनगुना गर्म होते ही मैंने मुन्ना को चार-पाँच गिलास पिलाया और फिर वमन कराया। उसके पेट से बहुत झागदार पानी निकला। मैंने फिर पानी पिलाया और फिर वमन कराया। ऐसा 5-7 बार करने पर उसके पेट से सारी गोलियों का पानी निकल गया और चक्कर आने कम हो गये, हालांकि कमजोरी बहुत थी। फिर मैंने उसे सो जाने का आदेश दिया। लगभग 2 घंटे सोने के बाद वह स्वस्थ हो गया। मुन्ना की इस प्रकार जान बच जाने पर हमारी मकान-मालकिन ने मुझे बहुत आशीर्वाद दिये।
कम्प्यूटर बदलना
ऊपर मैं बता चुका हूँ कि हमारे प्रधान कार्यालय ने पुराने हार्डवेयर और साॅफ्टवेयरों को छोड़कर नये कम्प्यूटर और नये साॅफ्टवेयर उपयोग करने का आदेश दिया था। वैसे भी मिनी और मेनफ्रेम कम्प्यूटरों का युग समाप्त हो रहा था और पीसी आधारित सिस्टमों का युग आ रहा था। हम इसके लिए मानसिक रूप से तैयार थे। उस समय हमारे पास ले-देकर दो पीसी थे, जिनमें से एक कुछ पुराना था और दूसरा नया था। समस्या यह थी कि हमारा वेतन गणना, पेंशन गणना, एडवांसशीट आदि का सारा डाटा पुराने मिनी कम्प्यूटर में भरा हुआ था और हमें किसी प्रकार उसे किसी पीसी पर लाना था, वह भी इस तरह कि डाटा नष्ट न हो जाये। इसके लिए हमारे पास मात्र एक उपाय था। वह यह कि उस मिनी सिस्टम में एक पुराने (बड़े) आकार का फ्लाॅपी ड्राइव था। पहले उस ड्राइव का उपयोग करते हुए डाटा को किसी फ्लाॅपी पर लाना था, फिर उस फ्लाॅपी से डाटा को एक पीसी की हार्ड डिस्क पर उतारना था। फिर उस पीसी से किसी दूसरे पीसी पर उतार लेना था।
यह एक बहुत जटिल काम था। इसकी जटिलता कुछ इसलिए और भी बढ़ गयी थी कि उस समय दो प्रकार की फ्लाॅपियों का उपयोग होता था- पुराने कम्प्यूटरों में 5.25 इंच व्यास की और नये कम्प्यूटरों में 3.5 इंच व्यास की, जिसे मिनी फ्लाॅपी कहते थे। गड़बड़ यह थी कि पुराने पीसी पर केवल बड़े आकार की फ्लाॅपी लगती थी और नये पीसी पर केवल छोटे आकार की। इसका तोड़ हमने यह निकाला कि पहले मिनी कम्प्यूटर से पुराने पीसी पर सारा डाटा धीरे-धीरे उतार लिया। यह कार्य भी कई दिन में टुकड़ों-टुकड़ों में हो पाया। लेकिन अन्ततः मैंने यह सफलतापूर्वक कर लिया। डाटा का कोई भी भाग नष्ट नहीं हुआ।
अब उस पुराने पीसी में एक नये (छोटे) आकार का फ्लाॅपी ड्राइव भी लगवाया गया, जिससे हमें उस पीसी से डाटा निकालने की सुविधा हो गयी। इस प्रकार यह जटिल कार्य पूरा हुआ। यह कार्य लगभग एक सप्ताह में सम्पन्न हो गया। अगर इतना डाटा फिर से तैयार करना पड़ता, तो पहले तो उसके लिए डाटा का स्रोत एकत्र करना ही बहुत कठिन होता, फिर उसको प्रविष्ट करने, जाँच करने और सही करने में भी महीनों लग जाते।
लेकिन कार्य इतना ही नहीं था। अभी हमें नये प्रोग्राम भी लिखने थे, क्योंकि पुराने प्रोग्राम केवल यूनीफाई-यूनिक्स-आरपीटी में लिखे हुए थे, जो नये पर्सनल कम्प्यूटरों पर नहीं चलते। इसलिए हमने कोबाॅल में सभी प्रोग्राम फिर से लिखे। यहाँ कोबाॅल में वर्षों तक काम करने का मेरा अनुभव बहुत काम आया और दो-तीन महीने में ही हमने सभी आवश्यक प्रोग्राम लिख डाले, जिससे केन्द्र का कार्य फिर सुचारु रूप से चलने लगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें