आत्मकथा भाग-2 अंश-53
हमारे बैंक में उन दिनों कम्प्यूटरों की संख्या गिनी-चुनी ही थी। केवल कुछ कार्यालय ही आधे-अधूरे कम्प्यूटरीकृत थे। आगे सभी शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण की योजनाएँ बनायी जा रही थीं और कर्मचारी संगठनों को उसके लिए राजी किया जा रहा था। इसी क्रम में अधिकारियों और लिपिकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे, ताकि उन्हें कम्प्यूटर की प्रारम्भिक जानकारी दी जा सके और उन्हें कम्प्यूटरीकरण के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा सके। हमारे वाराणसी मंडल में 3-3 दिन के ऐसे कई कार्यक्रम करने की जिम्मेदारी मुझे दी गयी।
उस समय हमारे पास ट्रेनिंग देने की कोई जगह नहीं थी, इसलिए आसपास के होटलों में पढ़ाने के लिए कमरे किराये पर लिये जाते थे और वहीं प्रशिक्षणार्थियों के लिए दो बार की चाय और दोपहर के भोजन का प्रबंध भी किया जाता था। इस कार्य के लिए जितना बजट बैंक की ओर से तय था, हम उसी बजट में और कई बार उससे भी कम खर्च में ये कार्यक्रम सफलतापूर्वक कर लेते थे। हम सभी कम्प्यूटर अधिकारी इन कार्यक्रमों में पढ़ाते थे। मैं प्रायः सबसे पहला और सबसे आखिरी विषय पढ़ाता था। पहले मैं प्रोफेसर बनना चाहता था, वह तो नहीं बना, लेकिन इन कार्यक्रमों में पढ़ाकर मुझे बहुत संतुष्टि मिलती थी। कार्यक्रम के अन्त में हम सभी प्रशिक्षणार्थियों से लिखित फीडबैक लेकर यह पूछते थे कि उनको कौन सा लैक्चर कैसा लगा। आश्चर्य है कि हर बार मेरे ही लैक्चर सबसे अच्छे बताये जाते थे। इन कार्यक्रमों के कारण वाराणसी मंडल की प्रायः सभी शाखाओं में मेरे पढ़ाये हुए अधिकारी और लिपिक पदस्थ थे।
अब जरा लखनऊ के अपने मकान की बात कर ली जाये। मैं लिख चुका हूँ कि सन् 1986 में मैंने उ.प्र. आवास एवं विकास परिषद से इन्दिरा नगर की स्ववित्तपोषित योजना में एक मकान खरीदा था। उसका कब्जा मुझे फरवरी 1989 में तब मिला था, जब मैं एच.ए.एल. की नौकरी छोड़कर लखनऊ में ही इलाहाबाद बैंक की नौकरी पर आ गया था। हमें उस मकान को सुरक्षित बनाने के लिए बाउंडरी आदि बनवानी पड़ी थीं। सौभाग्य से मेरे माताजी-पिताजी उस समय मेरे साथ लखनऊ में ही थे। इसलिए मकान का कब्जा लेने और बाउंडरी आदि बनाने का कार्य उनकी देखरेख में चल रहा था। मैंने योजना बनायी थी कि जून 1989 में हम किराये का मकान छोड़कर अपने ही मकान में रहने चले जायेंगे। लेकिन हमारे सहायक महाप्रबंधक महोदय श्री आर.आर. शर्मा की कृपा से मेरा स्थानांतरण मई माह के अन्तिम सप्ताह में ही वाराणसी कर दिया गया। इसलिए अपने मकान में रहने का मेरा अरमान अधूरा ही रह गया और अभी तक अधूरा ही है।
(पादटीप- मेरी यह इच्छा अवकाशप्राप्ति के बाद ही पूरी हो सकी।)
अब उस मकान को किराये पर उठाने की समस्या थी। सौभाग्य से तभी श्री गोविन्द जी की सहायता से एक किरायेदार मिल गया। किराया बहुत कम था मात्र 600 रु प्रति माह। लेकिन वह आदमी अच्छा था, इसलिए हम संतुष्ट थे। लगभग 3 साल तक वे सज्जन उसमें रहे। अब हमें उम्मीद थी कि वे किराया बढ़ा देंगे, क्योंकि सामान्यतया 3 साल बाद किराया बढ़ा दिया जाता है, परन्तु उन्होंने बहाने करके किराया बढ़ाने में असमर्थता जतायी। दूसरी बात, हमने उनसे कहा था कि आप मकान की पुताई करा लो, क्योंकि उसे कई साल हो गये थे। परन्तु वे ऐसा कष्ट करना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने यही ठीक समझा कि मकान खाली करा लिया जाये। वे सज्जन आदमी थे। उन्होंने अपने वायदे के अनुसार मकान खाली कर दिया।
अब हमें नया किरायेदार देखना था। हम तो वाराणसी में रहते थे। मेरे लिए यह सम्भव नहीं था कि लखनऊ में रहते हुए किरायेदार खोजूँ। इसलिए मैंने अपने मित्रों से कह रखा था कि कोई अच्छा आदमी मिल जाये, तो उनको किराये पर दे सकता हूँ। मेरे एक पत्र-मित्र श्री रंजीत सिंह, जो फौज में नौकरी करते थे और गोरखपुर के निवासी थे, उन्होंने अपने एक परिचित सज्जन को मकान किराये पर देने के लिए कहा। किराया वे केवल 800 रु दे रहे थे। हमने कह दिया कि आप जो ठीक समझें कर लें।
वे किरायेदार एक वकील साहब थे, जो वास्तव में कुछ नहीं करते थे और मुलायम सिंह वाली समाजवादी पार्टी के एक नेता के चमचे थे। वैसे उन्होंने पहले तीन महीने का किराया मेरे मित्र रंजीत सिंह के छोटे भाई श्री मानसिंह को दे दिया था, परन्तु उन्होंने वह किराया हमें नहीं पहुँचाया। इसके बाद वकील साहब ने भी कोई किराया नहीं दिया और बहाने बनाने लगे। मैंने अपने मित्र रंजीत जी को कई बार इस बारे में लिखा, तो वे अपने भाई को पत्र लिखते रहे कि इनका किराया इन्हें दिलवा दो। लेकिन वे दोनों ही किराया देना नहीं चाहते थे।
तभी मुझे पता चला कि उन वकील साहब और रंजीत जी के भाई मानसिंह उन दोनों के सम्बंध अपराधी किस्म के लोगों से थे। अब हम घबराये कि इस तरह तो हमें किराया तो मिलेगा ही नहीं और डर है कि मकान पर भी वे लोग कब्जा न कर लें। अगर ऐसा होता, तो मैं किस-किससे और कैसे लड़ता फिरता? इसलिए मैंने वकील साहब से मिलकर उनको मकान खाली करने के लिए राजी कर लिया। सौभाग्य से 2-3 महीने बाद ही उन्होंने मकान खाली कर दिया। इसमें मुझे लगभग 15-20 हजार का घाटा पड़ा और पानी-बिजली का बकाया बिल भी मुझे ही भरना पड़ा। लेकिन सन्तोष था कि मकान बच गया। इसके बाद हमने अपने मकान को लम्बे समय तक बिना किरायेदार के खाली ही रहने दिया।
इसके साथ ही मैंने रंजीत जी से अपनी मित्रता का सम्बंध तोड़ दिया। मैंने सोचा कि जो आदमी अपने सगे भाई से भी मेरा रुपया नहीं दिलवा सका, उसके ऊपर कितना विश्वास किया जाये। हालांकि उनका अपना कोई दोष नहीं था। उन्होंने तो मेरी सहायता की ही कोशिश की थी, परन्तु उनके भाई के कारण मुझे उनसे अपना सम्बंध तोड़ना पड़ा। वैसे वे बहुत सज्जन हैं। एक बार उन्होंने मुझे अपनी एक भांजी की शादी में बुलाया था और मैं वाराणसी से गोरखपुर जिले के कौड़ीराम कस्बे में जाकर उस विवाह में सम्मिलित हुआ था। मुझे देखकर सब बहुत प्रसन्न हुए थे। एक-दो बार वे वाराणसी भी आये थे और एक बार फौज में अपनी यूनिट के मंदिर के लिए राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ भी वाराणसी से खरीदकर ले गये थे। मेरे द्वारा सम्बंध तोड़ लेने के बाद भी उनके कई पत्र मेरे पास आये थे, परन्तु मैंने जानबूझकर उनका उत्तर नहीं दिया। अपने इतने प्यारे मित्र से सम्बंध तोड़ते हुए मुझे बहुत दुःख हुआ, परन्तु मजबूरी में मुझे ऐसा करना पड़ा। इसके लिए मैं उनसे क्षमा चाहता हूँ और उनके कल्याण के लिए परमपिता से प्रार्थना करता हूँ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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