आत्मकथा भाग-3 अंश-10
हमारी शाखा में एक अन्य स्वयंसेवक थे श्री ओम प्रकाश जी शर्मा। आप उस समय मात्र 73 वर्ष के युवक थे। बंशीलाल जी की तरह वे भी लाहौर के मूल निवासी थे और विभाजन के बाद अमृतसर में आये थे। वहाँ से वे कानपुर चले आये। उनके तीन पुत्र हैं, जो सभी अपनी-अपनी जीविका चला रहे हैं। दुर्भाग्य से उनकी श्रीमतीजी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और हमारे कानपुर छोड़ने के कुछ समय बाद ही उनके देहान्त का समाचार मिला था। ओम प्रकाश जी के चेहरे पर भले ही वृद्धावस्था की झुर्रियाँ हैं, लेकिन शरीर में युवकों जैसा उत्साह और जिन्दादिली है। उनको संघकार्य में इतनी निष्ठा है कि स्वस्थ होने पर बिना नागा शाखा आते हैं और उत्साहपूर्वक सारे कार्य करते हैं। जनसम्पर्क करने का उनका तरीका भी अपने आप में एक उदाहरण है। वे अपरिचित व्यक्तियों से भी इतनी आत्मीयता से बात करते हैं जैसे उनसे बरसों की जान-पहचान हो। उन्हें इस बात का पूरा ध्यान है कि उनका शरीर अधिक दिनों तक साथ नहीं देगा। इसलिए कहा करते हैं कि यह शरीर छूटने के बाद फिर जन्म लेकर संघकार्य करूँगा। ऐसे स्वयंसेवक के समक्ष कौन नतमस्तक नहीं होगा?
श्री ओम प्रकाश जी शर्मा ने अयोध्या के राम जन्मभूमि मन्दिर आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। पुलिस की लाठी उनकी दायीं बाँह पर इतनी इतनी जोर की पड़ी थी कि बाँह लगभग बेकार होकर झूल गयी थी। जब मैं कानपुर आया था तब भी उनकी बाँह में असहनीय दर्द होता था। उनका वह हाथ कभी भी कंधे से ऊपर नहीं उठता था। तभी बम्बई के किसी डाक्टर ने उनको बताया कि तालियाँ बजाया करो, इससे हाथ ठीक हो जायेगा। इस पर वे दिनभर कभी भी मौका मिलते ही तालियाँ बजाते रहते थे, अधिक जोर से नहीं, बस इतनी जोर से कि उसकी आवाज भी किसी को सुनाई न पड़े।
हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब हमने देखा कि मात्र तालियाँ बजाने से उनका हाथ केवल 6 माह में 90 प्रतिशत से अधिक ठीक हो गया और अगले 6 माह में पूरी तरह ठीक हो गया। अब उनका हाथ पूरा उठ जाता है और सारे कार्य कर लेते हैं। दर्द बिल्कुल नहीं है। तालियाँ बजाने का यह उपचार मैंने पंचकूला में भी एक सज्जन पर आजमाया और ईश्वर की कृपा से उनको भी पूरी सफलता मिली। तब से मैं हाथों में दर्द या कमजोरी की शिकायत करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इन दोनों का उदाहरण देते हुए ताली बजाने की सलाह दिया करता हूँ। जो इस सलाह को मानते हैं वे लाभ उठा लेते हैं।
नगर में उनके ही समवयस्क एक स्वयंसेवक थे श्री गुरु नारायण जी बहल। वे किसी प्राइवेट कम्पनी या कारखाने में एकाउंटेंट थे और अवकाश प्राप्त कर चुके थे। उसके बाद उनका अधिकांश समय संघकार्य में ही जाता था। उनकी एक आँख में रोशनी बिल्कुल नहीं थी, इसलिए काला चश्मा लगाये रहते थे। उनके चार या पाँच पुत्रियाँ और केवल एक पुत्र हैं। सभी का विवाह हो चुका है। सबसे छोटी पुत्री निधि (गुड़िया) का विवाह हमारे सामने ही कानपुर में हुआ था। उसकी ससुराल मेरठ में है। गुरु नारायण जी के पुत्र श्री विजय कुमार बहल दिल्ली सरकार में कलाकार हैं। अब वे नौयडा सेक्टर 62 में रहते हैं। गुरु नारायण जी भी वहीं चले गये हैं। एक बार नौयडा में मैं उनके दर्शन कर चुका हूँ। पहले उनसे नियमित पत्र व्यवहार होता था, परन्तु अब काफी दिनों से कोई पत्र नहीं आया है।
(पादटीप- बहल जी की एक पुत्री लखनऊ में ब्याही हैं। एक बार वे उनके यहाँ आये, तो मेरा पता लेकर मुझसे मिलने भी आये थे। उस समय मैं लखनऊ में ही रहता था, जिसका ज्ञान उनको था। उसके बाद उनके दर्शन नहीं कर पाया हूँ और कोई समाचार भी नहीं मिला है।)
इन्हीं के समवयस्क एक अन्य स्वयंसेवक भी अशोकनगर शाखा में आते थे। वे हैं श्री दामोदर प्रसाद तिवारी। वे पहले किसी न्यायालय में टाइपिस्ट थे और अवकाश प्राप्त कर चुके थे। उसके बाद वे अशोकनगर के लोकमान्य तिलक पुस्तकालय के अवैतनिक पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में लगभग 30 वर्ष से अपनी सेवाएँ दे रहे थे और अभी भी दे रहे हैं।
इस विवरण से आप यह न समझिये कि अशोकनगर में केवल वृद्ध स्वयंसेवक ही थे। वहाँ युवक स्वयंसेवकों की भी एक बड़ी संख्या है, हालांकि वे शाखा आने में उतने नियमित नहीं हैं। मैं उनमें से कुछ का नामोल्लेख मात्र करना चाहता हूँ- सर्वश्री शारदा प्रसाद जी, दिनेश जी गुप्त (मा. ब्रज लाल जी के सुपुत्र), हरीश जी सक्सेना (जिनका बाद में किसी बीमारी से देहान्त हो गया), कीर्ति जी (राजू जी), सुभाष चन्द जी बाजपेई, हरमेश जी अग्रवाल, अशोक जी शर्मा आदि। इनमें से शारदा प्रसाद जी इसलिए स्मरणीय हैं कि वे तृतीय वर्ष प्रशिक्षित थे। वे आर.टी.ओ. पर फार्म तथा स्टैम्प पेपर बेचकर अपनी आजीविका चलाते थे। बाद में वे पंडिताई करने लगे थे।
अशोक नगर के अलावा गाँधी नगर की अन्य शाखाओं के स्वयंसेवकों से भी हमारा सम्पर्क रहता था। उनमें से कुछ के नाम उल्लेखनीय हैं। वहाँ सर्वश्री चेलाराम जी खत्री, लाल बहादुर सिंह जी, अमर नाथ जी, सन्तोष जी (जिन्होंने बाद में पारिवारिक कारणों से फिनायल पीकर आत्मघात कर लिया था), साहब सिंह जी आदि अनेक सम्माननीय और प्रेरणादायक स्वयंसेवक थे। उनमें से बहुतों के नाम मैं भूल गया हूँ। मा. चेला राम जी उन दिनों पांचजन्य साप्ताहिक वितरित करते थे। केवल साइकिल पर पूरे नगर क्षेत्र में घर-घर जाकर पांचजन्य पहुँचाया करते थे और साल भर में कमीशन के नाम पर जो कुछ बचता था, उसे गुरुदक्षिणा में दे दिया करते थे। वे चाय तक नहीं पीते थे। बाद में जब स्वास्थ्य के कारण उनके लिए साइकिल चलाना कठिन से कठिनतर होता गया, तो उन्होंने इस कार्य का भार एक अन्य स्वयंसेवक को सौंप दिया था।
कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरे प्रति इन सभी स्वयंसेवकों का बहुत स्नेह था और मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। प्रारम्भ में मुझे अपनी शाखा के सह मुख्य शिक्षक का दायित्व दिया गया था। बाद में मुख्य शिक्षक भी बना। फिर मैंने स्वयं ही अपने को सभी दायित्वों से मुक्त कर लिया, हालांकि शाखा और सभी कार्यक्रमों में मैं नियमित जाता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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