आत्मकथा भाग-3 अंश-7
नये साहब
तभी अचानक हमारे सहायक महाप्रबंधक श्री पांडेय जी के स्थानांतरण का आदेश आ गया। वे सिलीगुड़ी मंडल में भेजे जा रहे थे। उनके स्थानांतरण की मैंने कल्पना भी नहीं की थी और न हम ऐसा चाहते थे। चिन्ता भी थी कि नये साहब जाने कैसे होंगे। शीघ्र ही पांडेय जी की विदाई हुई। वाराणसी की तरह यहाँ कानपुर में भी हमारी अधिकारी यूनियन का कोई अधिकारी उनके विदाई समारोह में नहीं गया, लेकिन मैं विशेष तौर से उसमें शामिल हुआ। मैंने उन्हें माला भी पहनायी और चलते समय अपनी गलतियों के लिए क्षमा भी माँगी। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे कंधों को थपथपाते हुए कहा था- कोई गलती नहीं है। पांडेय जी वास्तव में महान् थे। मैंने एक बार उन्हें अपनी लिखी कम्प्यूटर की पुस्तक भेंट में दी थी, जिसकी वे बहुत प्रशंसा करते थे। हालांकि राजनीति के कारण आधे अधिकारी उनके विरोध में थे, परन्तु वे किसी का भी अपमान नहीं करते थे। मैं विदाई के दिन के बाद उनके दर्शन नहीं कर सका, क्योंकि कुछ ही समय बाद वे रिटायर हो गये और फिर एक दिन उनके देहान्त का दुःखद समाचार प्राप्त हुआ।
श्री पांडेय जी की जगह श्री एस.के. सिन्हा हमारे सहायक महाप्रबंधक बनकर आये। जैसा कि नाम से स्पष्ट है वे बिहार के रहने वाले थे और आम बिहारियों की छवि के अनुरूप पूरी तरह अक्खड़ थे। वे खैनी बहुत खाते थे और खैनी की दोनों तरफ खुलने वाली डिबिया उनकी मेज पर ही पेपरवेट की तरह रखी रहती थी। हालांकि काम के मामले में वे बहुत सहयोगात्मक और सख्त भी थे। जब वे पहली बार हमारे कम्प्यूटर सेंटर पर पधारे, तो एडवांसशीट के काम की समस्या जानकर उन्होंने तत्काल आधा काम बाहर कराने की अनुमति दे दी। इससे हम एकदम तनावमुक्त हो गये।
सिन्हा जी में बस एक ही खराबी थी कि वे किसी को भी सबके सामने बुरी तरह डाँट देते थे। हमारे कम्प्यूटर सेंटर पर तो वे कभी-कभी ही आते थे और फोन पर ही डाँटते थे, लेकिन मंडलीय कार्यालय में तो सभी अधिकारियों का पाला उनसे रोज ही पड़ता था। वे मुख्य प्रबंधक को भी चपरासियों के सामने बुरी तरह डाँटकर अपमानित करते थे। इस कारण वहाँ से दो मुख्य प्रबंधक हृदय की बीमारी लेकर गये। इनमें एक तो श्री एस. के. घोष थे और दूसरे थे श्री अरुणाभ राय। इसके कारण उनकी छवि अच्छी नहीं थी।
वे अधिकारियों को छुट्टी देने में भी बहुत परेशान करते थे और अपने चमचों के अलावा कभी किसी की छुट्टी मंजूर नहीं करते थे। इसका समाधान हम लोगों ने यह निकाला कि हम बिना छुट्टी लिये चले जाते थे और बाद में मेडीकल सर्टीफिकेट लगा देते थे। वे इस पर भी नाराज होते थे, परन्तु कुछ कर नहीं सकते थे। जब लगभग दो साल बाद वे स्थानांतरित हुए, तो मंडलीय कार्यालय में उनके विदाई समारोह में सब लोगों ने जमकर अपनी भड़ास निकाली और उन्हें खूब खरी-खरी सुनायी। वे बेचारे चुपचाप सुनते रहे और चले गये।
हिन्दी अधिकारियों के सम्मेलन में
जब सिन्हा जी हमारे सहायक महाप्रबंधक थे, तभी प्रधान कार्यालय से मुझे हिन्दी अधिकारियों के सम्मेलन में ‘हिन्दी में कम्प्यूटरीकरण’ विषय पर भाषण देने के लिए पटना जाने का आदेश मिला। मैंने हिन्दी कम्प्यूटरों के बारे में थोड़ा सा शोधकार्य किया था और जापान में भी पुरस्कृत हुआ था, इसलिए प्रधान कार्यालय के राजभाषा विभाग में प्रबंधक श्री शारदा प्रसाद उपाध्याय, जो लेखक भी थे और ‘स्वदेश भारती’ के नाम से लिखा करते थे, ने मुझे निमंत्रण भिजवाया था। वे सज्जन एक बार वाराणसी आये थे, तब हमारे राजभाषा अधिकारी श्री नरेन्द्र धस्माना ने उनसे मेरा परिचय कराया था। मेरे और मेरे शोधकार्य के बारे में जानकर वे बहुत प्रसन्न हुए थे। इसीलिए उन्होंने मुझे आमंत्रित कराया था। उन्होंने एक अन्य ईडीपी अधिकारी श्री अनुराग दीप को भी दिल्ली मंडलीय कार्यालय से उसी सम्मेलन में बुलाया था।
वैसे तो शायद हमारे स.म.प्र. सिन्हा जी मुझे इस सम्मेलन में नहीं जाने देते, परन्तु प्र.का. से सीधे आदेश आया था, इसलिए वे मना नहीं कर सके। कानपुर मंडलीय कार्यालय से हिन्दी अधिकारी श्री प्रवीण कुमार और उनकी पत्नी श्रीमती ममता जी, जो क्षेत्रीय कार्यालय कानपुर में हिन्दी अधिकारी थीं, भी उस सम्मेलन में भाग लेने जा रहे थे। इसलिए मैंने उसी गाड़ी में अपना आरक्षण करा लिया। मैं पटना घूमने के लिए अपनी श्रीमतीजी और बच्चों को भी साथ ले जा रहा था, इसलिए मैंने साधारण स्लीपर श्रेणी में ही सबका आरक्षण कराया। जब हम पटना पहुँचे थे, तो जोर की बरसात हो रही थी। बारिश बन्द होने तक हमें प्लेटफार्म पर ही खड़े रहना पड़ा। फिर हम एक अच्छे से होटल में गये। वहाँ हमने अपनी-अपनी पात्रता के अनुसार कमरे किराये पर लिये। उनका किराया बैंक को ही देना था।
पटना में हमारी श्रीमतीजी की ममताजी से बहुत घनिष्टता हो गयी थी। उससे पहले केवल साधारण परिचय था। उस सम्मेलन में सभी हिन्दी अधिकारी आये थे और हमारे बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष-एवं-प्रबंध निदेशक श्री हरभजन सिंह भी पधारे थे। मैंने उनको भी अपनी एक पुस्तक भेंट में दी थी। सम्मेलन में मेरा प्रस्तुतीकरण अच्छा हुआ था और बाद में खूब सवाल-जबाव भी हुए थे। कुल मिलाकर मैं इस सम्मेलन में अपने प्रस्तुतीकरण से संतुष्ट था।
(पादटीप- श्री प्रवीण कुमार मुझसे भी कुछ वर्ष पहले बैंक सेवा से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और आजकल चंडीगढ़ के निकट जीरकपुर में रहते हैं। उनकी पत्नी श्रीमती ममता श्रीवास्तव भी समय से पहले अवकाश ले चुकी हैं, क्योंकि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। मेरे बताये उपचार का वे आधा-अधूरा पालन करती हैं और किसी तरह जीवन बिता रही हैं।)
(पादटीप- श्री प्रवीण कुमार मुझसे भी कुछ वर्ष पहले बैंक सेवा से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और आजकल चंडीगढ़ के निकट जीरकपुर में रहते हैं। उनकी पत्नी श्रीमती ममता श्रीवास्तव भी समय से पहले अवकाश ले चुकी हैं, क्योंकि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। मेरे बताये उपचार का वे आधा-अधूरा पालन करती हैं और किसी तरह जीवन बिता रही हैं।)
वैसे पटना शहर मुझे अधिक पसंद नहीं आया। वहाँ की सारी सड़कें बिल्कुल ही बेकार थीं और बारिश के दिन होने के कारण जगह-जगह पानी भरा हुआ था। उस समय हमारे पुराने साथी श्री अनिल कुमार श्रीवास्तव और श्री अब्दुल रब खाँ पटना में ही पदस्थ थे। मैं उनसे मिलने मंडलीय कार्यालय गया। हम अनिल जी के घर भी गये थे। उनके घर के सामने भी सड़क पर काफी पानी भरा हुआ था। लगभग सारे पटना शहर का यही हाल था। वैसे हम गोलघर और चिड़ियाघर भी देखने गये और साथ में गुरु गोविन्दसिंह जी से सम्बंधित प्रमुख गुरुद्वारे पटना साहिब में भी मत्था टेकने गये थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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