आत्मकथा भाग-2 अंश-42

हमारे वाराणसी आफिस के कम्प्यूटर विभाग के पुराने साथी श्री आर.के. जैन उस समय कोलकाता में आ चुके थे। हम एक दिन उनके घर भी गये और उनके साथ ही अगले दिन चिड़ियाघर देखने गये थे।
तीन-चार दिन कोलकाता में बिताने के बाद हम पूर्व निर्धारित दिन जगन्नाथ पुरी की ओर चले। हमारे आग्रह पर राम अवतार जी ने अपनी सबसे छोटी पुत्री संगीता (संगू) को भी हमारे साथ भेज दिया था। पुरी का समुद्र तट हमें बहुत अच्छा लगा, हालांकि वहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलने में बहुत कठिनाई होती थी। हम जगन्नाथ जी के दर्शन करने भी गये। वहाँ भीड़ बहुत थी और व्यवस्था भी बहुत गड़बड़ थी। अगले दिन हमारा विचार कोणार्क, भुवनेश्वर आदि घूमने जाने का था, जिसके लिए हमने टिकट भी बुक करा रखी थी। परन्तु दुर्भाग्य से उसी दिन दीपांक को बुखार आ गया। इससे हमने अपनी यात्रा एक दिन आगे सरकवा दी।
जब एक मेडीकल स्टोर द्वारा दी गयी दवाइयों से दीपांक का बुखार नहीं उतरा, तो मेरा प्राकृतिक चिकित्सा का ज्ञान यहाँ बहुत काम आया। वहाँ जो भी ठंडा पानी हमें मिला, उसी से पट्टियाँ भिगो-भिगोकर मैंने दीपांक के पेडू पर रखीं। इससे बुखार काबू में आ गया। अगले दिन हमने केवल आराम किया और उससे अगले दिन घूमने गये। कोणार्क, भुवनेश्वर, नन्दन कानन, लिंगराज मंदिर आदि अनेक स्थान हमने देखे। एक दिन पुरी में समुद्र तट पर फोटो खींचते समय पानी की तेज लहर आने के कारण हमारा ऑटोमैटिक कैमरा पानी में गिर गया और खराब हो गया, जो अभी तक ठीक नहीं हुआ है। खींचे हुए अधिकांश फोटो भी खराब हो गये थे। इसका मुझे बहुत दुःख हुआ। फिर भी कई फोटो बच गये। पुरी से लौटकर हम कोलकाता आये और वहाँ से अगले ही दिन वाराणसी की ओर चल पड़े।
यह कोलकाता की मेरी पहली यात्रा थी। इसके बाद तो कई बार बैंक के कार्य से कोलकाता जाने का अवसर मिला है, क्योंकि हमारे बैंक का प्रधान कार्यालय कोलकाता में ही है। राम अवतार जी से भी कई बार भेंट हुई है।
वैसे कोलकाता शहर मुझे अधिक पसन्द नहीं आया। वहाँ एक ओर तो भारी समृद्धि है और दूसरी ओर घोर दरिद्रता है। अधिकांश आबादी दरिद्रता का जीवन जीती है। वहाँ की जलवायु भी बहुत खराब है। प्रदूषण इतना है कि आदमी साँस भी आसानी से नहीं ले सकता। बेशुमार भीड़ के कारण पैदल चलना भी दुष्कर कार्य है। कुल मिलाकर यदि मुझे महानगरों में सबसे खराब महानगर का चुनाव करने के लिए कहा जाये, तो मैं बेखटके कोलकाता का ही नाम लूँगा।
सन् 1992 के अप्रैल माह में श्रीमतीजी की मम्मीजी ने अपनी सभी बेटियों और दामादों के साथ वैष्णो देवी की यात्रा का कार्यक्रम बनाया। वे अपने पैर की एक जानलेवा बीमारी से उबरी थीं। उसी समय उन्होंने इस यात्रा को करने की मन्नत मानी थी। इस यात्रा के लिए हम दो दिन पूर्व ही वाराणसी से आगरा आ गये। उस समय तक गुड़िया का विवाह नहीं हुआ था। हम सभी इस यात्रा में गये। यों मैं आर्यसमाजी विचारों का हूँ और मूर्तिपूजा में बिल्कुल विश्वास नहीं करता, लेकिन प्रकृति माता का पुजारी होने के कारण मैं हर्ष और उत्साह के साथ इस यात्रा में सम्मिलित हुआ। मूर्तिपूजा को छोड़कर मैंने इस यात्रा की सभी परम्परायें भी निभायीं।
उन दिनों वहाँ काफी भीड़ थी। दूर-दूर से आये हुए श्रद्धालु जिस प्रकार कष्ट उठाकर उन मूर्तिपिंडों के दर्शन करने आते हैं, उनकी वह भावना प्रशंसनीय है। वहाँ की मूर्तियाँ और देवी चाहे काल्पनिक और झूठी ही क्यों न हों, लेकिन उनके भक्तों की आस्था और श्रद्धा भावना वास्तविक और सच्ची है। इसी श्रद्धा भावना को मैं प्रणाम करता हूँ-
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
इस यात्रा में मुझे बड़ा आनन्द आया। इसका पूरा विवरण परिशिष्ट ‘ग’ में अलग से लिखा है, जिसे यहाँ कल लगाऊँगा।
उसी वर्ष अर्थात् सन् 1992 की गर्मियों में नदेसर (वाराणसी) में हमारी कालोनी से सटी हुई राजा नदेसर की कोठी के मैदान में एक सर्कस लगा। उस सर्कस में बहुत से हाथी, घोड़े, ऊँट, गधे, बकरी आदि जानवर आये थे, जो बाउंडरी के अन्दर खुले में बँधे रहते थे। दीपांक उस समय डेढ़-पौने दो वर्ष का था और दो-चार शब्द बोल लेता था। उसको मैं ये जानवर दिखाने रोज सर्कस के अन्दर ले जाता था। वह सभी जानवरों को पहचान लेता था और उनके नाम बता देता था। सर्कस के पहरेदार जानवर देखने के लिए केवल दीपांक को और उसके साथ मुझे अन्दर जाने देते थे। जब तक सर्कस वहाँ रहा, वह रोज शाम को उन जानवरों को देखने जाता रहा। वैसे हमने दो बार सर्कस भी देखा था- एक बार अपने परिवार के साथ और दूसरी बार मैदागिन वाले अपने रिश्तेदारों के साथ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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