आत्मकथा भाग-2 अंश-50

1994 में जनवरी माह में मैं एक पुत्री का पिता बना। मेरे एक पुत्र था ही। एक पुत्री और हो जाने पर श्रीमती जी की दृष्टि में परिवार पूरा हो गया। हालांकि मैं कम से कम तीन बच्चे चाहता था, परन्तु श्रीमती जी इसके लिए तैयार नहीं हुईं। एक बार उम्मीद हुई भी, तो उन्होंने आगरा जाकर मुझसे पूछे बिना ही गर्भपात करा लिया। पता चलने पर मुझे बहुत दुःख हुआ, परन्तु क्या कर सकता था? हमने अपनी पुत्री का नाम अपनी छोटी भाभीजी के सुझाव पर ‘आस्था’ रखा। वैसे घर में उसे ‘मोना’ कहते हैं। जिस दिन मोना पैदा हुई थी, उसके अगले ही दिन मेरी बहिन गीता को दूसरी लड़की पैदा हुई। उसका प्यार का नाम ‘सिम्मी’ है।
यहाँ मुझे एक बात याद आ गयी। एक बार हम रविवार की दोपहर को कानपुर में मोतीझील के किनारे धूप खा रहे थे, क्योंकि हमारे फ्लैट में तब धूप नहीं आती थी। वहीं एक प्रौढ़ा सरदारनी भी दो नवयुवतियों के साथ धूप खाने आयी हुई थीं। जब हम अपनी बेटी को ‘मोना-मोना’ कहकर पुकार रहे थे, तो वे चौंक गयीं। उन्होंने हमारी श्रीमती जी को बताया कि उनके साथ जो दो लड़कियाँ हैं उन दोनों का नाम भी ‘मोना’ है। उनमें से एक उनकी बेटी है और दूसरी बहू है। दोनों बचपन से पक्की सहेलियाँ हैं। उनकी बेटी ने अपनी सहेली को जिद करके अपनी भाभी बनाया है। हमें यह जानकर बड़ा आनन्द आया।
जुलाई 1994 में दीपांक पूरे 4 साल का नहीं था, फिर भी हमने उसे शिक्षा हेतु विद्यालय में प्रवेश कराने का निश्चय कर लिया। वहाँ आसपास कोई अच्छा स्कूल नहीं था, इसलिए हमने उसे सरस्वती शिशु मंदिर, खजुरी में प्रवेश कराया, जो वरुणा नदी के पार वहाँ से करीब 3 किलोमीटर दूर था। कुछ समय पहले तक गोपाल जी के दोनों पुत्र दाऊदयाल और विवेक भी उसी विद्यालय में पढ़ते थे। वहाँ के एक-दो आचार्यों से मेरा परिचय था। आसपास के कुछ बच्चे भी उसमें पढ़ते थे, जो स्कूल की बस से आते-जाते थे। दीपांक भी उसी बस से आने-जाने लगा।
एक बार दीपांक खोते-खोते अपनी ही बुद्धि से बच गया। हुआ यह कि उस दिन तक उसे स्कूल जाते हुए चार या पाँच दिन ही हुए थे। जब वह बस से लौट रहा था और बस हमारी कालोनी के गेट पर रुकी तो दीपांक का ध्यान कहीं और था, इसलिए वह नहीं उतरा। बस पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए वापस स्कूल पहुँच गयी और दीपांक उसी में बैठा रहा। जब ड्राइवर ने देखा कि एक बच्चा अभी बैठा ही रह गया है, तो उसने विद्यालय के अध्यापकों को बताया। अध्यापकों ने उसकी डायरी देखी तो पता चला कि उसे अनंता कालोनी के बाहर उतरना था। तब उन्होंने हमें फोन किया।
इधर उसकी माँ घबरा रही थीं कि दीपांक अभी तक क्यों नहीं आया। मैं तो कार्यालय में था। स्कूल से फोन आने पर उन्होंने हमारे कार्यालय में फोन किया। फिर मैं एक दोस्त के स्कूटर पर बैठकर विद्यालय की ओर भागा, तो वह रास्ते में ही एक अध्यापक के साथ रिक्शे पर आता हुआ मिल गया। विद्यालय के अध्यापकों ने बाद मेें हमसे कहा कि आपका बेटा बहुत समझदार है कि किसी गलत जगह पर नहीं उतरा। कोई और बच्चा होता, तो कहीं भी उतर जाता और खो जाता।
1994 में ही मुझे एक पेपर प्रस्तुत करने के लिए दिल्ली जाने का अवसर मिला। कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया के दिल्ली चैप्टर ने ‘भारतीय भाषाओं में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास’ विषय पर एक सम्मेलन का आयोजन किया था, जिसका नाम था ‘अक्षर’। इसकी सूचना कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया की मासिक पत्रिका में निकली थी और उसके लिए पेपर आमंत्रित किये गये थे। सम्मेलन का विषय मेरा सबसे अधिक प्रिय विषय था, इसलिए मैंने एक लेख ‘कम्प्यूटरों के लिए देवनागरी कुंजीपटल का मानकीकरण’ शीर्षक से तैयार करके उसका सारांश भेज दिया। सौभाग्य से वह स्वीकार भी हो गया। मुझे आशा थी कि पेपर प्रस्तुतकर्ता होने के अधिकार से मुझे सम्मेलन में स्वतः ही पंजीकृत कर लिया जाएगा। उसका पंजीकरण शुल्क एक हजार रुपये था, जो उस समय मेरे लिए एक बड़ी रकम होती थी।
उन्हीं दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शीत-शिविर प्रयाग में लगने वाला था। सौभाग्य से सम्मेलन और शिविर दोनों की तारीखें अलग-अलग थीं। उनके बीच में केवल एक रात्रि थी। इसलिए मैंने यह निश्चय किया कि शिविर में शामिल होकर समापन वाले दिन ही रात्रि में दिल्ली की गाड़ी पकड़कर सम्मेलन वाले दिन सुबह ही दिल्ली पहुँच जाऊँगा। इसी के अनुसार मैंने प्रयागराज एक्सप्रेस में इलाहाबाद से दिल्ली तक अपना आरक्षण करा लिया। इसके साथ ही मैंने सम्मेलन के अन्तिम दिन दिल्ली से वाराणसी लौटने का भी आरक्षण करा लिया।
अगली समस्या दिल्ली में ठहरने की थी। मेरे जो दोस्त पहले दिल्ली में थे, वे सभी तब तक दिल्ली छोड़कर जा चुके थे और उनके साथ मेरा सम्पर्क भी टूट गया था। श्रीमतीजी के मौसाजी दिल्ली में उत्तम नगर में रहते हैं। मैं वहाँ आराम से ठहर सकता था, परन्तु मेरा सम्मेलन स्थल होटल अशोक में था (जिसे अशोका होटल बोलते हैं)। वह उत्तम नगर से बहुत दूर है और आने-जाने में बहुत समय नष्ट होता है। इसलिए मेरा विचार चाणक्यपुरी या कनाट प्लेस के आसपास कहीं ठहरने का था।
यहाँ काशी के तत्कालीन जिला प्रचारक श्री चन्द्रमोहन जी मेरी सहायता को आगे आये। उन्होंने बताया कि मीरजापुर-भदोही के तत्कालीन सांसद श्री वीरेन्द्र सिंह से उनकी बहुत घनिष्टता है और मेरे ठहरने की व्यवस्था उनके सरकारी निवास पर हो सकती है। चन्द्रमोहन जी ने अपना एक पत्र भी लिखकर मुझे दे दिया। संयोग से प्रयाग के शीत शिविर के दूसरे दिन श्री वीरेन्द्र जी स्वयं भी वहाँ आ गये और चन्द्रमोहन जी ने मेरा परिचय उनसे करा दिया। अब मैं निश्चिंत था।
शिविर के समापन के दिन शाम को मैं श्री नरेन्द्र जी द्विवेदी, जो वाराणसी के एक प्रमुख स्वयंसेवक हैं और जिनके चाचा इलाहाबाद में ही रहते हैं, के साथ स्टेशन पहुँच गया। टैम्पो की वजह से हम 5 मिनट लेट हो गये थे और गाड़ी चलने को तैयार खड़ी थी। किसी तरह दौड़कर मैं अपने डिब्बे में चढ़ गया। वैसे गाड़ी एक घंटे बाद ही चल पायी, क्योंकि उसे किसी नेताजी के पधारने का इंतजार था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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