आत्मकथा भाग-2 अंश-52
सन् 1994 में मेरे इकलौते सगे साले अर्थात् श्रीमतीजी के भाई श्री आलोक कुमार (अन्नू) का विवाह हुआ। उसके लिए आगरा की ही एक गरीब घर की थोड़ी कम पढ़ी लड़की पसन्द की गयी। उसका नाम है बबीता और घर पर कंचन कहते हैं। वह काफी सुन्दर हैं, नाम से ही नहीं, तन और मन से भी कंचन हैं। सौन्दर्य ऐसा कि आँखें हटाने को जी न चाहे। जब उन्हें पसन्द किया गया था, तो हम वाराणसी में ही थे। उसके कुछ समय बाद जब हम दीपावली पर आगरा आये, तो हमें उनसे मिलाने का कार्यक्रम तय किया गया। यह कार्यक्रम चौराहा ढाकरान के निकट स्थित सुभाष पार्क में सम्पन्न हुआ। देखते ही कंचन हमें बहुत अच्छी लगीं। वह खूब बोलने वाली हैं, इसलिए हमें और भी अच्छी लगीं।
14 नवम्बर 1994 को जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस वाले दिन, जिसे बाल दिवस भी कहते हैं, अन्नू का विवाह सम्पन्न हुआ। मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। अपनी इतनी सुन्दर सलहज की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। उनकी सुहागरात के दिन मैंने और मथुरा वाले साढ़ू श्री हरिओम जी (जो उस समय तक सूरत में रहने लगे थे) ने उनके पलंग को फूलों से बहुत अच्छी तरह सजाया था।
हमारी सलहज तन की ही नहीं, मन की भी बहुत सुन्दर हैं। घर के सभी कार्यों में दक्ष तो हैं ही, सबसे बड़ी बात यह है कि वे कभी परेशान नहीं होतीं। चार-चार ननदों-ननदेउओं और उनके सात-सात बच्चों के नखरे उठाना आसान नहीं है। कभी हम सभी साढ़ू अपने-अपने परिवार के साथ एक साथ आ जाते हैं, जैसा कि प्रायः हर बड़े त्यौहार पर होता है, तो घर में 20-22 व्यक्ति हो जाते हैं। कंचन जी उन सबका बराबर ध्यान रखती हैं और सारे काम खुशी-खुशी करती हैं। वैसे उनकी सभी ननदें और हमारी सास भी घर के कामों में मदद करती हैं।
मेरी सलहज कंचन मेरा तो विशेष ध्यान रखती हैं। जब भी मैं जाता हूँ बहुत प्यार से मेरा आदर-सत्कार करती हैं। कभी मैं परेशान भी करता हूँ, तो बुरा नहीं मानतीं। इस समय उनके तीन बच्चे हैं- दो पुत्री और एक पुत्र। सभी बच्चे अपने माँ-बाप की तरह ही सुन्दर हैं।
1995 तक मेरे पास किसी प्रकाशक से कोई पुस्तक लिखने का आदेश नहीं था। बी.पी.बी. प्रकाशन वालों ने जो आदेश दिया था, वह भी वापस हो गया था। मैं अपनी पुस्तकों को छपवाने के लिए परेशान था। तभी मेरा विचार उ.प्र. हिन्दी संस्थान से एक पुस्तक छपवाने का हुआ। मैंने उनसे पत्र-व्यवहार किया, तो उन्होंने उसमें रुचि दिखाई। मैंने पुस्तक का सारांश उनको भेजा, तो उन्होंने आगे बातचीत करने लखनऊ आने का निमंत्रण दिया। मैं लखनऊ जाने को तैयार हो गया।
तभी हमारे कार्यालय के नये हिन्दी अधिकारी डाॅ. ओम कुमार मिश्र ने मुझे बताया कि सरकारी संस्थाओं से पुस्तक छपवाना बेकार है। ये संस्थान पुस्तकों की कब्रगाह हैं। इनमें कोई पुस्तक छपने में ही कई साल ले लेती है और बिकने में और भी अधिक समय लगता है। उनका दूसरा संस्करण तो 15-20 साल में ही आ पाता है। मुझे उनकी बातों में सच्चाई लगी, इसलिए मैंने उ.प्र. हिन्दी संस्थान से किताब छपवाने का विचार एकदम छोड़ दिया। डाॅ. मिश्र की उचित और सामयिक सलाह के लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ।
अब मैंने सोचा कि पहले कोई ऐसी पुस्तक लिखी जाये, जो जल्दी बिक सके। उसको कोई भी प्रकाशक छापने को तैयार हो जाएगा। उन दिनों बैंक कर्मियों के लिए होने वाली परीक्षा सीएआईआईबी (CAIIB) के भाग 1 में कम्प्यूटर विषय का एक पेपर होता था। हिन्दी माध्यम से यह परीक्षा देने वाले लोग बहुत परेशान रहते थे और प्रायः फेल हो जाते थे। इस पेपर में मुश्किल से 7-8 प्रतिशत परीक्षार्थी ही हिन्दी माध्यम से उत्तीर्ण हो पाते थे। मेरे कार्यालय के कई लोग यह परीक्षा दे रहे थे। उनमें से कुछ ने मुझसे कहा कि मैं हिन्दी में इस पेपर के लिए पुस्तक लिख दूँ। मैंने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया।
इस विषय के कुछ अध्याय मेरे पास पहले से लिखे रखे थे और शेष अध्याय मैंने इधर-उधर की अंग्रेजी पुस्तकों की सहायता से लिख डाले। 2-3 माह में लगभग 200 पृष्ठों की पुस्तक की पांडुलिपि तैयार हो गयी। मेरे कार्यालय के दो टाइपिस्ट श्री संजीत शेखर और श्री सुशील कुमार वर्मा भी यह परीक्षा दे रहे थे। मैंने अपनी पांडुलिपि की एक-एक छायाप्रति उन दोनों को दी और उसे पढ़ने को कहा। उन्हें पुस्तक काफी पसन्द आयी और कुछ सुझाव भी दिये। उनके सुझावों के अनुसार मैंने पुस्तक में आवश्यक संशोधन कर दिये।
अब मैं उस पांडुलिपि को लेकर आगरा के ‘उपकार प्रकाशन’ के स्वामी से मिला। सौभाग्य से उन्हें पांडुलिपि पसन्द आ गयी और उसे छापने को तैयार हो गये। पारिश्रमिक प्रति पृष्ठ 40 रुपये तय हुआ, जो प्रारम्भ में मेरे लिए पर्याप्त था। उन्होंने पुस्तक छापने में 4-5 महीने लगा दिये, लेकिन जब छपकर आयी, तो मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। यह पुस्तक प्रारम्भ से ही सफल रही। मेरी पुस्तक या पांडुलिपि के आधार पर मेरे कार्यालय के जिन लोगों ने यह पेपर दिया था, वे सब एक बार में ही उसमें अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गये।
मेरी पुस्तक छपने के बाद सीएआईआईबी की जो पहली परीक्षा हुई उसमें हिन्दी माध्यम से इस पेपर में उत्तीर्ण होने वालों का प्रतिशत एकदम बढ़कर 30 हो गया था। निश्चित रूप से यह मेरी पुस्तक के कारण था। हालांकि इससे पहले भी इस पेपर के लिए मेरठ से हिन्दी में छपी एक-दो पुस्तकें बाजार में थीं, लेकिन वे लगभग बेकार थीं।
मेरी पहली पुस्तक की सफलता से मेरे प्रकाशक मै. उपकार प्रकाशन के स्वामी श्री महेन्द्र जैन बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे एक अन्य पुस्तक लिखने का आदेश दे दिया। यह वही पुस्तक थी, जिसको मैं बीपीबी पब्लिकेशन के आदेश पर लिख रहा था और उनके बाद में पीछे हट जाने पर बीच में ही छोड़ दी थी। जब मैंने वह अधूरी पुस्तक उपकार प्रकाशन को दिखायी, तो वे उसे तुरन्त छापने को तैयार हो गये और उसे जल्दी से जल्दी पूरा करने का आदेश दिया। अब मैं उस पुस्तक को पूरा करने में जुट गया।
यह सन् 1995 की बात है। उन्हीं दिनों मैं कम्प्यूटर पर एक प्रशिक्षण में शामिल होने कोलकाता गया। वह प्रशिक्षण भी लगभग उसी विषय पर था, जिस पर मैं वह पुस्तक लिख रहा था। उस प्रशिक्षण से भी मुझे काफी सहायता मिली। वहाँ एक प्रशिक्षक थे- श्री उत्तम कुमार मौर्य। उनका ज्ञान इस विषय में बहुत अच्छा था और उनका हिन्दी का ज्ञान भी अच्छा था। मैंने उनसे अपनी पुस्तक का उल्लेख किया और उनसे पूछा कि क्या वे मेरी पुस्तक की जाँच कर सकते हैं। वे तुरन्त तैयार हो गये।
वाराणसी वापस आकर मैंने उस पुस्तक के अध्याय एक-एक करके उनके पास जाँच करने के लिए भेजे। उन्होंने उनमें कुछ गलतियाँ बतायीं और कुछ मैटर जोड़ने के लिए कहा। मैंने उनके सुझावों के अनुसार पुस्तक को सुधार दिया। अब वह छपने के लिए पूरी तरह तैयार थी। श्री उत्तम कुमार मौर्य ने जिस लगन से मेरी पुस्तक को जाँचा, वैसा करने वाले व्यक्ति बहुत दुर्लभ होते हैं। अब श्री उत्तम कुमार मौर्य हमारे बैंक को छोड़कर किसी अन्य बैंक (शायद ओरियंटल बैंक ऑफ काॅमर्स) में चले गये हैं। वैसे मेरी पुस्तक छपकर आने के बाद मैंने उनको उसकी दो प्रतियाँ भेंटस्वरूप भेजी थीं। अपनी पुस्तक के आमुख में भी मैंने उनका आभार व्यक्त किया है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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