आत्मकथा भाग-3 अंश-15

मेरठ में प्राकृतिक चिकित्सा
कानपुर में डा. आनन्द से असफल प्राकृतिक चिकित्सा कराने के बाद भी मैं योग करने उनके मोतीझील स्थित योग केन्द्र पर जाया करता था। वहाँ योग सम्बंधी पुस्तकों की एक छोटी-सी दुकान भी है। एक बार उस दुकान पर मुझे मेरठ के स्वामी जगदीश्वरानन्द जी सरस्वती की एक पुस्तक मिली, जिसमें बताया गया था कि स्वामी जी अपने ‘जीवन निर्माण केन्द्र’ नामक आश्रम में प्राकृतिक उपचार करते हैं और सभी रोगों की सफल चिकित्सा करते हैं। उस पुस्तक को पढ़कर मुझे लगा कि यदि मैं स्वामीजी के निर्देशन में 40 दिन का उपवास कर लूँ, तो सम्भव है कि मेरे कान ठीक हो जायें। यह सोचकर मैंने स्वामीजी को एक पत्र लिख डाला और उनसे उपचार हेतु उनके आश्रम में आने की अनुमति माँगी।
शीघ्र ही मुझे उनका उत्तर प्राप्त हो गया और उन्होंने आने के लिए कहा। मैंने अपनी सुविधा के अनुसार मेरठ जाने के लिए रिजर्वेशन करा लिया। मुझे वहाँ जाने के लिए कम से कम एक माह का अवकाश चाहिए था। मंडलीय कार्यालय में उन दिनों सिन्हा जी हमारे सहायक महाप्रबंधक थे, जो अधिकारियों को छुट्टी न देने के लिए कुख्यात थे। प्रशासन विभाग में उनके एक चमचे थे श्री डी.पी. अरोड़ा, जो स्वयं को सुपर ए.जी.एम. समझते थे। मैं उन्हें पीठ पीछे ‘रोड़ा जी’ कहा करता था, क्योंकि वे हमारे हर काम में रोड़ा अटकाते थे।
इलाज के लिए छुट्टी माँगते हुए मैंने जो एप्लीकेशन लिखा, वह उन्होंने पहले अस्वीकृत करवा दिया। इस पर मैंने एक लम्बा पत्र लिखा कि जब सबको इलाज कराने की छुट्टी दी जाती है, तो मुझे इससे वंचित क्यों किया जा रहा है? यहाँ मेरे मित्र श्री प्रवीण कुमार (राजभाषा अधिकारी) मेरी सहायता को आये। उन्होंने तत्कालीन मुख्य प्रबंधक श्री अरुणाभ राय को कुछ इस तरह समझाया कि वे छुट्टी देने को तैयार हो गये। वैसे यदि मुझे छुट्टी न मिलती, तो मैं इस मामले को हैड |ऑफिस तक ले जाने को तैयार था।
यहाँ यह बता दूँ कि उस समय हमारी श्रीमती जी आगरा गयी हुई थीं और मेरठ जाने का कार्यक्रम मैंने उनसे छिपकर बनाया था। अगर उन्हें पहले से पता होता, तो वे मुझे कभी न जाने देतीं, क्योंकि उनका प्राकृतिक चिकित्सा में कोई विश्वास कभी नहीं रहा। वैसे जाने से पहले मैंने उनको एक पत्र लिख दिया था कि मैं आरोग्य मंदिर, गोरखपुर जा रहा हूँ। केवल प्रवीण जी को यह मालूम था कि मैं गोरखपुर नहीं, बल्कि मेरठ जा रहा हूँ।
खैर, निर्धारित दिन पर मैं संगम एक्सप्रेस में बैठकर मेरठ पहुँच गया। वहाँ से पूछताछ करते हुए मैं एक बस में बैठकर स्वामीजी के आश्रम, जो बागपत रोड पर पाँचली गाँव में सड़क के किनारे ही है, पहुँच गया। मुझे आश्रम के नियमानुसार अपना बिस्तर और बर्तन साथ लाने चाहिए थे, परन्तु मुझे इसकी सूचना नहीं थी, इसलिए आश्रम में एक प्रशिक्षणार्थी बहिन साधना जी ने सारी व्यवस्था कर दी। उस आश्रम में मैं पूरे दो माह रहा। इस चिकित्सा की पूरी डायरी या कहानी मैंने अलग से परिशिष्ट ‘क’ में लिखी है।
संक्षेप में इतना ही जान लीजिए कि मुझे पहले तीन दिन का और फिर 10 दिन का उपवास कराया गया। बीच-बीच में दूसरे उपचार भी दिये गये। हालांकि वहाँ रहते हुए मेरे कानों में कोई लाभ नजर नहीं आया, लेकिन अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ आँख, नाक आदि बहुत तेज हो गयी थीं। मेरा शरीर पूरी तरह नया जैसा हो गया था। मेरा वजन बहुत घट गया था, लेकिन कार्यक्षमता बहुत बढ़ गयी थी। मैं वहाँ दो माह और रहना चाहता था, लेकिन श्रीमतीजी तथा घरवालों के लगातार दबाव के कारण मुझे बीच में ही आना पड़ा। इसका मुझे आज तक अफसोस है। सोचता हूँ कि यदि मैं दो महीने और वहाँ रह जाता तो सम्भव था कि मेरे कान ठीक हो जाते। परन्तु लगता है कि मेरे पूर्व कर्मों के पापों का पूरा प्रायश्चित अभी तक नहीं हुआ है, इसलिए अपनी प्राकृतिक चिकित्सा कराने का मेरा यह पाँचवाँ और अभी तक का अन्तिम प्रयास भी अधूरा और असफल रहा।
वैसे वह आश्रम बहुत अच्छी चिकित्सा करता था। मैंने स्वयं देखा था कि अनेक भयंकर रोगों से पीड़ित लोग वहाँ अपना उपचार कराते थे और कुछ ही सप्ताह में ठीक होकर जाते थे। उनके उपचार की प्रणाली बहुत उत्तम है। इस बारे में मैंने विस्तार से परिशिष्ठ ‘क’ में लिखा है।
सूरज भाईसाहब का गुर्दा प्रत्यारोपण
जब दो महीने बाद मैं जुलाई, 1997 में वापस कानपुर आया, तब तक मेरे पीछे दो मुख्य घटनायें घट चुकी थीं। एक, हमारे चचेरे भाईसाहब डा. सूरजभान का गुर्दा प्रत्यारोपण का ऑपरेशन गंगाराम अस्पताल, दिल्ली में सफलतापूर्वक हो चुका था। ऑपरेशन के समय आवश्यक होने पर खून देने के लिए हमारी श्रीमतीजी भी मुकेश के साथ दिल्ली गयी थीं। मैं तो मेरठ में था। श्रीमतीजी का विचार दिल्ली से मेरठ आने (और मुझे जबर्दस्ती वापस ले जाने) का भी था, परन्तु किसी कारणवश वे मेरठ नहीं आ सकीं, केवल मुकेश ही मेरा हालचाल लेने मेरठ आया था। गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद दो-तीन महीने भाईसाहब दिल्ली में ही रहे। बाद में वे मेरे सामने ही कानपुर वापस आये थे।
जब वे ऑपरेशन के बाद पहली बार अपने घर पहुँचे, तो मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि घोर आर्यसमाजी होते हुए भी उन्होंने अपने घर पर लगी हुईं देवी-देवताओं की मूर्तियों और चित्रों को भूमि पर माथा टेककर प्रणाम किया, मानो वे उन्हीं की कृपा से जिन्दा वापस आये हों। यह देखकर मैं मन ही मन बहुत क्रोधित हुआ, परन्तु प्रत्यक्षतः मैंने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की, क्योंकि बीमार आदमी से कुछ भी कहना अनुचित होता।
मोना का विद्यालय प्रवेश
दूसरी घटना यह थी कि हमारी पुत्री आस्था (मोना), जो उस समय साढ़े 3 साल की हो चुकी थी, का विद्यालय प्रवेश कौशलपुरी, कानपुर के उसी सनातन धर्म सरस्वती शिशु मंदिर में प्रवेशिका अर्थात् के.जी. में करा दिया गया, जिसमें हमारा पुत्र दीपांक पहले से पढ़ रहा था। उसका प्रवेश सरलता से हो गया, क्योंकि वहाँ के सभी आचार्य और प्रधानाचार्य भी हमें अच्छी तरह जानते थे।
यहाँ यह बता देना अनुचित न होगा कि राष्ट्रभाषा हिन्दी का पक्षपाती होने के कारण मैं बच्चों की शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से ही दिलवाने के पक्ष में था और हूँ। यद्यपि मैं ऐसे कई स्वयंसेवकों को जानता हूँ, जो स्वयं सरस्वती शिशु मन्दिरों के प्रबंधक तक रहे हैं, लेकिन अपने बच्चों का प्रवेश ईसाइयों के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में कराते हैं। कथनी और करनी में ऐसा अन्तर मुझे बहुत क्षुब्ध करता है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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