आत्मकथा भाग-2 अंश-47
1993 में मुझे प्रशिक्षण हेतु नागपुर जाने का अवसर मिला। मैं पहले बता चुका हूँ कि बैंक सेवा में आने के बाद अपने विवाह से पहले मैं एक बार गुड़गाँव में हिन्दी कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करने गया था। वह कार्यशाला एक सप्ताह की थी। उसके लगभग 4 वर्ष बाद मुझे इस प्रशिक्षण में नागपुर भेजा गया। तब तक हमारा गुड़गाँव का स्टाफ कालेज बन्द हो गया था और लखनऊ का खुला नहीं था, केवल कोलकाता और नागपुर में चल रहे थे। मैं नागपुर होकर गुजरा तो कई बार था, पर वहाँ रहने का अवसर पहली बार मिला। यह प्रशिक्षण बैंकिंग पर था। इसका नाम था बैंकिंग रिफ्रेशर वर्कशाॅप। यह दो सप्ताह का था।
इसमें वाराणसी से मैं अकेला ही गया था, इसलिए मैंने अपने लिए एक रेलगाड़ी में अपनी पात्रता के अनुसार एसी कोच में आरक्षण करा लिया था और लौटने का भी उसी तरह कराया था। निर्धारित दिन में आराम से नागपुर पहुँच गया। गाड़ी प्रातःकाल वहाँ पहुँची थी। ऑटो करके मैं रवि नगर स्थित अपने स्टाफ कालेज में पहुँच गया और मुझे जाते ही कमरा भी मिल गया। मुझे इस कालेज में जो कमरा मिला था, उसमें मेरे साथी थे कटक (उड़ीसा) के श्री चन्द्रशेखर महापात्र। वे बहुत स्नेही व्यक्ति हैं। उनके साथ मेरी अच्छी मित्रता हो गयी थी।
यहाँ नागपुर के बारे में लिखना उचित रहेगा। यह महाराष्ट्र राज्य के अन्तर्गत विदर्भ क्षेत्र का प्रमुख शहर है और महानगर माना जाता है। यह एक ऐतिहासिक जनपद रहा है, महाभारत में इसका कई बार उल्लेख आया है। श्रीकृष्ण की पत्नी रुकमिणी इसी विदर्भ राज्य की राजकुमारी थीं, जिनके साथ श्रीकृष्ण ने गांधर्व विवाह किया था। रुकमिणी का भाई रुकमी महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ा था और अर्जुन के हाथों मारा गया था। इसी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है, परन्तु मुझे कभी वहाँ जाने का अवसर नहीं मिला था।
प्रशिक्षण के प्रारम्भ में ही हमारा एक टैस्ट लिया गया कि हम बैंकिंग के बारे में कितना जानते हैं। उस समय तक मेरा बैंकिंग का ज्ञान कुछ खास नहीं था, बस उतना ही था जितना किसी नियमित बैंक ग्राहक का होता है। अतः इस टैस्ट में मेरे अंक बहुत कम रहे। उस प्रशिक्षण में अधिकांश सहभागी ऐसे थे जो किसी न किसी बैंक शाखा में पदस्थ थे और शाखा के दैनिक कार्यों को निपटाते थे। स्वाभाविक ही उनका बैंकिंग का ज्ञान मुझसे अधिक ही था।
लेकिन प्रशिक्षण के अन्तिम दिन ऐसा ही टैस्ट फिर लिया गया, तो आश्चर्यजनक रूप से इसमें मेरे अंक बहुत अच्छे आये। इससे पता चलता है कि ऐसे प्रशिक्षणों से वास्तव में सहभागियों को लाभ होता है। इसलिए मैं इस प्रशिक्षण से बहुत प्रसन्न और संतुष्ट था।
इसी प्रशिक्षण में एक अन्य कम्प्यूटर अधिकारी थे श्री आनन्द कृष्ण श्रीवास्तव, जो उस समय स्केल 1 में थे। मैं उनसे अधिक परिचित नहीं था, लेकिन वे मुझे जानते थे। वे यह भी जानते थे कि मैं एक बार पुरस्कार प्राप्त करने के लिए जापान की यात्रा कर चुका हूँ। मैं यह किसी को बताना नहीं चाहता था, लेकिन श्री आनन्द कृष्ण ने यह बात कुछ सहभागियों को बता दी और उनसे यह सूचना हमारे प्रशिक्षकों तक पहुँच गयी। वहाँ जो प्रशिक्षक थे, उनके नाम मुझे याद हैं- श्री बी. मित्रा और श्री आर.के. द्विवेदी। मेरी जापान यात्रा के बारे में जानने के बाद उन्होंने मुझसे विस्तार से पूछा और जानकर बहुत प्रभावित हुए।
यह प्रशिक्षण दो सप्ताह का था। बीच में जो रविवार पड़ा, उसका उपयोग हमने नागपुर से बाहर के स्थानों का भ्रमण करने में करने का निश्चय किया। नागपुर के पास ही वर्धा है, वहाँ के निकट रामटेक नामक ऐतिहासिक स्थान है और एक बड़ी झील भी है। हमें इन दोनों स्थानों में जाना था। वहाँ खाने के लिए भोजन हमने कर्मचारियों से बनवाकर रख लिया था। सभी प्रशिक्षणार्थी तीन जीपों में भरकर घूमने निकले। साथ में दो कर्मचारी लड़के भी भोजन वितरण के लिए साथ में ले लिये।
सबसे पहले हम रामटेक गये। यह एक पहाड़ी स्थल है। इस पहाड़ी पर श्री राम, सीता और लक्ष्मण का मन्दिर बना हुआ है। वह सितम्बर का महीना था, मौसम बहुत अच्छा था। रविवार होने के कारण उस दिन दूसरे लोग भी आये थे। वैसे वह स्थान शहर से दूर होने के कारण कम लोग ही आ पाते हैं। रामटेक को संस्कृत काव्य ‘मेघदूत’ की रचनास्थली माना जाता है। कहा जाता है कि महाकवि कालिदास ने यहीं रहकर ‘मेघदूत’ लिखा था। यह बात विश्वसनीय इसलिए है कि पहाड़ी स्थान होने के कारण यहाँ बादल बहुत घिरे रहते हैं। यहाँ महाकवि कालिदास का स्मारक भी बना हुआ है।
यह एक अन्य कारण से भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि वन में घूमते हुए श्री राम ने यहीं पर ऋषि-मुनियों की हड्डियों के ढेर देखे थे, जिनको देखकर श्री राम ने अपनी भुजा उठाकर प्रतिज्ञा की थी कि मैं इस धरती को राक्षसों से हीन कर दूँगा। ‘टेक’ शब्द का अर्थ भी प्रतिज्ञा होता है। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम ‘रामटेक’ पड़ा था अर्थात् जहाँ राम ने प्रतिज्ञा की थी। हमें रामटेक बहुत अच्छा लगा। हालांकि वहाँ लंगूर बहुत थे, पर वे केवल खाने-पीने की चीजों को छीनते हैं, और किसी को परेशान नहीं करते।
रामटेक से हम एक झील पर गये। उसका नाम मुझे याद नहीं है। वह झील बहुत बड़ी है और पूरी तरह प्राकृतिक है। वह तीन ओर से पहाड़ियों से घिरी हुई है, केवल एक ओर से खुली है, जिधर से यात्री वहाँ आते हैं। उस झील पर पहुँचकर पहले हमने खाना खाया, फिर झील में नौका विहार किया। उस झील में पानी के खेलों का अच्छा प्रबंध था। पैडल से चलने वाली नावों के अलावा वहाँ वाटर स्कूटर की सुविधा भी थी, जिस पर बैठकर एक व्यक्ति बहुत तेजी से झील में चक्कर लगा सकता था। एक अन्य आदमी उसके साथ पीछे बैठता है, जो स्कूटर को नियंत्रित करता है। मेरे कमरे के साथी श्री महापात्र सहित कई साथियों ने उस स्कूटर का आनन्द लिया। तब मैं भी उसका आनन्द लेना चाहता था, लेकिन तभी हवा बहुत तेजी से चलने लगी। इसलिए खतरा जानकर प्रबंधकों ने सभी वाटर स्पोर्ट बन्द कर दिये। इसके कुछ देर बाद हम लौट चले क्योंकि अंधेरा होने वाला था और रास्ता ढाई-तीन घंटे का था।
नागपुर के ही देखने योग्य स्थान हम पहले देख चुके थे। तेलनखड़ी नामक एक अच्छा पिकनिक स्पाॅट हमारे स्टाफ कालेज के निकट ही था। एक दो बार शाम को हम वहाँ गये थे। हमारे स्टाफ कालेज से नागपुर का सीतावर्डी नामक मुख्य बाजार लगभग डेढ़ किमी दूर था। अतः शाम को लड़के टहलते हुए वहाँ चले जाते थे और खरीदारी करके रात्रि भोजन के समय तक लौट आते थे। एक-दो बार मैं भी गया था और वहाँ ‘अपना बाजार’ नामक दुकान से अपने लिए कुछ शर्ट खरीदकर लाया था।
मैं नागपुर में संघ के प्रधान कार्यालय का भ्रमण करना चाहता था। एक दिन शनिवार को जल्दी अवकाश हो गया तो मैंने वहाँ जाने का निश्चय कर लिया। सौभाग्य से मेरे साथी अधिकारी श्री आनन्द कृष्ण श्रीवास्तव मेरे साथ चलने को तैयार हो गये। संघ कार्यालय वहाँ से काफी दूर था, पर हम पूछते हुए टैम्पुओं द्वारा वहाँ पहुँच गये। वहाँ कई सज्जनों से हमारा परिचय हुआ। वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए कि हम भी स्वयंसेवक हैं और बैंक के प्रशिक्षण पर आये हैं। उन्होंने हमें कई बातें बतायीं। फिर हम वहाँ का पुस्तकालय व भंडार देखने गये और कुछ वस्तुएँ खरीदी भीं। डाॅ हेडगेवार के समाधि स्थल के दर्शन भी हमने किये। लगभग दो घंटे वहाँ बिताने के बाद हम वापस आ गये।
इस प्रशिक्षण में एक या दो पीरियड कम्प्यूटर के बारे में जानकारी देने के भी थे। उस समय तक बैंक में बहुत कम कम्प्यूटरीकरण हुआ था, अतः अधिकांश सहभागी कम्प्यूटर से अनभिज्ञ थे। यह पीरियड नागपुर के क्षेत्रीय कार्यालय के ईडीपी अधिकारी श्री अनु भार्गव को लेना था, जो मेरे ही बैच के थे। परन्तु पीरियड वाले दिन उनकी तबियत खराब हो गयी, तो प्रशिक्षकों ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं सहभागियों को कम्प्यूटर के बारे में बताऊँ। उनको यह पता नहीं था कि उस पीरियड में क्या-क्या बताया जाने वाला था और न कोई पाठ्य सामग्री ही तैयार थी। अतः मैंने अपने अनुभव के अनुसार तय किया कि क्या-क्या बताना अच्छा रहेगा। मेरा पीरियड बहुत अच्छा रहा और सबको पसन्द आया। श्री बी. मित्रा मुझसे बहुत प्रभावित हुए।
इसके अगले ही दिन प्रशिक्षण का समापन और हमारी विदाई हुई, जिसमें सहभागियों ने गीत आदि प्रस्तुत किये। इसमें मैंने एक प्रहसन सुनाया था, जिसे सुनकर सब बहुत हँसे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें