आत्मकथा भाग-2 अंश-55
विंध्यवासिनी के मंदिर के अलावा वाराणसी के आस-पास कई झरने भी हैं। ये झरने केवल बारिश के दिनों में या उसके तुरन्त बाद पूरे जोर से चालू हो जाते हैं और बाकी वर्ष भर उनमें नाममात्र का पानी रहता है। इसलिए अधिकतर लोग अगस्त-सितम्बर के महीनों में झरने देखने जाते हैं। सबसे पहले हमें झरना देखने का अवसर तब मिला, जब हमारे मंडलीय कार्यालय से एक बस पिकनिक के लिए देवधार नामक झरने पर गई। यह झरना काफी ऊँचाई से गिरता है, लेकिन इसका मजा केवल झरने के ऊपर से लिया जाता है। झरने की निचली सतह पर जाना कठिन ही नहीं लगभग असम्भव है। झरने के मुहाने से करीब 50 मीटर दूरी पर लोग नहाते हैं और पिकनिक मनाते हैं।
यह पिकनिक यात्रा हमारे तत्कालीन सहायक महा प्रबंधक श्री पी.एन. जेटली की पहल पर हुई थी। वे बहुत मस्तमौला आदमी थे, हालांकि काफी कड़े और अनुशासनप्रिय भी थे। इस पिकनिक में वे हाफ-पैंट पहनकर शामिल हुए थे। पहले हम झरने की नदी में खूब देर तक नहाये। फिर खाना खाकर इधर-उधर घूमे। खाना बनाने वाले लोग साथ गये थे। इस पिकनिक में पहली बार हम अधिकारियों के परिवार एक जगह मिले थे। एजीएम साहब की पत्नी से भी हमारी श्रीमती जी का परिचय हुआ। दुर्भाग्य से मेरे पास उस समय कोई कैमरा नहीं था। इसलिए मैं कोई फोटो नहीं खींच पाया। उस समय दीपांक केवल डेढ़ वर्ष का था और वहाँ खूब दौड़-भाग रहा था। एजीएम साहब भी उसे देखकर खुश हो रहे थे।
यहाँ मुझे एक बात याद आ गयी है। श्री पी.एन. जेटली वाराणसी आने से पहले मेरठ के सहायक महा प्रबंधक थे। उनके आने से पहले ही हमारे हिन्दी अधिकारी श्री नरेन्द्र प्रसाद धस्माना का स्थानांतरण मेरठ हो गया था और उनसे मेरा पत्र-व्यवहार चलता था। उन्होंने एक पत्र में मुझे लिखा कि हमारे बारे में वहाँ के कम्प्यूटर वालों की राय अच्छी नहीं है और वे यह समझते हैं कि वाराणसी में कोई काम नहीं होता। हालांकि नरेन्द्र जी ने उनको बताया था कि आपकी धारणा बिल्कुल गलत है और वाराणसी मंडल में ही सबसे अधिक कार्य होता है। फिर भी उनकी धारणा न बदलनी थी, न बदली। जब श्री जेटली वहाँ से हमारे मंडल में आये, तो उनका विचार भी हमारे बारे में कुछ ऐसा ही था और पहली ही बैठक में उन्होंने इसको प्रकट भी कर दिया था। लेकिन दो-तीन माह में ही हमारा काम देखकर उनकी धारणा बदल गयी और बाद में वे सबसे हमारी प्रशंसा किया करते थे।
अगली बार हमें पिकनिक पर जाने का मौका दो-तीन साल बाद मिला। तब हमारे एजीएम साहब थे श्री राम आसरे सिंह। इससे पूर्व श्री राम बिजय पांडेय जी लगभग 2 वर्ष हमारे एजीएम रह चुके थे, परन्तु हम कभी पिकनिक पर नहीं गये। इसका कारण यह था कि वाराणसी में रहते समय ही पहले पांडेय जी की पत्नी और फिर उनके पिताजी का देहावसान हो गया था। ऐसे शोक के वातावरण में किसी पिकनिक पर जाने का प्रश्न ही नहीं था। अतः जब पाण्डेय जी कानपुर स्थानांतरित हो गये और उनकी जगह श्री राम आसरे सिंह एजीएम बनकर आये, तो पिकनिक का प्रोग्राम बना लिया गया।
इस पिकनिक की सारी व्यवस्था हमारे एक अधिकारी श्री मनमोहन कूल ने की थी। वे स्वयं बहुत भीग गये थे, क्योंकि जाते समय बहुत बारिश हो रही थी। इस बार हम गये सिरसी बाँध को देखने, जहाँ एक बहुत ऊँचा झरना भी है। वहाँ प्रायः वर्ष भर पानी रहता है और समय-समय पर बाँध से पानी छोड़ा जाता है। पहले हम बाँध को देखने गये। काफी बड़ा बाँध है, जहाँ सोनभद्र की धारा को रोका जाता है। हम दिन भर झरने के नीचे नहाये और घूमे। उस समय पानी कम गिर रहा था, इसलिए कई लोग झरने से बिल्कुल पास जाकर नहाये। फिर दाल-बाटी का भोजन किया।
लेकिन शाम को 4 बजे जब लोग झरने की फुहारों का आनन्द ले रहे थे, तो एक आदमी झरने के ऊपर से घंटी बजाकर चिल्लाया कि अब बाँध से पानी छोड़ा जाने वाला है, इसलिए सब लोग दूर हट जाओ। यह चेतावनी सुनकर सब बाहर निकल आये। फिर जब पानी छोड़ा गया तो बहुत जोर से पानी की धारा गिरी। धारा इतनी तेज थी कि कई बड़े-बड़े पत्थर तक बह गये थे। जब पानी काफी ऊँचाई से पत्थरों पर गिरकर उछलता था, तो चारों ओर बारिश की फुहारों जैसा दृश्य उत्पन्न होता था। इससे भी विलक्षण बात यह थी कि उन फुहारों से वहाँ जमीन से सटकर ही एक बहुत बड़ा और सुन्दर इन्द्र-धनुष बन गया। वह एक अद्भुत दृश्य था, जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्य से कैमरा तब भी मेरे पास नहीं था, इसलिए इसका फोटो नहीं खींच पाया।
हमारे तत्कालीन सहायक महा प्रबंधक श्री राम आसरे सिंह बहुत ही सज्जन थे। वे सभी अधिकारियों की व्यक्तिगत समस्याओं पर भी ध्यान देते थे। ऐसे उच्चाधिकारी बहुत कम होते हैं। एक बार की बात है कि हमारे एक अधिकारी श्री मनोरंजन उपाध्याय का स्थानांतरण वाराणसी से गोरखपुर हो गया था। उस समय उनकी श्रीमती जी गर्भवती थीं। मनोरंजन ने इसका जिक्र कुछ अन्य अधिकारियों से किया, तो बात एजीएम साहब तक पहुँच गयी। उन्होंने मनोरंजन को बुलाकर डाँटा और कहा कि यदि यह समस्या थी, तो सीधे मेरे पास आना चाहिए था। उन्होंने तत्काल मनोरंजन का स्थानांतरण रद्द कर दिया।
श्री राम आसरे सिंह के समय ही मेरा प्रोमोशन और स्थानांतरण हुआ था। पहले मेरी पोस्टिंग पटना में होने का आदेश आया था, तो उन्होंने अपने आप ही पटना के सहायक महा प्रबंधक महोदय श्री आर.एस. सिंह से मेरे बारे में बात कर ली और यह निश्चित कर दिया कि मुझे वहाँ कोई कष्ट न हो। हालांकि बाद में मेरी पोस्टिंग कानपुर में होने का आदेश आ गया, लेकिन इस बात से उनकी महानता का परिचय तो मिलता ही है। दुर्भाग्य से मेरे कानपुर आने के चार-पाँच माह बाद ही उनका देहावसान हो गया। इससे मैं फिर उनके दर्शन नहीं कर सका।
इसके कुछ महीने बाद हमने अपना फ्लैट बदल लिया। नया फ्लैट एक वरिष्ठ प्रबंधक श्री सच्चिदानन्द शर्मा के अवकाश प्राप्त करने पर खाली हुआ था। यह फ्लैट बैंक के ऑफिस के बिल्कुल सामने गुरुकृपा कालोनी में था और पहली मंजिल पर था। हालांकि यह लगभग उतना ही बड़ा था, जितना अनन्ता कालोनी वाला फ्लैट था, परन्तु काफी हवादार था और धूप भी आती थी, इसलिए हमें पसन्द आ गया। उस फ्लैट के ऊपर दूसरी मंजिल पर एक परिचित गुजराती परिवार रहता था। उनके बगल वाले फ्लैट में एक कश्मीरी मुसलमान परिवार रहता था। वह परिवार गर्मियों में कश्मीर चला जाता था और सर्दियों में वहाँ आ जाता था। सन् 1995 की सर्दियों में वह परिवार वहाँ आया। उस परिवार में दो बहुत सुन्दर और प्यारी जुड़वाँ बच्चियाँ थीं- इशरा और इकरा। दोनों लगभग 8-9 वर्ष की थीं। वे हमारी पुत्री मोना के साथ खूब खेला करती थीं। बाद में जब हमें स्थानांतरण के कारण वाराणसी छोड़ना पड़ा, तो वे बच्चियाँ बहुत दुःखी हो गयी थीं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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