आत्मकथा भाग-2 अंश-51
मैं दूसरे दिन प्रातः नई दिल्ली स्टेशन पर उतर गया। सांसद श्री वीरेन्द्र सिंह जी मुझे प्लेटफार्म पर ही मिल गये। वे दूसरे डिब्बे में आये थे। मुझे आशा थी कि वे मुझे अपने साथ अपनी कार में घर ले चलेंगे। लेकिन उन्होंने मुझसे कहा- ‘आप पहुँचिए।’ तब मैं एक ऑटो करके नाॅर्थ एवेन्यू में उनके निवास पर पहुँच गया। वहाँ एक नौकर था। वीरेन्द्र जी का संदर्भ देने पर उसने मुझे अन्दर आने दिया और ठहरने का स्थान बता दिया। मैं थोड़ा आराम करके नहा-धोकर तैयार हो गया।
वहाँ से थोड़ी दूर पर श्री विश्वनाथ दास जी शास्त्री (सुल्तानपुर के तत्कालीन सांसद) का सरकारी निवास स्थान भी था। मेरा उनसे घनिष्ट परिचय था, अतः मैंने सोचा कि उनसे मिल लेता हूँ। मैं वहाँ गया, तो सौभाग्य से वे वहीं मिल गये। उन्होंने मेरी कुशल-क्षेम पूछी। तब तक कुछ लोग उनसे मिलने आ गये और वे कुछ व्यस्त भी लगे। इसलिए मैंने कहा कि अभी मैं जल्दी में हूँ, कल या परसों फिर आऊँगा। यह कहकर मैं चला आया। तब तक मेरा जलपान भी नहीं हुआ था।
वहाँ से केन्द्रीय सचिवालय सिटी बस टर्मिनल की ओर जाते समय मुझे रास्ते में एक कैंटीन दिखाई पड़ी। उस पर लिखा था- ‘यह केवल सांसदों के लिए है।’ वैसे वहाँ जो ग्राहक थे, वे सांसद नहीं लग रहे थे। इसलिए मैं हिम्मत करके उसमें घुस गया। वहाँ उचित दामों पर सभी वस्तुएँ मिल रही थीं। वहाँ पर किसी ने भी मुझसे सांसद होने का प्रमाण नहीं माँगा। एक टेबल पर बैठते ही एक बेयरा मेरे पास आया, तो मैंने एक डोसा मँगा लिया। डोसा अच्छा था। भुगतान करके मैं सिटी बस से सम्मेलन स्थल की ओर चल दिया। तभी मैंने यह तय कर लिया कि प्रातः का नाश्ता और रात्रि का भोजन मैं इसी कैंटीन में किया करूँगा।
जब मैं सम्मेलन स्थल अशोका होटल पहुँचा तो वहाँ पंजीकरण हो रहा था। पंजीकरण शुल्क एक हजार रुपये था। अधिकतर लोग अपनी-अपनी कम्पनियों की तरफ से आये थे। मेरे पास यह सुविधा नहीं थी और एक हजार रुपये उस समय मेरे लिए बड़ी रकम होती थी। इसलिए मैंने काउंटर पर कहा कि मैं केवल पेपर प्रस्तुत करने के लिए आया हूँ, रजिस्ट्रेशन कराना संभव नहीं है। उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ, लेकिन मान गये। उन्होंने मुझे कार्यक्रम पत्रिका तो दे दी, लेकिन बैग, खाने के कूपन आदि कुछ नहीं दिये। मुझे उनकी आवश्यकता भी नहीं थी। मेरा पेपर तीसरे दिन था। अतः मैंने तय किया कि सभी सत्रों में भाग लेकर सबके प्रस्तुतीकरण देखूँगा।
उस सम्मेलन में मेरे परिचित केवल एक व्यक्ति आये थे- श्री जी.वी. सिंह, जो जवाहरलाल नेहरू वि.वि. में मेरे शिक्षक रहे थे। उनसे मेरी नमस्कार हुई। उन्होंने ज्यादा बात नहीं की, लेकिन मैंने बता दिया कि मैं एक पेपर प्रस्तुत करने आया हूँ।
उस सम्मेलन में प्रस्तुत किये जाने वाले पेपर कुल मिलाकर ठीक ही थे, कोई बहुत ऊँचे दर्जे के नहीं। ज्यादातर लोग दक्षिण भारतीय थे और गिने-चुने विदेशी भी थे। बीच में चाय का समय हुआ। परन्तु मेरे पास चाय के कूपन नहीं थे, इसलिए मैं चाय पीने भी नहीं गया। जब दोपहर के भोजन का समय हुआ, तो मुझे काफी भूख लग आयी थी। मैं बाहर किसी रेस्तरां की तलाश में निकला।
अशोका होटल के बगल में एक सड़क पर मुझे गुजरात भवन दिखायी पड़ा। मुझे यह पता था कि विभिन्न राज्यों ने राजधानी दिल्ली में अपने भवन बना रखे हैं, जहाँ उन राज्यों के निवासियों को कुछ सुविधाएँ मिल जाती हैं। मैं गुजरात भवन में घुस गया और पूछा कि क्या यहाँ खाना मिलेगा? उन्होंने ‘हाँ’ कहा, तो मैंने रेट पूछा, तो उन्होंने 25 रुपये बताया। रेट थोड़ा ज्यादा था, परन्तु मैंने सोचा कि खाना अच्छा होगा। वास्तव में वहाँ अच्छा गुजराती खाना मिला। वहीं मैंने तय किया कि दोपहर का खाना यहीं खा लिया करूँगा।
शाम को सम्मेलन का पहला दिन समाप्त होने पर मैं वापस नाॅर्थ एवेन्यू पहुँच गया और रात्रि को सांसदों की कैंटीन में जाकर खाना भी खा आया।
अगले दिन प्रातः काल वीरेन्द्र जी के छोटे भाई श्री मोहन सिंह जी से परिचय हुआ। वे पटना में किसी अखबार में पत्रकार थे। उसी दिन शाम को पहली बार वहाँ वीरेन्द्र जी से भेंट हुई। उन्होंने मुझसे पूछा कि यहाँ कोई परेशानी तो नहीं है? मैंने बताया कि कोई परेशानी नहीं है, एकदम आराम से हूँ। फिर उन्होंने पूछा कि खाना कहाँ खाते हो, तो मैंने बता दिया कि बाहर कैंटीन में खा लेता हूँ। तब उन्होंने कहा कि आज रात्रि को हमारे साथ भोजन करना। मुझे प्रसन्नता हुई। रात्रि भोजन में उन्होंने सत्तू के परांठे और टमाटर की मीठी चटनी बनवाई। ये चीजें मैं पहली बार खा रहा था। मुझे बहुत अच्छी लगीं। तीन परांठे खा गया।
अगले दिन मेरा पेपर प्रस्तुत होना था। अच्छा रहा। मुझे एक स्मृति चिह्न दिया गया। वहाँ से मैं बी.पी.बी. पब्लिकेशन के स्वामी श्री मुनीश जैन से मिलने कनाट प्लेस गया। फिर वापस नाॅर्थ एवेन्यू गया। उसी रात्रि को मेरी गाड़ी थी। अतः मैं जल्दी से सामान लेकर नई दिल्ली स्टेशन पहुँच गया। वहीं एक कैंटीन में मैंने खाना खा लिया और रात भर सफर करके सुबह वाराणसी पहुँच गया।
उस वर्ष अर्थात् 1994 में हमारे बैंक में एक नाटक प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसका आयोजन स्थल वाराणसी था। हमारे मंडलीय कार्यालय में उन दिनों श्री वासुदेव उबेराय भी पदस्थ थे। उनका विचार नाटक खेलने का हुआ। उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का प्रसिद्ध नाटक ‘अंधेर नगरी’ अपने मंचन के लिए चुना। 6-7 लोगों को एकत्र करके उन्होंने नाटक के पात्र छाँट लिये। जब मुझे पता चला, तो मैंने उनसे कोई भूमिका देने का अनुरोध किया। पहले तो उन्होंने मेरी सुनने की कठिनाई को देखते हुए मना कर दिया, लेकिन मेरी इच्छा को देखते हुए उन्होंने मुझे 2 मिनट की छोटी सी भूमिका दे दी। वह सूखे मेवे बेचने वाले काबुलीवाले की भूमिका थी, जिसमें केवल एक डायलाॅग था। मैं इसी से संतुष्ट हो गया। नाटक के दो-तीन रिहर्सल हुए। उसमें मेरी भूमिका से वे खुश हो गये।
नियत दिन पर नाटक का मंचन कबीर चौरा स्थित रवीन्द्रालय में हुआ। यह काफी सफल रहा। हमारे नाटक को द्वितीय पुरस्कार मिला। पहला पुरस्कार कानपुर वालों के नाटक को मिला था, जो ‘राष्ट्रीय एकता’ पर था। नाटक के बाद हमारे निर्देशक श्री उबेराय ने मंच पर मेरी विशेष तारीफ की (जैसा कि मुझे बाद में पता चला) और कहा कि अगर मेरे कान खराब न होते, तो मैं बहुत अच्छा अभिनेता बनता।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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