आत्मकथा भाग-2 अंश-54

वाराणसी में अनन्ता कालोनी के जिस फ्लैट में हम रहते थे, उसके नीचे ग्राउंड फ्लोर पर एक सम्पन्न परिवार रहता था श्री राय साहब का। उनको मैं बाबूजी कहता था। वे मेरा बहुत आदर करते थे। उनके दो पुत्र थे। एक विवाहित पुत्री भी थी। बड़े पुत्र मैरीन इंजीनियर थे और साल में 10 महीने शिप में ड्यूटी पर रहते थे। वे केवल 2 माह के लिए घर आते थे। वे विवाहित थे और दो पुत्रों के पिता थे। उनकी पत्नी श्रीमती किरण बहुत सुन्दर और हँसमुख थीं। लेकिन उस घर में एक समस्या थी। राय साहब का छोटा पुत्र सर्वेश बी.काॅम. और एम.काॅम. भी कर चुका था, परन्तु बेरोजगार था। वैसे वह काफी प्रतिभाशाली था, परन्तु बेरोजगारी ने उसे कुंठित कर दिया था।

इससे भी बुरी बात यह थी कि घर वाले उसे अपमानित करते थे, जिससे उनके घर में प्रायः रोज ही कलह हुआ करती थी। एक बार तो नौबत यहाँ तक आ गयी थी कि उसका घर में घुसना बन्द कर दिया गया था और वह नीचे गोदाम में रहता था। घर के गेट पर हर समय ताला लगा रहता था, ताकि वह अन्दर न आये। एक दो बार मैंने बाबूजी और सर्वेश में बाकायदा मारपीट होते भी देखी थी। यह देखकर मुझे बहुत दुःख होता था। इस समस्या का कारण और उसका समाधान भी मुझे मालूम था, परन्तु सोचता था कि उनके घरेलू मामले में मेरा बोलना ठीक रहेगा भी या नहीं।

जब मुझसे और अधिक न देखा गया, तो एक दिन हिम्मत करके मैं उनके घर में गया। मैंने बाबूजी और उनकी पत्नी आंटीजी को पास में बैठाकर उनसे कहा- ‘बाबूजी, मैं आपसे बहुत छोटा हूँ और आपको उपदेश देने के योग्य नहीं हूँ। फिर भी मैं एक बात कहना चाहता हूँ।’ उन्होंने कहा- ‘कहो।’ मैंने कहा- ‘बाबूजी, सर्वेश जी के साथ जो समस्या है, उसके कारण आप हैं।’ यह सुनते ही वे सकते में आ गये- ‘कैसे?’ मैंने कहा- ‘समस्या का कारण यह है कि आप सर्वेश जी को बाहर वालों के सामने डाँटते और अपमानित करते हैं। उनकी उम्र ऐसी है कि वे बाहर वालों के सामने अपना अपमान बिल्कुल सहन नहीं कर सकते। हताशा में वे गलत-से-गलत कार्य कर सकते हैं। घर से भाग सकते हैं, चोरी कर सकते हैं, यहाँ तक कि आत्महत्या और हत्या तक कर सकते हैं।’

मेरी ये बातें सुनकर वे स्तब्ध रह गये। उन्होंने कभी ऐसे परिणामों की कल्पना भी नहीं की थी। मैंने आगे कहा- ‘बाबूजी, समस्या अभी भी हल हो सकती है। इसका समाधान यह है कि आप इनको किसी भी बाहर वाले के सामने डाँटना एकदम बन्द कर दीजिए। अगर कभी कुछ कहना भी हो, तो घर के अन्दर कहें और इस तरह कि बाहर वालों को पता भी न चले कि क्या बात हुई है। यह आज से ही नहीं इसी क्षण से तय कर लीजिए। अगर आपने ऐसा निश्चय कर लिया तो आपकी आधी समस्या हल हो गयी। बाकी आधी मैं सर्वेश जी से बात करके हल कर दूँगा।’ बाबूजी मुँह से कुछ नहीं बोले, लेकिन उनके हावभाव से लग रहा था कि वे मेरी बात से पूरी तरह सहमत थे। फिर मैं नमस्कार करके चला आया।

इसके दो-तीन दिन बाद मैंने सर्वेश जी को अपने फ्लैट पर बुलाया। पहले मैंने उन्हें शर्बत पिलाया और इधर-उधर की बातें कीं। फिर मैंने पूछा कि क्या समस्या है? उन्होंने बताया- ‘समस्या कुछ नहीं है। मेरी नौकरी नहीं लगी है, इसी से घर वाले नाराज रहते हैं।’ मैंने कहा- ‘मैंने बाबूजी को समझा दिया है। अब वे आपका अपमान नहीं करेंगे। कोई काम ढूँढ़ने की कोशिश करो। काम लग जायेगा, तो घरवालों को भी शिकायत नहीं रहेगी।’ उन्होंने स्वीकार किया। मैंने आगे कहा- ‘अभी जो काम मिल जाये, उसी को पकड़ लो। बाद में और अच्छा काम खोजते रहना। मैं भी इसमें सहायता करूँगा।’ उन्होंने यह भी स्वीकार कर लिया।

उसके बाद ईश्वर की कृपा ऐसी हुई कि शीघ्र ही उन्हें एक काॅल सेंटर में काम मिल गया। फिर उनके घर का वातावरण भी सुधर गया। धीरे-धीरे उनकी सारी खुशियाँ लौट आयीं। उनके घर के दरवाजे पर हमेशा लगा रहने वाला ताला गायब हो गया। दो-तीन महीने में ही भाभीजी का चेहरा चमकने लगा, जो पहले चिन्ता और डर के कारण कुम्हलाया रहता था। इसके साथ ही उनका वजन भी थोड़ा बढ़ गया।

एक दिन मैंने मजाक में कहा- ‘भाभीजी, अब आपकी हैल्थ बहुत सुधर गयी है’, तो वे शरमाकर हँस पड़ीं। उन्होंने मुँह से भले ही कुछ न कहा हो, लेकिन उनका चेहरा बता रहा था कि वे मेरी कितनी आभारी थीं। मुझे प्रसन्नता है कि मेरे कुछ वाक्यों ने एक अच्छे परिवार की खुशियाँ लौटा दीं।

मैं बता चुका हूँ कि वाराणसी के आसपास घूमने की बहुत सी जगह हैं। मुख्य रूप से सारनाथ तो शहर से केवल 5-6 किमी दूर है। लेकिन थोड़ी अधिक दूरी पर मीरजापुर जिले में पर्यटकों की रुचि के कई स्थान हैं। सबसे मुख्य तो मीरजापुर शहर से तीन-चार किमी दूर विंध्यवासिनी का प्रसिद्ध मंदिर है, जो शक्तिपीठ माना जाता है। यह विंध्याचल पर्वतमाला के उत्तरी छोर पर स्थित है और गंगाजी के किनारे बहुत रमणीक जगह पर है। हम साल में एक-दो बार वहाँ जाते ही रहते थे, प्रायः वाराणसी घूमने आने वाले रिश्तेदारों के साथ। सबसे पहले मैं वहाँ तब गया था, जब मेरे जवाहरलाल नेहरू वि.वि. के सहपाठी श्री विजय शंकर प्रसाद श्रीवास्तव अपने पुत्र का मुंडन कराने आये थे। उन दिनों मैं घर पर अकेला ही था, क्योंकि श्रीमतीजी आगरा चली गई थीं। हालांकि मैं मूर्तिपूजा बिल्कुल नहीं करता, लेकिन घूमने और गंगास्नान के लिए ऐसे स्थानों पर चला जाता था और अभी भी जाता रहता हूँ।

इसके बाद हमें वहाँ जाने का मौका तब मिला जब हमारी शादी के तीन-चार महीने बाद मेरी बहिन गीता सपरिवार आयी थी। लेकिन शादी के बाद मुझे एक साल तक गंगास्नान की मनाही कर दी गई थी, कारण पता नहीं। इसलिए उस बार मैं गंगा स्नान नहीं कर सका। अगली बार हम अपने सिंधी पड़ौसी के साथ गये थे। तब तक हमारे विवाह को एक वर्ष से अधिक हो चुका था, इसलिए मैंने विंध्याचल में जमकर गंगा स्नान किया। वहाँ एक मजेदार बात हुई। जब हम गंगा स्नान की तैयारी कर रहे थे, तो एक नाववाला आया और पश्चिम दिशा में इशारा करते हुए हमसे बोला- ‘बाबूजी, वहाँ थोड़ी दूर पर गंगा-जमुना-सरस्वती तीनों हैं।’

मैंने पूछा- ‘यहाँ कितनी हैं?’ उसने इस बात का कोई जबाब नहीं दिया और फिर कहने लगा कि ‘वहाँ गंगा-जमुना-सरस्वती तीनों हैं।’ मैंने फिर जोर देकर पूछा- ‘यहाँ कितनी हैं?’ नाववाला चुप। तब मैंने कहा- ‘यहाँ चार हैं। गिनो- गंगा, जमुना, सरस्वती और .....’। वहाँ पास में ही एक नाला गंगाजी में गिर रहा था। मैंने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा- ‘...एक यह गटर गंगा। हो गईं चार?’ मेरी बात सुनकर आसपास खड़े लोग हँस पड़े और बेचारा नाववाला चुपचाप चला गया।

-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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