आत्मकथा भाग-2 अंश-46

1993 का वर्ष हमारे लिए लगभग सामान्य रहा। मैं आर्थिक चिन्ताओं से मुक्त था और अपनी पत्नी तथा 2-3 साल के पुत्र दीपांक के साथ आनन्दपूर्वक दिन गुजार रहा था। बीच-बीच में हमारे रिश्तेदार वाराणसी घूमने आते रहते थे। उनके साथ हम सभी प्रमुख मन्दिर देखने तथा गंगास्नान करने अवश्य जाते थे। समय मिलने पर सारनाथ और विंध्याचल भी जाते थे। उस वर्ष दो घटनायें प्रमुख हुईं, जिनका उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ।
हमारा पुत्र दीपांक उस समय लगभग ढाई (वाराणसी की बोली में अढ़ाई) साल का था। अचानक वह बीमार पड़ गया। प्रारम्भ में उसे बुखार था और जाने क्या बीमारी थी कि कुछ भी खिलाने या पिलाने पर पलट देता था। ऐसी शिकायतों का प्राकृतिक चिकित्सा में सरल और रामवाण इलाज है और मुझे उसका पर्याप्त ज्ञान भी था, परन्तु श्रीमती जी उसको बच्चे पर आजमाने के लिए तैयार नहीं थीं। इसलिए मैंने भी अधिक जोर नहीं दिया और प्रचलित परम्परा के अनुसार शिशु रोग विशेषज्ञों को दिखाया। परन्तु जाने क्या बात हुई कि सभी बतायी गयी दवाएँ लेते रहने पर भी वह ठीक होने में नहीं आ रहा था और उसकी कमजोरी बढ़ती जा रही थी। एक दिन वह खुद हमसे बोला- ”मैं कैसे ठीक होऊँगा?“ हमने उसे तो किसी तरह समझा दिया, लेकिन मन ही मन में स्वयं बहुत रोये।
सौभाग्य से तभी हमें एक ऐसे बाल रोग विशेषज्ञ के बारे में पता चला, जिनके बारे में बताया गया था कि वे बच्चों को बहुत कम दवाएँ देते हैं और सही दवा देकर ठीक कर देते हैं। हम उनके पास दीपांक को ले गये और ईश्वर की कृपा ऐसी हुई कि उनके इलाज से मात्र एक-दो सप्ताह में ही दीपांक लगभग ठीक हो गया। वह लगभग दो महीने लगातार बीमार रहा था।
दीपांक अपनी चंचलता तथा अन्य कारणों से कई बार खतरे में पड़ा था, परन्तु मेरी सतर्कता और अपनी बुद्धि के बल पर हर बार बच जाता था। एक बार हम रिक्शे में कहीं से आ रहे थे। श्रीमती जी बगल में बैठी थीं और दीपांक मेरी गोद में लेटा था। उस समय वह केवल 6-7 महीने का था, इसलिए मेरे दोनों हाथ घिरे हुए थे। तभी हमारा रिक्शा आगे वाले रिक्शे से अचानक टकरा गया और हम गिरने लगे। श्रीमतीजी तो रिक्शे को पकड़कर गिरने से बच गयीं, परन्तु मेरे दोनों हाथ घिरे हुए थे, इसलिए मैं गिरने से नहीं बचा। परन्तु मैं आगे की तरफ गिरते-गिरते भी जानबूझकर इस प्रकार घूम गया कि मेरी पीठ और कोहनी सड़क से टकरायीं और छिल गयीं, परन्तु दीपांक मेरे सीने पर लगा हुआ एकदम सुरक्षित रहा। उसे खरोंच तक नहीं आयी।
एक बार वह दौड़ते हुए साँड़ के नीचे आते-आते बचा। वह मेरे पास खड़ा था और मैं अपने कुछ दोस्तों से बात कर रहा था। तभी एक दूधवाले ने एक साँड़ को मारकर भगाया, तो वह हमारी तरफ ही दौड़ता हुआ आया। दीपांक उसके सीधे रास्ते पर था। मैंने फुर्ती से दीपांक को अपनी ओर खींच लिया और साँड़ हमारे बगल से दौड़ता हुआ निकल गया। तब दीपांक लगभग 2 साल का था। इसी तरह एक बार अलमारी के ऊपर से एक अटैची अचानक गिर पड़ी। दीपांक ठीक उसी जगह खड़ा था, परन्तु अटैची को गिरते देखकर मैंने तत्काल उसे अपनी ओर खींच लिया। अगर में सतर्क न होता, तो अटैची सीधे उसके सिर पर गिरती।
जब वह केवल डेढ़-पौने दो साल का था, तो हमारे फ्लैट की बालकनी में लगे हुए ग्रिल पर चढ़ जाता था। उस ग्रिल में बाहर के तारों पर कपड़े सुखाने के लिए एक खिड़की भी थी। हम उस खिड़की को ताला लगाकर रखते थे। एक बार रात आठ-साढ़े आठ बजे जब मैं बालकनी में फोल्डिंग पलंग पर लेटा हुआ था और दीपांक रोज की तरह ग्रिल पर चढ़-उतर रहा था, तभी मेरी आँख लग गयी। थोड़ी देर बाद जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि ग्रिल की खिड़की बाहर की तरफ खुली पड़ी है और दीपांक मेरे सिरहाने सहमा-सहमा सा खड़ा हुआ है।
यह समझना मुश्किल नहीं था कि किसी कारणवश खिड़की का ताला खुला रह गया होगा और जब दीपांक ग्रिल पर चढ़ रहा होगा तो खिड़की एकदम खुल गयी होगी और वह गिरते-गिरते बचा होगा। अगर वह खिड़की से नीचे गिर जाता, तो साढ़े तीन मंजिल की ऊँचाई से पक्की सड़क पर गिरने पर उसका बचना असम्भव ही था। हमारे बगल वाले मुसलमान परिवार की एक बच्ची इसी तरह गिरकर मर गयी थी। हम इसका अनुमान करके ही काँप गये और परमपिता को लाख-लाख धन्यवाद दिया कि उसने दीपांक को गिरने से बचा लिया। इस घटना के बाद हम और अधिक सावधान रहने लगे थे।
1993 की दूसरी प्रमुख घटना मेरी नौकरी से सम्बंधित थी। मुझे बैंक में कार्य करते हुए 5 वर्ष हो रहे थे और मुझे आशा थी कि मैं शीघ्र ही स्केल 3 में प्रोमोशन पाकर वरिष्ठ प्रबंधक हो जाऊँगा। उसके लिए इंटरव्यू काॅल भी आया और मैंने अच्छी तैयारी भी की। उस समय वहाँ श्री के.पी. राय अधिकारियों की यूनियन के बड़े नेता ही नहीं, बल्कि अधिकारियों की तरफ से बैंक के बोर्ड में एक डायरेक्टर भी थे। उन्होंने भी मुझे आश्वासन दे रखा था कि मैं तुम्हारा प्रोमोशन जरूर करा दूँगा। इसलिए एक प्रकार से मैं निश्चिंत था।
नियत दिन पर मैं इंटरव्यू देने कोलकाता गया। मेरे दुर्भाग्य से वहाँ इंटरव्यू लेने वालों में एक श्री राधे रमण शर्मा भी थे, जो लखनऊ में हमारे सहायक महा प्रबंधक थे और जिन्होंने मेरा स्थानांतरण वाराणसी कराया था। वैसे मेरा इंटरव्यू ठीक हुआ था। अधिकांश सवालों के जवाब भी मैंने दे दिये थे और अपने द्वारा किये गये कार्यों के बारे में भी बताया था। परन्तु मेरा प्रोमोशन न होना था, न हुआ। सबका कहना था कि श्री आर.आर. शर्मा ने मेरा प्रोमोशन नहीं होने दिया। नेताजी श्री के.पी. राय भी कुछ नहीं कर पाये।
उस समय मुझे यह ज्ञात नहीं था कि जिन लोगों का प्रोमोशन किसी कारणवश नहीं हो पाता, वे चाहें तो चेयरमैन के पास अपील कर सकते हैं। अगर मुझे पता होता, तो मैं अवश्य अपील करता। मेरे सहयोगी अधिकारियों श्री अनिल कुमार श्रीवास्तव, श्री अतुल भारती और श्री संजय माथुर इन सभी को इस नियम की जानकारी थी, परन्तु उन्होंने जानबूझकर यह जानकारी मुझसे छिपा ली। हालांकि मेरे कार्यालय के ऐसे ही एक-दो अधिकारियों ने अपील की थी, परन्तु इस बात की भनक भी मुझे नहीं लगने दी गयी। मुझे आज भी इस सवाल के जवाब की तलाश है कि मेरे सहयोगी अधिकारियों ने यह बात मुझसे क्यों छिपायी।
खैर, अब वह समय बीत गया है। मुझे दुःख तो बहुत हुआ था, परन्तु नियति को मैंने स्वीकार कर लिया। मेरा प्रोमोशन इसके लगभग दो साल बाद 1995 के अन्त में हुआ था। इसकी कथा आगे लिखूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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