आत्मकथा भाग-3 अंश-4

अशोक नगर में
इसी कानपुर शहर के अशोक नगर नामक प्रसिद्ध मोहल्ले में मुझे मकान मिला था। यह मकान मोतीझील की ठीक पीछे उसी से सटा हुआ था। वह एक चार मंजिला मकान था, जिसमें नीचे की तीनों मंजिलों पर दो-दो फ्लैट थे और सबसे ऊपर एक फ्लैट था। प्रत्येक फ्लैट में एक-एक परिवार रहता था। एक फ्लैट प्रायः खाली रहता था, क्योंकि उसमें मकान-मालिक का सामान भरा हुआ था। उस मकान के मालिक थे श्री नरेन्द्र कुमार सिंह। वे वीएसएसडी कालेज में गणित विभाग के अध्यक्ष थे। वह मकान वास्तव में उनके पिताजी श्री पुत्तू लाल सिंह ने बनवाया था, जो स्वयं भी गणित के प्रोफेसर थे। उनके दो पुत्र थे, एक श्री एन.के. सिंह हमारे मकान मालिक थे, और दूसरे थे श्री आर.के. सिंह, जो बाद में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन भी बने थे। इसी मकान में पहले तल्ले का पीछे वाला फ्लैट हमें मिला था।
उस फ्लैट में तीन कमरे थे और एक किचन था। पीछे सारी मोतीझील दिखायी पड़ती थी। उसका नजारा हमें अच्छा लगता था। उसमें बस एक ही कमी थी कि धूप बहुत कम आती थी और हवा बहुत अधिक आती थी। इससे गर्मियों में तो आराम रहता था, लेकिन जाड़ों में बहुत परेशानी हो जाती थी। हम लगभग एक साल तक उस फ्लैट में रहे। बाद में हमारे मुख्य प्रबंधक श्री कपूर के स्थानांतरण हो जाने के बाद हमने उनका आगे वाला फ्लैट अपने नाम आवंटित करा लिया और हमारा वाला फ्लैट बैंक ने खाली कर दिया। सामने वाला फ्लैट बहुत अच्छा था। उसमें धूप खूब आती थी और हवा भी पर्याप्त आती थी। इससे वह सभी ऋतुओं में आरामदायक था।
इसी मकान में ऊपर के एक फ्लैट में बैंक ऑफ बड़ौदा के एक वरिष्ठ प्रबंधक श्री डी.पी. सिंह रहते थे। उनके बगल का फ्लैट बन्द था और सबसे ऊपर के फ्लैट में दैनिक जागरण में कार्यरत पत्रकार श्रीमती रोमी अरोड़ा का परिवार रहता था। भूमितल के दोनों फ्लैटों में मकान मालिक और मालकिन अपने पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहा करते थे। उनके पुत्र श्री अनिल कुमार सिंह वकील थे, हालांकि उनकी वकालत हमने कभी चलते नहीं देखी। पुत्रवधू श्रीमती रेनू सिंह डाक्टर थीं और उस समय गणेशशंकर विद्यार्थी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय में कोई पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कर रही थीं। उसके कुछ समय बाद वे राज्य सरकार की चिकित्सा सेवा में आ गयीं और उनकी पोस्टिंग भी कानपुर में ही हो गयी। उनका विवाह हमारे कानपुर आने से एक वर्ष पहले ही हुआ था और बाद में वे एक पुत्री के माता-पिता बने। उनकी पुत्री कृतिका अपने माँ-बाप की तरह ही सुन्दर और योग्य है।
हमारे सभी पड़ोसियों के साथ शीघ्र ही बहुत अच्छे सम्बंध बन गये, जैसा कि हमारी श्रीमती जी के लिए स्वाभाविक है। उनका स्वभाव इतना अच्छा है कि पड़ोसियों से जल्दी ही घनिष्टता हो जाती है। उस बिल्डिंग के ही नहीं आसपास के कई पड़ोसियों से हमारी घनिष्टता हो गयी थी। उनमें से हमारे बायीं ओर के मकान में रहने वाले पड़ोसी थे श्री धीरेन्द्र नाथ पांडे। उनके पिताजी थे श्री सुरेन्द्र नाथ पांडे, जिनका देहान्त हमारे आने से दो साल पूर्व ही हुआ था और उनके नाम की पट्टी अभी भी वहाँ लगी रहती है, जिस पर लिखा हुआ है ‘भूतपूर्व क्रांतिकारी’। पहले मैं इसको मजाक समझता था, परन्तु बाद में पता चला कि वे वास्तव में महान् क्रांतिकारी शहीद चन्द्रशेखर आजाद के साथी थे और प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। अनेक बड़े कांग्रेसी नेताओं से उनकी घनिष्टता थी, जो प्रायः उनके घर आया करते थे। जब धीरेन्द्र जी से मेरा परिचय हुआ, तो वे मेरे बारे में जानकर बहुत प्रसन्न हुए। वे मेरी बहुत इज्जत करते थे और प्रायः गपशप करने मेरे पास आ जाते थे। मैं क्योंकि सुन नहीं सकता, इसलिए वे लिखकर ही सब बातें करते थे। वे अपने पिताजी की क्रांतिकारिता की ऐतिहासिक बातें मुझे बताया करते थे, जिनको मैं बड़ी रुचि के साथ सुनता-समझता था। उनके पुत्र श्री सुधीर जी भी मुझे बहुत मानते थे।
हमारा निवास जिस चौराहे के निकट था, वह ‘मोतीझील चौराहा’ के नाम से पूरे कानपुर में प्रसिद्ध है। उसकी प्रसिद्धि का कारण मोतीझील नहीं, बल्कि उस चौराहे के आस-पास बनी हुई खाने-पीने की दुकानें हैं। वहाँ कई अच्छे रेस्टोरेंट और मिठाई की दुकानें हैं। साथ में एक आइसक्रीम की ऐसी दुकान है, जिस पर साल में दस महीने भीड़ बनी रहती है। वहाँ की पिस्ता कुल्फी बहुत मशहूर है, जो हमें भी बहुत अच्छी लगती थी। वास्तव में किसी समय पूरा मोतीझील क्षेत्र ही खाने-पीने की दुकानों का गढ़ था। वहाँ स्वरूप नगर को मोतीझील चौराहे से जोड़ने वाली लगभग एक किलोमीटर लम्बी एक सीधी सड़क है, जो मोतीझील के किनारे-किनारे जाती है। उस पर किसी समय दिन-रात मेला-सा लगा रहता था। वहाँ सड़क के दोनों ओर खाने-पीने की चीजों की कच्ची-पक्की अनेक दुकानें बन गयी थीं। बाद में भाजपा सरकार बनने पर वहाँ से दुकानों को हटाया गया। लेकिन मोतीझील चौराहा रेस्टोरेंटों के कारण आबाद बना रहा।
जब हम उस घर में आये तो सबसे पहली चिन्ता हमें अपने पुत्र दीपांक का प्रवेश कराने की हुई। वह वाराणसी में एक सरस्वती शिशु मंदिर में कक्षा 2 में पढ़ रहा था, इसलिए हम किसी शिशु मंदिर में ही उसका प्रवेश कराना चाहते थे। हमारे घर के निकटतम शिशु मंदिर था कौशलपुरी का सनातन धर्म सरस्वती शिशु मंदिर, जो कई कारणों से बहुत प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित है। हम वाराणसी से स्थानांतरण प्रमाणपत्र साथ ले आये थे, इसलिए हमें उसका प्रवेश होने की पूरी आशा थी। फिर भी हमने अपने घनिष्ट परिचित प्रचारक डा. अशोक वार्ष्णेय से उस विद्यालय के प्रधानाचार्य के नाम एक पत्र ले लिया। उस पत्र तथा अन्य कागजों को लेकर मैं अशोक नगर के संघचालक मा. ब्रज लाल गुप्त तथा एक अन्य स्वयंसेवक मा. ओम प्रकाश शर्मा के साथ कौशलपुरी के सरस्वती शिशु मंदिर में गया और वहाँ दीपांक का प्रवेश करा दिया। वह विद्यालय हालांकि हमारे घर से मुश्किल से आधा किलोमीटर दूर है, परन्तु रास्ते में छोटे-बड़े तीन चौराहे पड़ते हैं और एक रेलवे लाइन भी पार करनी पड़ती है। इसलिए आने-जाने के लिए हमने उसी स्कूल का रिक्शा भी तय कर दिया। इस प्रकार उस विद्यालय में दीपांक की पढ़ाई सुचारु रूप से चलने लगी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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