आत्मकथा भाग-3 अंश-5

डा. अनिल अग्रवाल एवं साथी

कानपुर आये हुए हमें अधिक दिन नहीं हुए थे, जब हमारा परिचय दूर के एक रिश्तेदार छात्र से हुआ, जो कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी चिकित्सा महाविद्यालय में एम.बी.बी.एस. में पढ़ रहे थे। वे थे डा. अनिल अग्रवाल। वे हमारे मथुरा वाले सबसे बड़े साढ़ू श्री हरिओम अग्रवाल, जो अब सूरत में रहते हैं, के भतीजे हैं और उन्होंने ही हमारे बारे में उनको बताया था। एक दिन डा. अनिल अपने एक सहपाठी डा. सन्तोष गुप्ता के साथ हमसे मिलने आये। हमारा उनसे परिचय हुआ, तो हमें बहुत प्र्रसन्नता हुई। वे दोनों ही बहुत प्रतिभाशाली हैं। वैसे भी एम.बी.बी.एस. में प्रवेश कड़ी परीक्षा के बाद ही मिलता है। दोनों बहुत ही सच्चरित्र और सुशील हैं। श्रीमती वीनू जी रिश्ते में डा. अनिल की मौसी लगती हैं, इसलिए वह तथा उसके सभी सहपाठी मुझे मौसाजी कहते हैं और मिलने पर हमेशा पैर छूते हैं। उनके सहपाठियों में डा. राजीव अग्रवाल, डा. योगेश और डा. मधुवन के नाम मुझे याद हैं।

उन लोगों ने अपने कालेज में आगरा-मथुरा के 20-25 विद्यार्थियों का एक समूह बना रखा था और वे अपना भोजन एक मैस में स्वयं बनवाते थे। खाना बनाने के लिए उन्होंने एक आदमी और उसकी सहायता के लिए एक लड़का रखा हुआ था। खरीदारी वगैरह स्वयं करते थे और हिसाब-किताब तथा देखभाल की जिम्मेदारी बारी-बारी से विद्यार्थी उठाया करते थे। वे अपना खाना साधारण होटलों की तुलना में अच्छा बनवाते थे। एक-दो बार हम भी उनकी मैस में खाना खाने गये थे, जो कुल मिलाकर बहुत अच्छा था।

एक बार डा. अनिल ने मादा भ्रूण हत्या के विरोध में एक कहानी लिखी। इस कहानी में उन्होंने एक अजन्मे मादा भ्रूण की कथा उसी के शब्दों में लिखी थी कि किस प्रकार एक मादा भ्रूण अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने देखती है और फिर किस प्रकार गर्भपात कराके उसके सपनों का खून कर दिया जाता है। कहानी बहुत मार्मिक थी। छपने से पहले डा. अनिल ने वह मुझे पढ़ने के लिए दी, क्योंकि उसे पता था कि मैं साहित्य में रुचि रखता हूँ और लिखता-पढ़ता रहता हूँ। मैंने कहानी पढ़कर डा. अनिल से कहा कि कहानी तो बहुत अच्छी है, परन्तु इसमें एक कमी है। वह यह कि इसमें उस डाक्टर का कोई उल्लेख नहीं है, जो कुछ रुपयों के लालच में एक मादा भ्रूण की हत्या करता है। डा. अनिल ने यह तो माना कि वास्तव में कहानी में यह कमी है, परन्तु वह उस कमी को दूर करने अर्थात् गर्भपात करने वाले डाक्टर का उल्लेख उसमें करने को तैयार नहीं हुए। अपने पेशे के प्रति ऐसा पक्षपात प्रायः सभी लोग किया करते हैं। 

एक बार मेडीकल काॅलेज के छात्रों ने अपने वार्षिक समारोह में फैशन शो आयोजित किया। इसमें केवल डाक्टरी पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को भाग लेना था। कानपुर के अलावा अन्य कई शहरों के छात्र-छात्राओं को भी इसमें रैम्प पर कैटवाॅक करना था। डा. अनिल और डा. सन्तोष के आग्रह पर हम सभी इस शो को देखने गये। हमें विशेष रूप से आगे की पंक्ति में बैठाया गया था, जहाँ से मंच साफ दिखाई देता था। हमें यह फैशन शो देखकर बड़ा आनन्द आया। इससे पहले मैंने केवल टी.वी. पर फैशन शो देखे थे।

डा. अनिल और उनके सहपाठी योग्य तो हैं ही। एम.बी.बी.एस. करने के बाद उन सबका प्रवेश प्रायः पहली ही बार में एम.डी. में हो गया था, वह भी उनकी पसन्द की लाइन में। डा. अनिल अब चर्म रोग विशेषज्ञ हैं, डा. सन्तोष हड्डी रोग विशेषज्ञ हैं, शेष भी एम.डी. हो गये हैं और अच्छा कमा रहे हैं। डा. अनिल, डा. सन्तोष और डा. राजीव ने तो अपना-अपना अस्पताल ही बना रखा है।

डा. अनिल का विवाह कानपुर की ही डा. रचना से हुआ है। उनको पहली बार देखने हम भी गये थे। डा. रचना हमें अच्छी लगीं। वे अच्छे परिवार की सुशील लड़की हैं। उनके पिताजी श्री कानकाणी स्टेट बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक थे। डा. अनिल और डा. रचना का विवाह मथुरा में हुआ था। हम भी पूरे परिवार के साथ उनके विवाह में शामिल होने गये थे। जब तक हम कानपुर में थे, उनसे मिलना हो जाता था। परन्तु जब कानपुर छूट गया, तो कभी-कभी टेलीफोन पर बात हो जाती है। डा. सन्तोष तो आगरा में ही हैं। उनसे प्रायः मिलना होता रहता है।

बैंक कम्प्यूटरीकरण का हाल

जिस समय मैं स्थानांतरित होकर अपने बैंक के कानपुर मंडल में आया था, उस समय उस मंडल में कार्यालयों और शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण का कार्य बहुत ही प्रारम्भिक स्तर पर था। मंडल की 128 शाखाओं में से केवल 3 शाखाएँ - कानपुर मुख्य, स्वरूप नगर और गुमटी नं. 5 - आंशिक रूप से कम्प्यूटरीकृत थीं। शेष शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण का कार्य प्रगति पर था, जिसका अर्थ है कि काफी पिछड़ा हुआ था और निकट भविष्य में उनका कम्प्यूटरीकरण होने की कोई संभावना नहीं थी। हमारे कम्प्यूटर सेंटर में अवश्य मिनी कम्प्यूटर लगा हुआ था, जिस पर वेतन गणना, पेंशन गणना, एडवांस शीट, वीकली आदि मुख्य कार्य हो जाते थे।   

स्वयं मंडलीय कार्यालय भी कम्प्यूटरों के मामले में कंगाल था। वहाँ दो पुराने पर्सनल कम्प्यूटर (पीसी) अवश्य पड़े हुए थे, जिन पर कोई कार्य नहीं होता था। हालांकि वहाँ के दो-तीन अधिकारियों को कम्प्यूटरों पर कार्य करने का विशेष प्रशिक्षण मुम्बई में दिया गया था, परन्तु वे जानबूझकर कुछ भी करना नहीं चाहते थे। पत्र आदि भी टाइपिस्ट ही पुराने यांत्रिक टाइपराइटर पर टाइप करता था। इसका एक कारण  यह भी था कि पीसी पर हिन्दी पत्रों को टाइप करने की कोई सुविधा नहीं थी और कानपुर का अधिकांश पत्रव्यवहार हिन्दी में होता था। फिर भी उनमें से एक पीसी का उपयोग वहाँ के हिन्दी अनुवादक श्री रजत जैन कर रहे थे और उस पर छोटा-मोटा कार्य कर लेते थे या गेम खेलते रहते थे।

श्री प्रवीण कुमार

वहीं मेरा परिचय वहाँ के तत्कालीन हिन्दी अधिकारी श्री प्रवीण कुमार से हुआ। वे मेरठ के रहने वाले हैं और अग्रवाल परिवार से सम्बंध रखते हैं। वैसे मैं उन्हें तथा वे मुझे थोड़ा-थोड़ा पहले से जानते थे, क्योंकि जब मैंने लखनऊ में इलाहाबाद बैंक में सेवा प्रारम्भ की थी तो वे वहीं हिन्दी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। परन्तु उनसे घनिष्ट परिचय कानपुर आकर ही हुआ, जो समय के साथ घनिष्टतर और घनिष्टतम होता चला गया। संयोग से उनकी पत्नी श्रीमती ममता श्रीवास्तव भी हमारे बैंक में हिन्दी अधिकारी थीं और उस समय कानपुर क्षेत्रीय कार्यालय पांडु नगर में पद स्थापित थीं। वास्तव में प्रवीणजी और ममताजी एक साथ हिन्दी अधिकारी बने थे और वहीं उनमें प्रेम विवाह हुआ था, हालांकि दोनों की जातियाँ अलग- अलग हैं। परन्तु ममताजी ने विवाह के बाद भी अपना नाम परिवर्तन नहीं किया, जैसी कि प्रथा है।

यहाँ यह बता देना असंगत न होगा कि हिन्दी के प्रति अपने स्वाभाविक प्रेम और आग्रह के कारण मैं जहाँ भी सेवा करता था, वहाँ के हिन्दी अधिकारियों, जिन्हें सरकारी शब्दावली में राजभाषा अधिकारी कहा जाता है, से मेरी घनिष्टता हो जाती थी। कानपुर से पहले वाराणसी में भी दोनों हिन्दी अधिकारियों श्री नरेन्द्र धस्माना और श्री रामाशीष तिवारी से मेरी बहुत घनिष्टता थी। उससे भी पहले लखनऊ में एच.ए.एल. के हिन्दी विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों से मेरी अंतरंगता थी। इसी तारतम्य में प्रवीणजी से मेरी अंतरंगता हुई। आगे भी मेरी यह प्रवृत्ति बनी रही।
(पादटीप- श्री प्रवीण कुमार अब सहायक महाप्रबंधक के पद पर पहुँचकर अवकाशप्राप्त कर चुके हैं और चंडीगढ़ के निकट जीरकपुर में रहते हैं।)

-- डाॅ विजय कुमार सिंघल  ‘अंजान’

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