आत्मकथा भाग-3 अंश-12

शिवानी
जब हमने अपना पीछे वाला फ्लैट खाली कर दिया, तो उसमें एक मारवाड़ी जोड़ा रहने के लिए आया। उनका हाल ही में विवाह हुआ था। पति का नाम था श्री राजेश बियानी और उनकी पत्नी का नाम था शिवानी। राजेश जी चार्टर्ड एकाउंटेंट थे। वे बहुत सीधे-साधे सज्जन थे। शिवानी बहुत सुन्दर और हँसमुख थी। शीघ्र ही उनकी घनिष्टता हमारे परिवार से हो गयी। उस समय तक हमारी श्रीमती जी बहुत अकेली हो गयी थीं, क्योंकि सरदारनी जी के चले जाने के बाद उनसे बातें करने वाली कोई नहीं थी। शिवानी के आ जाने के बाद उनका मन लग गया। वह थी भी बहुत प्यारी। अपने घर का काम खत्म करने के बाद लगभग सारे समय हमारे ही फ्लैट में रहती थी।
वह बहुत बिंदास (बोल्ड) भी थी। जैसा महसूस करती थी फौरन बोल देती थी। एक बार की बात, वे हमारी श्रीमती जी के साथ अशोक नगर के एक होम्योपैथिक डाक्टर को दिखाने गयीं। जब काफी देर तक डाक्टर ने किसी मरीज को नहीं बुलाया, तो उन्होंने जाकर देखा कि क्या बात है। वास्तव में डाक्टर साहब किसी से फोन पर बात कर रहे थे और आधा घंटा बीतने पर भी बात खत्म नहीं हो रही थी। तो शिवानी ने फौरन डाक्टर को डाँट दिया कि इतने मरीज आपसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं और आप इतनी देर से फोन पर फालतू बातें किये जा रहे हैं। आपके लिए दूसरों के समय की कोई कीमत नहीं है? यह सुनकर बेचारे डाक्टर साहब सहम गये और फौरन फोन बन्द करके मरीज देखने में लग गये।
लगभग 2 वर्ष वहाँ रहने के बाद शिवानी ने कानपुर में ही श्याम नगर के इलाके में अपना फ्लैट खरीद लिया था और उसमें चली गयी थी। हम उसके गृहप्रवेश में तो नहीं जा पाये, परन्तु बाद में मिलने गये थे। बाद में उसके एक बच्ची हुई, जिसके साथ वह हमसे मिलने आयी थी। वह अभी भी कानपुर में रहती है, परन्तु उससे हमारा सम्पर्क टूट गया है।
कम्प्यूटर विभाग में नये सहयोगी
मैं ऊपर लिख चुका हूँ कि एडवांसशीट के कार्य के कारण मंडलीय कार्यालय से हमारा टकराव हुआ, जो भगवान की कृपा से ठीक-ठीक हल हो गया। इससे कुछ समय पहले ही मेरे विभाग में दो नये अधिकारी आये, जो संयोग से दोनों महिलायें थीं। उनमें से एक श्रीमती माला भट्ट उन दिनों कानपुर मुख्य शाखा में थीं और उनका चयन सिद्धान्त रूप में कम्प्यूटर विभाग में पोस्टिंग के लिए हो चुका था। वे तीन पुत्रियों की माँ थीं, कोई पुत्र नहीं था। उनके पति श्री भट्ट कानपुर में ही जीवन बीमा निगम में बाबू थे और रोज माला जी को लेने तथा छोड़ने आते थे। हालांकि कम्प्यूटर के बारे में माला जी का ज्ञान उस समय मामूली ही था, लेकिन काम सीखने की ललक और परिश्रमशीलता के कारण शीघ्र ही वे अपने कार्य में पारंगत हो गयीं।
दूसरी थीं श्रीमती रेणु सक्सेना, जो कुछ समय पूर्व इलाहाबाद से स्थानांतरित होकर कानपुर आयी थीं और प्रारम्भ में उनको मुख्य शाखा में ही लगाया गया था। लेकिन तत्कालीन स.म.प्र. श्री सिन्हा जी से प्रार्थना करके उन्होंने अपनी पोस्टिंग कम्प्यूटर सेंटर में करा ली थी और हमारे एक अधिकारी श्री शैलेश कुमार को उनकी जगह मुख्य शाखा में भेज दिया गया था।
रेणु जी वैसे तो बहुत हँसमुख और योग्य थीं, काम भी अच्छा करती थीं, लेकिन उनमें अपना महत्व दिखाने की प्रवृत्ति बहुत थी। कोई काम करने के लिए कहने पर वे हमेशा यही दिखाने की कोशिश करती थीं कि वे बहुत व्यस्त हैं। उनका दूसरा ‘गुण’ था- लगातार बोलना। कोई सुन रहा हो या न सुन रहा हो, कोई जबाव दे रहा हो या न दे रहा हो, पर उनको बिना रुके लगातार बोलते ही जाना था। इससे हमारे कम्प्यूटर केन्द्र में रौनक सी बनी रहती थी, हालांकि कुछ लोग मन ही मन नाराज भी होते थे।
बाद में दो अन्य नयी महिला अधिकारी भी हमारे कम्प्यूटर सेंटर में पदस्थापित हुईं। उनमें पहली अधिकारी थीं श्रीमती शालू सेठ। वे हमारी कानपुर सेवा शाखा के एक बड़े बाबू श्री आर.के. सेठ की पुत्रवधू थीं। जब मुझे पता चला कि एक बड़े बाबू की बहू यहाँ आने वाली है, तो मैंने मन ही मन सोचा कि यहाँ आकर वह काम क्या करेगी, बस बैठी-बैठी बातें करेगी और अनुशासन तोड़ेगी।
लेकिन मैं बहुत गलती पर था। उनके आने के शीघ्र बाद ही हमें पता चल गया कि वे कम्प्यूटर विभाग के ही नहीं समस्त मंडलीय कार्यालय और मुख्य शाखा के श्रेष्ठ अधिकारियों में भी सर्वश्रेष्ठ हैं। हालांकि प्रारम्भ में उनके पास कम्प्यूटर में मात्र ‘ओ लेवल’ का सर्टीफिकेट था, जिसे मैं मजाक में ‘जीरो लेवल’ कहा करता था। लेकिन उनका ज्ञान किसी भी विषय में औरों से कम नहीं था। उनकी प्रतिभा का हाल यह था कि उन्होंने एक इंस्टीट्यूट से ‘सी’ भाषा में प्रोग्रामिंग का 6 माह का कोर्स किया था और वह कोर्स पूरा करते ही उसी इंस्टीट्यूट ने उन्हें सी भाषा पढ़ाने के लिए रख लिया था। बाद में बैंक में उनका चयन हो जाने के बाद उन्होंने वह इंस्टीट्यूट छोड़ दिया था।
शालू कुछ ऐसे कोर्स पढ़कर आयी थीं, जो तब तक मैंने नहीं पढ़े थे, जैसे फाॅक्सप्रो तथा विजुअल बेसिक। मैंने इनको शालू से ही सीखा। यों मैं डीबेस3 जानता था, लेकिन फाॅक्सप्रो इसी पर आधारित और अधिक उन्नत डाटाबेस प्रबंधन पैकेज है। इसमें डाटा प्रविष्टि के लिए स्क्रीन बनाने की ऐसी सुविधा उपलब्ध है, जो डीबेस3 में नहीं है। इसके अलावा इसको विंडोज वातावरण में भी चलाया जा सकता है, जो डीबेस3 में सम्भव नहीं है। इसलिए मैंने शालू के द्वारा फाॅक्सप्रो सीखी और उसका बैंक के कार्यों में भरपूर उपयोग किया। इसका एक कारण यह भी था कि हमारे प्रधान कार्यालय ने पुराने मिनी कम्प्यूटर के साथ ही उस पर चलने वाले साॅफ्टवेयर यूनिक्स, यूनीफाई और आर.पी.टी. वगैरह को पूरी तरह छोड़ देने का आदेश दिया था और हमें फाॅक्सप्रो सभी प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त लगा था, जिसे छोटे पर्सनल कम्प्यूटरों (पीसी) पर भी सुविधापूर्वक चलाया जा सकता है। इसी प्रकार विजुअल बेसिक का प्रारम्भिक ज्ञान भी मैंने शालू सेठ से ही प्राप्त किया था, जिसे बाद में अपने अध्ययन से बढ़ाया।
शालू के साथ ही एक अन्य अधिकारी हमारे बैंक की सेवा में आयीं। उनका नाम है- तेजविन्दर कौर। जैसा कि नाम से स्पष्ट है वे एक सिख लड़की हैं। उनकी शादी नहीं हुई थी और शायद अभी तक नहीं हुई है। शालू के ‘ओ लेवल’ की तुलना में उन्होंने ‘ए लेवल’ कोर्स कर रखा था और एक प्रकार से शालू से अधिक पढ़ी-लिखी थीं। प्रारम्भ में उनको हमारे बैंक की सेवा शाखा, कानपुर में रखा गया, हालांकि वे कार्य हमारे कम्प्यूटर सेंटर पर बैठकर ही करती थीं, क्योंकि उस समय सेवा शाखा में कोई कम्प्यूटर नहीं था। कुछ समय बाद वे भी सेवा शाखा से हमारे कम्प्यूटर केन्द्र में स्थानांतरित हो गयी थीं।
एक ही विभाग में चार-चार महिलाओं का होना अन्य विभागों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। उनके कारण हमारे विभाग में रौनक बनी रहती थी और बिल्कुल भी बोरियत नहीं होती थी। लेकिन इसके साथ ही हमें बहुत सावधान भी रहना पड़ता था, ताकि कोई अमर्यादित बात मुँह से न निकल जाये। वैसे सभी महिला अधिकारी बहुत सहयोगात्मक थीं और प्रत्यक्ष रूप में मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं थी। समस्त कार्य वे आपस में बाँटकर कर लेती थीं और एक-दूसरे का ज्ञान बढ़ाया करती थीं।
वैसे कभी-कभी मुझे इससे बहुत परेशानी होती थी। इसका कारण यह था कि कोई कार्य जो अकेला व्यक्ति आराम से कर सकता है, उसे भी वे चारों मिलकर किया करती थीं। इससे बहुत समय नष्ट होता था। गणित का ‘नियम’ है कि जिस कार्य को एक महिला एक घंटे में करती है, उसी कार्य को दो महिलायें मिलकर दो घंटों में करेंगी, उसी कार्य को तीन महिलाएँ मिलकर तीन घंटों में करेंगी और उसी कार्य को चार महिलाएँ मिलकर चार घंटों में करेंगी। मुझे इस ‘नियम’ की सत्यता का अनुभव लगभग रोज ही होता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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