आत्मकथा भाग-3 अंश-9

उन दिनों हम हर रविवार को आर्यसमाजी विधि से हवन किया करते थे। एक बार हवन के बाद हम सबने भगवान से प्रार्थना की थी कि सूरज भाईसाहब का ऑपरेशन सफल हो जाये। वैसे मैं ऐसी प्रार्थनाएँ नहीं किया करता, लेकिन यह मामला बहुत नाजुक होने के कारण मैंने प्रभु से याचना करना उचित समझा। मुझे प्रसन्नता है कि प्रभु ने मुझे निराश नहीं किया।
लगभग दो माह दिल्ली में रहने के बाद भाईसाहब वापस कानपुर आये। उनकी हालत काफी सुधर गयी थी। हालांकि यह पहले से पता था कि उनका गुर्दा बाहरी होने के कारण 5 साल से अधिक शायद ही चल पायेगा। फिर भी एक सन्तोष था कि इतने समय में वे अपने बचे हुए पारिवारिक कर्तव्यों को पूरा कर लेंगे और शान्तिपूर्वक रिटायर भी हो जायेंगे।
जब उनके गुर्दा प्रत्यारोपण को ठीक एक साल हो गया, तो उन्होंने हमें भोजन पर बुलाया। भोजन साधारण ही था, जैसा कि वे हमेशा करते थे। मैंने कहा कि यह भोजन पूरी तरह सात्विक है और इसको खाने वाला कभी बीमार पड़ ही नहीं सकता। तब भाई साहब बोले कि मैं तो फिर भी बीमार हो गया। मैंने कहा- ‘इसका कारण यह है कि आप ऐलोपैथिक दवाइयाँ बहुत खाते हैं, जो जहरीली होती हैं।’ इस पर वे चुप हो गये।
वहीं भाईसाहब ने बताया कि उन्होंने और भाभीजी ने हजारों रुपये फीस देकर रेकी सीखी है। वह काफी फायदेमंद है और उसका कोई साइड इफैक्ट भी नहीं होता। तब मैंने कहा- ‘अगर एक साल पहले सीख लेते तो और अच्छा रहता।’ वे मेरे कथन में छिपे व्यंग्य को समझ गये और नाराज होकर बोले- ‘क्या तुम पागल हो?’ मैंने बड़ी मुश्किल से बात सँभाली। वास्तव में रेकी जापानी या कोरियाई झाड़-फूँक चिकित्सा ही है। उसमें पीड़ित अंग पर हाथ से स्पर्श करके रोग ठीक किये जाते हैं। मुझे इस पर काफी हँसी आती है।
कानपुर में शाखा का हाल
जब मैं कानपुर गया तो मेरे आने का समाचार संघ वालों को पहले ही मिल गया था। डा. अशोक वार्ष्णेय वहाँ विभाग प्रचारक थे। उनसे मेरा बहुत पुराना परिचय था। वाराणसी के प्रचारक चन्द्र मोहन जी ने उनको फोन पर ही बता दिया था कि मैं कानपुर आ रहा हूँ और अशोक नगर के फलां मकान में रहूँगा। इसके परिणामस्वरूप दो-तीन दिन बाद ही अशोकनगर शाखा के तीन प्रमुख स्वयंसेवक मुझसे मिलने आ गये। डा. अशोक जी भी उनके साथ आये थे। वे स्वयंसेवक थे- नगर संघचालक श्री ब्रज लाल जी गुप्त, श्री ओम प्रकाश जी शर्मा और श्री गुरुनारायण जी बहल। ये तीनों 60 वर्ष से अधिक उम्र के थे, परन्तु युवकोचित उत्साह से संघकार्य करते थे। इनके बारे में विस्तार से आगे लिखूँगा। यहाँ कानपुर में संघकार्य की रूपरेखा बता देना उचित होगा।
उस समय कानपुर महानगर तीन जिलों में बँटा हुआ था- कानपुर पश्चिम, कानपुर दक्षिण और कानपुर उत्तर-पूर्व। बाद में कानपुर उत्तर-पूर्व को दो जिलों में बाँट दिया गया- कानपुर उत्तर और कानपुर पूर्व। हमारा क्षेत्र अशोकनगर पहले कानपुर उत्तर-पूर्व जिले में आता था, बाद में कानपुर पूर्व में आने लगा। हमारे नगर का नाम था गाँधीनगर, जिसमें अशोकनगर, हर्ष नगर, मोतीझील, नेहरू नगर, जवाहर नगर, सीसामऊ बाजार, गाँधी नगर और प्रेम नगर का सारा भाग शामिल था। हमारी शाखा का नाम था परशुराम, परन्तु बोलचाल में उसे अशोक नगर शाखा कहते थे। हमारी शाखा कुमारी उद्यान विद्यालय, जिसे बोलचाल में फातिमा स्कूल कहते हैं, के सामने के तिकोने पार्क में लगती थी। पूरे अशोक नगर और हर्ष नगर के भी स्वयंसेवक इसी शाखा में आते थे।
उस समय हमारे नगर संघचालक थे श्री ब्रज लाल जी गुप्त, जो रुई का व्यापार करते थे। वे 80-फीट रोड पर अशोक नगर की साइड में रहते थे और हमारी ही शाखा में नियमित आते थे। हमारे नगर कार्यवाह थे श्री बंशीलाल जी अरोड़ा, जो एक प्रिंटिंग प्रेस चलाते थे। अशोक नगर शाखा के कई स्वयंसेवक बहुत ही प्रेरक थे। यहाँ प्रमुख स्वयंसेवकों का परिचय देना उचित होगा।
अशोक नगर के सबसे पुराने स्वयंसेवक थे श्री बाबू लाल जी मिश्र। वे उस समय 85 वर्ष के रहे होंगे। पहले वे नगर संघ चालक थे, परन्तु स्वास्थ्य के कारणों से स्वयं ही कार्यमुक्त हो गये थे। अत्यन्त वृद्ध और अस्वस्थ होने पर भी वे अधिकांश दिनों में शाखा आ जाते थे। वे अपने आप में एक इतिहास थे। वे मुझे बहुत प्यार करते थे और मेरी जिज्ञासाओं को शान्त किया करते थे। अपने बारे में उन्होंने बताया था कि सन् 1940-42 के आस-पास जब पूरे कानपुर में मात्र तीन शाखाएँ लगती थीं, तब उनमें से एक शाखा वे परेड पर आजकल के रामलीला मैदान में लगाया करते थे। वे हिन्दुस्थान समाचार के समाचार सम्पादक के पद पर बहुत दिनों तक कार्य करते रहे थे अर्थात् पत्रकार थे और लगभग 25 वर्ष पूर्व रिटायर हो गये थे।
मैंने अपनी आँखों से देखा था कि कानपुर के बड़े-बड़े प्रमुख स्वयंसेवक और कार्यकर्ता और सांसद तक उनके पैर छूते थे। वे मुझे बहुत मानते थे और शाखा पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से मेरी प्रशंसा किया करते थे। उनकी धर्मपत्नी स्वयंसेवकों में माताजी के नाम से प्रख्यात थीं। मा. बाबूलाल जी और माताजी के चरण छूकर आशीर्वाद लेने में मुझे बहुत आनन्द आता था। मैं प्रायः उनके निवास पर जाता था और बहुत बातें करता था। मा. बाबूलाल जी मिश्र का देहान्त कानपुर में मेरे सामने ही हो गया था। इसके बारे में आगे लिखूँगा।
हमारे तत्कालीन नगर संघचालक श्री ब्रजलाल जी गुप्त, मूलतः हरियाणा के निवासी थे, लेकिन कानपुर में लम्बे समय से रहकर रुई का व्यापार करते थे। वे लाठी चालन के विशेषज्ञ थे। मैंने भी उनसे शाखा पर लाठी चलाना सीखा था। उनको यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ था कि अन्य स्वयंसेवकों की अपेक्षा मैं बहुत कम समय में ही अच्छी तरह लाठी चलाना सीख गया था। बाद में अभ्यास छूट जाने से मैं सब भूल गया। मा. ब्रजलाल जी का मेरे ऊपर बहुत स्नेह था।
हमारे नगर कार्यवाह श्री बंशीलाल जी भी अधिकतर हमारी अशोकनगर शाखा में ही आते थे। वे लाहौर के रहने वाले थे और देश विभाजन के कारण वहाँ से विस्थापित होकर कानपुर आये थे। यहाँ अपने परिश्रम से उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस लगायी थी और मकान भी बनवा लिया था। दुर्भाग्य से उनकी श्रीमती जी पूरी तरह अंधी हो गयी थीं। वे दोनों भी मुझे बहुत स्नेह करते थे। तमाम कठिनाइयों के बाद भी मा. बंशीलाल जी संघकार्य में बहुत समय देते थे। एक बार मेरी श्रीमती जी ने मुझसे उनकी चर्चा करते समय उनको ‘बंशीलाल’ कहकर पुकारा। यह सुनकर मुझे बहुत पीड़ा हुई। मैंने श्रीमती जी से कहा- ‘वे इतने बड़े कार्यकर्ता हैं। उनका नाम जरा इज्जत से लिया करो।’ यह कहते-कहते मेरी आँखों में आँसू आ गये। तब श्रीमतीजी ने भी अपनी गलती अनुभव की।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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