आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 9)
साढ़े बारह बजे दोपहर के खाने का समय हुआ। सबके लिए मांसाहारी भोजन आया। मेरे लिए चावल तथा सूखी सब्जी बनी एक प्लेट आयी। सब्जी में अनेक तरह की सब्जियां- भिंडी, बैगन, गोभी, कुकुरमुत्ता (मशरूम), टमाटर तथा एक-दो चीजों के नाम मैं जानता नहीं, वगैरह थे। मैंने चावलों के साथ सब खाये। इससे पहले दिन शाम को मैंने कुछ खास नहीं खाया था, इसलिए काफी भूखा था। एक प्लेट खाने के बाद मैंने थोड़ा सा और खाने की इच्छा व्यक्त की, तो पता चला कि वह सब्जी अब खत्म हो गयी है। मेरे सामने मीनू लाया गया। मैंने उसमें से वेजीटेबिल करी तथा चावल मंगाये, जिनकी कीमत थी मात्र 1200 येन अर्थात केवल 160 रुपये, जो कि हमारे यहां 10 रुपये से ज्यादा की नहीं होगी। जब वह आया तो मुझे लगा कि इतनी सारी मैं नहीं खा पाऊंगा, परन्तु श्री हिरानो ने कहा कि खूब पेट भरकर खा लो। मैंने ऐसा ही किया। वह काफी स्वादिष्ट था, इसलिए खूब खाया। फिर भी थोड़ा सा बच ही गया।
खाने के बाद फिर दूसरा सत्र चालू हुआ। इस बार विचारणीय विषय था ”एशियाई भाषाओं का मानकीकरण तथा कम्प्यूटरों में उनका अधिक से अधिक उपयोग“। इसमें अनेक देशों ने भाग लिया था, परन्तु दुःख है कि भारत की ओर से कोई नहीं आया। यह विषय मेरी गहन रुचि का है और वास्तव में मेरा लेख इसी विषय पर था। इसलिए मैंने इस सत्र के सभी भाषणों को खूब ध्यान से पढ़ा। थाई, कोरियाई, चीनी, सिंहली आदि अत्यन्त जटिल भाषाओं और लिपियों में इस दिशा में काफी कार्य किया गया है। मुझे लगा कि देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियाँ तो इनसे कहीं ज्यादा सरल हैं। उनमें तो और भी अच्छा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। मैंने यह तय किया कि और कोई करे या न करे मैं तो इसी विषय पर गहन शोध करूँगा। मैंने इस बारे में योजना भी बनायी है।
(पादटीप- मैंने इस दिशा में थोड़ा सा शोधकार्य किया भी था। परन्तु मैं उसको कभी पूरा नहीं कर पाया। इसके दो कारण रहे- एक तो मुझे इलैक्ट्राॅनिक्स की कोई जानकारी नहीं है, और बिना उसके इस शोध का पूरा होना असम्भव है, और दूसरा, जो शायद अधिक महत्वपूर्ण है, यह कि मेरा ध्यान और समय पुस्तकों के लेखन में लगने लगा, जिनसे मुझे आर्थिक लाभ भी होता था। इसलिए मेरा शोधकार्य जहाँ का तहाँ रखा रह गया।)
(पादटीप- मैंने इस दिशा में थोड़ा सा शोधकार्य किया भी था। परन्तु मैं उसको कभी पूरा नहीं कर पाया। इसके दो कारण रहे- एक तो मुझे इलैक्ट्राॅनिक्स की कोई जानकारी नहीं है, और बिना उसके इस शोध का पूरा होना असम्भव है, और दूसरा, जो शायद अधिक महत्वपूर्ण है, यह कि मेरा ध्यान और समय पुस्तकों के लेखन में लगने लगा, जिनसे मुझे आर्थिक लाभ भी होता था। इसलिए मेरा शोधकार्य जहाँ का तहाँ रखा रह गया।)
करीब 5.30 बजे यह कांफ्रेंस पूरी हुई। 6 बजे से 8 बजे तक खाने का प्रोग्राम था। इस समय मुझे ज्यादा भूख नहीं थी और सारा खाना माँसाहारी था। इसलिए मैंने श्री हिरानो को कष्ट न देकर केवल फल तथा सब्जियों का सलाद खा लिया, जिनसे मेरा पेट खूब भर गया।
इसके बाद हम वहाँ से चले और पहले हम टोकियो के चाँदनी चैक शिंजूकू गये। यहाँ भारी भीड़ रहती है। यहाँ अनेक सिनेमा, कैबरे हाउस, नाइट क्लब आदि हैं। ग्राहकों की तलाश में रहने वाली लड़कियों तथा दलालों से भी हमारा पाला पड़ा, जिनसे मैंने किसी तरह पिंड छुड़ाया। इस जगह की गलियाँ बनारस की गलियों की तरह जटिल हैं और यह कहावत मशहूर है कि असली टोकियोवासी वह है, जो शिंजूकू में जाकर बिना भटके वापस निकल आये। भटक हम भी गये थे और एक जगह पर तो दो समूह बनकर बिछुड़ गये। परन्तु पूछ-पाछकर रेलवे स्टेशन तक पहुँच गये। यहाँ का रेलवे स्टेशन शहर में ही नहीं पूरे जापान में सबसे बड़ा है ओर मजे की बात यह है कि सारा जमीन के भीतर है। शहर में उसके चारों ओर से लगभग 10-12 दरवाजे अलग-अलग निकलते हैं, कई तो एकदम गली में। अतः जहाँ आपको जाना हो उसके ठीक पास वाले दरवाजे तक पहुँच जाने की कला जानना ही असली टोकियोवासी की पहचान है। किसी तरह पूछ-पाछकर हम अपने स्टेशन ‘शिनागावा’ तक आये।
वहाँ से श्री हिरानो मेरे लिए हीयरिंग ऐड दिलवाने एक जगह ले गये जिसे इलैक्ट्रिकल सिटी (बिजली का नगर) कहा जाता है। वहाँ सभी दुकानों में बिजली को रोशनियों का ऐसा भारी प्रबन्ध था कि आँखें चौंधिया गयीं। अनेक दुकानें पार करते हुए श्री हिरानो मुझे एक हीयरिंग ऐड की दुकान पर ले गये। वहाँ हमें कई प्रकार के हीयरिंग ऐड दिखाये गये। परन्तु उनमें से कोई भी मुझे फिट नहीं बैठा। दूसरे जैसा मैं चाहता था वैसे हीयरिंग ऐड उनके पास नहीं थे और सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी कीमतें इतनी ऊँची थीं कि उन्हें देना मेरे बूते की बात नहीं थी। इसलिए मैंने यह कहकर श्री हिरानो से छुट्टी ली कि आप चिन्ता न करें, मैं कल फिर यहाँ आकर देख लूँगा।
श्री हिरानो मुझे पाकिस्तान के श्री बट्ट के साथ छोड़कर चले गये। हम दोनों एक ही होटल में पास-पास के कमरों में रहते थे। वहाँ से हम दोनों पास की एक दुकान पर गये जहाँ कैमरे मिलते हैं। उसमें कैमरे तो अच्छे-अच्छे थे परन्तु उनकी कीमतें भारत के लिहाज से बहुत ज्यादा थीं यानी 2000 से 10000 रुपये के बीच और वीडियो कैमरे तो और भी मंहगे थे। इसलिए मैंने केवल एक छोटा फ्लैश वाला कैमरा पसन्द किया, जो मुझे 15800 येन यानी लगभग 2200 रु. में पड़ा। यहाँ मुझे टैक्स नहीं देना पड़ा, क्योंकि यह ड्यूटी फ्री की दुकान थी। इस दुकान की एक बड़ी कमसिन और सुन्दर लड़की ने सारे कागज भरवाये। मेरा पासपोर्ट भी मांगा और एक जगह हस्ताक्षर कराना भूल गयी, तो उसी दुकान में नीचे मुझे ढूँढ़ती हुई आयी। वह शायद नयी-नयी सेल्स गर्ल बनी थी।
एक दूसरी दुकान से मैंने तीन रीलें भी खरीदीं। वे भी हमारे हिसाब से महँगी थी। हमने वहाँ ऐसे वी.सी.आर. भी देखे जो राह चलते लोगों के चित्र उसी समय टी.वी. पर दिखा देते थे। इन मशीनों की कीमत लाखों रुपयों में थी।
25 अक्तूबर, 1990 (गुरुवार)
आज हमारे कार्यक्रम का अन्तिम दिन था। हम रोज काफी थक जाते थे। इसलिए इस बात से खुश थे कि आज हमें मुक्ति मिल जायेगी। आज ही हमें वह पुरस्कार दिया जाना था, जिसके लिए हमें बुलाया गया था। उत्तेजना से मेरा हृदय बहुत धड़क रहा था।
आज की कांफ्रेंस की थीम थी- ‘दुनिया में कम्प्यूटरीकरण को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाय।’ करीब 11 देशों ने इसमें अपने प्रतिनिधि भेजकर रिपोर्ट पेश की थीं कि उनके यहाँ इस दिशा में क्या-क्या किया गया है और आगे क्या करने की योजना है। इनमें पाकिस्तान, श्रीलंका, मैक्सिको, पेरू जैसे देश शामिल हुए थे, परन्तु अफसोस कि भारत का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। हमारी सरकार ही नहीं कम्प्यूटर सोसाइटी को भी आपसी झगड़ों से फुरसत नहीं मिलती, नहीं तो इस सम्मेलन में वरीयता देकर भाग लेना चाहिए था।
12 बजे तक एक-एक करके कई देशों के भाषण हुए। तब हमें पुरस्कार लेने के लिए बुलाया गया। स्वयं सी.आई.सी.सी. के चेयरमैन ने अपने हाथों से हमें सम्मान पत्र तथा एक-एक चमचमाता स्वर्ण कप भेंट में दिया, जिस पर हमारा नाम भी लिखा था। मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी और मैं स्वयं को उछलने से बड़ी मुश्किल से रोक पा रहा था। पुरस्कार के बाद हमें दो-दो मिनट तक बोलने का समय दिया गया। हमने अपने-अपने भाषण श्री हिरानो को पहले ही लिखकर दे दिये थे, ताकि यदि वे आवश्यक समझें तो दुभाषिये से सरल अनुवाद करा दें। परन्तु इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि मैंने अपना भाषण एक-एक शब्द धीरे-धीरे बोलते हुए पूरा किया, जो सबकी समझ में आ गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मैंने अपने संक्षिप्त भाषण में एक वेदमंत्र ‘आ नो भद्रा कृतवो यन्तु विश्वतः’ तथा रामचरितमानस की एक चौपाई ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।’ का भी उल्लेख किया था और उनका अर्थ भी सरल अंग्रेजी में बताया था।
इसके बाद भोजन का कार्यक्रम था। अतः इस समय हमने अपने खूब फोटो खिंचाये। मैंने श्री हिरानो तथा स्वर्ण कप के साथ अपना फोटो खिंचवाया। मेरा नया कैमरा इसमें बहुत काम आया।
भोजन में सबको एक-एक पैकेट दिया गया था, जिसमें मांसाहारी भोजन था, जो मेरे किसी काम का नहीं था। इसलिए आज फिर श्री हिरानो मुझे अकेले नीचे रेस्तरां में ले गये। वहाँ मैने फिर वही चावल और शाकाहारी करी मंगायी, जिसे खाकर मैं तृप्त हुआ। अदरक प्याज तथा दो चीजों की कद्दूकस की हुई चटनी सी भी थी, जो बड़ी स्वादिष्ट थी। साथ में घिसा हुआ सलाद भी था जिसमें कई चीजें एक साथ थी। सबको खाकर मुझे आनन्द आया।
इसके बाद भाषणों का सिलसिला फिर चालू हुआ। इस कांफ्रेंस में विजिटिंग कार्डों का आदान प्रदान खूब हुआ। पूरी दुनिया के देशों के सम्पर्क मेरे पास इकट्ठे हो गये हैं, जो शायद आगे बहुत काम आयेंगे।
कांफ्रेंस अभी एक दिन और चलनी थी, परन्तु हमारा कार्यक्रम आज ही समाप्त हो गया था, इसलिए सबके लिए प्रेसीडेन्ट होटल में पार्टी का प्रबन्ध किया गया था। वह उस जगह से केवल एक स्टेशन दूर था। हम वहाँ पैदल ही गये। पहले पीने-पिलाने का दौर चला। मैंने केवल पानी लिया।
वहीं सी.आई.सी.सी. की एक नयी कर्मचारी कु. नीमी (या निम्मी) से परिचय हुआ। बड़ी मुश्किल से मेरी बात उसकी और उसकी बात मेरी समझ में आ रही थी। उसने मुझे बताया कि उसी ने मेरे घर पर तथा आफिस में कई बार फोन किये थे और वह कुछ साफ नहीं सुन पायी, क्योंकि उधर काफी शोर हो रहा था। निम्मी ने इसी वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय कानून में स्नातक कोर्स किया है तथा उसके बाद सी.आई.सी.सी. में काम शुरू किया है।
वह काफी सुन्दर है, परन्तु चेहरे पर कुछ मुंहासे हैं। बातों-बातों में मैंने उसे अपनी श्रीमती जी का फोटो दिखाया, तो वह खुश हो गयी। मैंने पूछा- यह कैसी है, तो वह उछलते हुए बोली- ‘वैरी... ब्यूटीफुल...।’ मैंने उसे धन्यवाद दिया। हमनेे सन्तरे का रस पीते हुए साथ-साथ फोटो खिंचवाया, जिसे देखकर श्रीमती जी बहुत चिढ़ेंगी। देखा जायेगा।
पार्टी में मेरे खाने के लिए कुछ नहीं था। मैंने सलाद खाना चाहा तो देखा कि उसमें एक नयी चीज पतले-पतले कतरे जैसी पड़ी है। मैंने पूछा यह क्या है, तो पता चला कि वह मछली है। उसे फेंककर मैं भागा और कुछ फल खाकर काम चलाया।
पार्टी के बाद सबसे बार-बार हाथ मिलाकर हमने विदा ली। श्री हिरानो ने बड़े प्यार से हाथ मिलाकर हमें विदाई दी। वे पूरे चार दिन तक हर जगह हमारे साथ रहे थे और हमें टिकट ही नहीं नक्शे वगैरह भी लाकर दिये थे। हमारे खाने-पीने का प्रबन्ध किया था। हमारे एक साथी की टट्टी में खून आने लगा था, तो वे न जाने कहाँ से उसके लिए दवा लेकर ही लौटे, उस समय जब पार्टी लगभग खत्म होने वाली थी। तब तक उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था। उन्हें मन ही मन अनेक बार प्रणाम करके मैं अपने होटल तक आया और आकर सो गया।
श्री हिरानो जाते-जाते हमें आने-जाने तथा एअरपोर्ट टैक्स तक के पैसे दे गये थे। श्री हिरानो ने मुझे बताया था कि वे 20 महीने भारत में रह चुके हैं। मैंने उन्हें पुनः भारत आने का निमन्त्रण दिया, जो उन्होंने हँसकर स्वीकार कर लिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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