आत्मकथा भाग-3 अंश-14
कानपुर में प्राकृतिक चिकित्सा
1996 में जिन दिनों हमारे भाईसाहब डा. सूरजभान की गुर्दों की चिकित्सा हो रही थी, उन्हीं दिनों मुझे कई बार संजय गाँधी स्नातकोत्तर चिकित्सा संस्थान, लखनऊ (जिसे संक्षेप में पी.जी.आई. कहा जाता है) में जाने का अवसर मिला। उन दिनों मुकेश के एक रिश्तेदार लड़के पंकज का गुर्दा प्रत्यारोपण भी पी.जी.आई. में हुआ था। तभी मुकेश ने मुझसे यह कहा कि मैं अपने कानों की चिकित्सा भी वहीं करा लूँ। मुझे विचार जँच गया और मैं वहाँ डाक्टरों से मिला। मेरे कई टैस्ट हुए, एमआरआई भी करायी, परन्तु मेरे कानों की बीमारी डाक्टरों की पकड़ में नहीं आयी। उन्होंने मुझे यही सुझाव दिया कि मुझे लगातार हीयरिंग ऐड (कान की मशीन) का उपयोग करना चाहिए, जिससे एक-दो साल में मैं काम चलाऊ सुनने लगूँगा।
यह सलाह मिलने पर मैंने लखनऊ में ही एक अच्छा हीयरिंग ऐड खरीद लिया, जो तब 5 हजार रुपये का था। उस समय मेरे पास पूरे रुपये नहीं थे, इसलिए अपने बैंक के एक अधिकारी श्री सुधीर श्रीवास्तव, जो मेरे साथ वाराणसी में रह चुके थे और उस समय लखनऊ मुख्य शाखा में पदस्थ थे, की जमानत पर दुकानदार ने कुछ रुपये उधार रख लिये, जो मैंने बाद में भेज दिये। मैं नियम से मशीन लगाने लगा और आवाजें पहचानने की कोशिश करने लगा।
तभी मेरा यह विचार बना कि यदि कानों की प्राकृतिक चिकित्सा कराऊँ, तो सम्भव है कि कानों में कुछ सुधार हो जाये और मशीन की सहायता से मैं बातें करने में सफल हो जाऊँ। कानपुर में एक प्राकृतिक चिकित्सक हैं डा. ओम प्रकाश आनन्द। उनका काफी नाम है। उनका मुख्य योग केन्द्र तो मोतीझील पर है, परन्तु चिकित्सा अपने गीता नगर वाले निवास पर फीस लेकर करते हैं। जब मैं मुकेश के साथ उनसे मिला, तो उन्होंने कहा कि 15 दिन यहाँ आकर क्रियाएँ सीखो, फिर घर पर करते रहना। इससे कानों को फायदा हो जाएगा।
इस पर विश्वास करके मैं 500 रु. फीस देकर वहाँ 15-20 दिन प्रातःकाल 2 घंटे के लिए जाता था। मैंने वहाँ कई क्रियाएँ सीखीं, बहुत सी पहले से जानता था, साथ में चुम्बक चिकित्सा भी कराई, परन्तु मेरा दुर्भाग्य कि लम्बे समय तक करने के बाद भी मेरे कानों में कोई सुधार नजर नहीं आया। मशीन लगाने से भी मुझे कोई लाभ नहीं हुआ और मैं परेशान भी होने लगा, इससे मैंने मशीन लगाना भी बन्द कर दिया। वह मशीन बाद में भी मैंने बहुत दिन लगायी, परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। कान की वह मशीन अभी भी मेरे पास रखी है, हालांकि अब वह लगभग बेकार हो गयी है।
महरी के लड़के के घाव की चिकित्सा
यह मई 1997 की बात है। श्रीमती जी और बच्चे छुट्टियों में आगरा गये हुए थे और मैं अकेला ही कानपुर में रह रहा था। हमारे यहाँ एक महरी काम करने आती थी। एक दिन उसने मुझे बताया कि उसके 8-9 साल के बेटे की जाँघ में एक घाव हो गया है, जिसको 15-20 दिन हो गये हैं और ठीक होने में नहीं आ रहा है। एक डाक्टर रोज उसकी मरहम-पट्टी करता है और 25 रुपये ले लेता है। इससे वह बहुत परेशान हो गयी थी।
मैं उस समय तक घावों पर पुराने मूत्र के अच्छे असर से अच्छी तरह परिचित था। कई घाव मैंने उससे ठीक किये थे। मैं एक बोतल में पुराना मूत्र भरकर रखता था। मैंने उसे उस लड़के पर आजमाने की सोची। मैंने महरी को केवल यह बताया कि मेरे पास एक ऐसी दवा है, जिससे घाव केवल 3 दिन में ठीक हो जाएगा। पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन आजमाकर देखने के लिए वह तैयार हो गयी, क्योंकि उसका कोई खर्च भी नहीं होना था।
उसी दिन शाम को ऑफिस से आने के बाद मैं उसके घर गया। उसका लड़का दर्द से बेहाल था। उसकी जाँघ के जोड़ में करीब 3 इंच लम्बा घाव था। छूने पर भी वह चीखने लगता था। रोज पट्टी बदलने पर भी उसे दर्द सहन करना पड़ता था। बड़ी मुश्किल से उसने वह पट्टी खोलने दी। पट्टी खोलकर मैंने देखा कि डाक्टर या कंपाउंडर ने उस घाव में कपड़े का एक टुकड़ा तह करके ठूँसा हुआ था, जिसमें कोई दवा भी लगी होगी। ऊपर से वह पट्टी बाँध देता था। एक बार तो मैं डर गया और सोचा कि इसे ऐसे ही रहने दूँ। फिर हिम्मत करके वह कपड़ा घाव में से निकाला। लड़का बुरी तरह चीखा, लेकिन कपड़ा निकल आने पर उसे राहत मिली।
तब मैंने पहले तो साफ रुई से उसके घाव को पोंछा, फिर पुराने मूत्र में रुई भिगोकर उस पर इस तरह रख दी कि घाव पूरा ढक गया। पुराना मूत्र जब घाव पर लगता है, तो पहले बहुत जलन होती है। मूत्र में भीगी रुई लगाने पर लड़का फिर चीखा, लेकिन थोड़ी देर बाद ही शान्त हो गया। फिर मैंने एक पट्टी उस पर इस तरह बाँध दी कि रुई ढक जाये। इसके साथ ही मैंने मूत्र की शीशी उसकी बड़ी बहन को दी और कहा कि हर घंटे बाद एक ढक्कन भरकर यह दवा पट्टी के ऊपर इस तरह डालनी है कि भीतर की रुई तर हो जाये। रुई सूखनी नहीं चाहिए। यह रात में सो जाये, तो दवा डालने की जरूरत नहीं है। मैं सुबह फिर आने की कहकर चला आया।
मरहम पट्टी करने वाले डाक्टर ने उस दिन उसे एक गोली भी दी थी, जो रात को खिलानी थी। उस एक गोली की कीमत 36 रुपये थी। महरी मुझसे पूछने लगी कि इस गोली का क्या करूँ। मैंने कहा कि अगर वापस हो जाये, तो कर दो। वह बोली कि वापस नहीं होगी, तो मैंने कहा कि खिला देना।
दूसरे दिन सुबह मैं वहाँ गया, तो वह लड़का मजे में पैर लटकाये हुए एक खाट पर बैठा था। मुझे देखकर वह इतना प्रसन्न हुआ, जैसे उसने कोई देवदूत देख लिया हो। मैंने उसकी पट्टी खोली। इस बार वह बिल्कुल चीखा-चिल्लाया नहीं, हालांकि दर्द हो रहा था। मैंने पट्टी खोलकर देखा, तो पाया कि वह घाव दोनों ओर से चिपक गया था, जैसी कि मुझे आशा थी। रुई पर काफी खून और मवाद लग गया था, इसलिए मैंने रुई बदल दी और नई रुई को मूत्र में तर करके फिर बाँध दिया। इसके साथ ही मैंने उसकी बड़ी बहन से कह दिया कि उसी तरह रुई को दवा से तर करती रहो।
संयोग से उसी दिन मुझे रात को मेरठ जाना था। इसलिए बाद में मैं उसे देखने नहीं जा पाया। जब लगभग दो महीने बाद मैं मेरठ से लौटकर आया, तो मैंने महरी से उसके लड़के का हाल पूछा। उसने बताया कि वह घाव तीन-चार दिन में ठीक हो गया था और फिर कभी डाक्टर से मरहम-पट्टी नहीं करानी पड़ी। परन्तु वह मूर्ख औरत यह समझ रही थी कि यह चमत्कार उस 36 रुपये वाली गोली का था, न कि उस दवा का जो मैं लगा गया था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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