आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 7)
23 अक्टूबर, 1990
यह हमारे घूमने का दूसरा दिन था। श्री हिरानो के निर्देशानुसार हम 8.10 से पहले ही नीचे लाबी में पहुँच गये थे। वे भी समय पर आ गये। वहाँ से हमें निक्की डाटा बेस देखने जाना था। इधर से हम फिर टैक्सी में गये। मैंने कहा था कि अगर वहाँ बस जाती हो, तो हम बस में जाने को तैयार हैं, परन्तु वे न माने। निक्की डाटा बेस को ढूँढ़ने में उन्हें थोड़ा समय लगा, परन्तु मिल गया। हम वहाँ गये, तो बड़ा स्वागत हुआ। वहाँ के लोग अंग्रेजी कम जानते थे, परन्तु एक-दो ऑफीसर अच्छी अंग्रेजी जानने वाले मिल ही जाते हैं। उन्हीं में से एक श्री नाओमी आसो ने सबसे पहले हमें निक्की डाटा बेस के बारे में जानकारी दी। काफी प्रभावपूर्ण जानकारी थी।
यह डाटा बेस हमारे यहाँ के टाटा-बिरला की तरह एक धनकुबेर की निजी सम्पत्ति है। इसमें जापान तथा एशिया के कई देशों की हजारों कम्पनियों के बारे में जानकारी भरी रहती है, जो प्रत्येक मिनट सुधारी जाती रहती है। दुनिया भर के नये-नये आर्थिक-राजनैतिक समाचारों, विचारों तथा लेखों का भी इसमें भंडार रखा जाता है, जिन पर 4000 से अधिक कर्मचारी दिन-रात काम करते हैं। प्रत्येक ग्राहक शुल्क देकर इस सूचना का उपयोग कर सकता है, यानी पढ़ सकता है या नकल कर सकता है, परन्तु बदल नहीं सकता। बड़ी-बड़ी व्यापारिक कम्पनियों के लिये ये सूचनाएँ बहुमूल्य होती हैं, जो उन्हें मामूली खर्च पर सरलता से घर बैठे मिल जाती हैं।
ऐसे डाटा बेस दुनिया में और भी हैं, परन्तु इतना बड़ा कोई नहीं है। भारत में तो ऐसा शायद ही कोई हो। हम काफी प्रभावित हुए। करीब एक घंटे तक सूचनाओं के नमूने दिखाकर हमें विदा किया गया। वहाँ से हमें लगभग 50 कि.मी. दूर सुकूबा को जाना था, जहाँ एक विज्ञान शहर ही बसाया गया है। भारत में ऐसा शहर बनने की बात एक बार चली थी, परन्तु शायद लालफीताशाही आड़े आ गयी। सुकूबा के लिए वहाँ से ट्रेन जाती है, पैसेन्जर जैसी। मैंने बुलेट ट्रेन का काफी नाम सुना था, परन्तु बैठने का मौका नहीं लग पाया। वह दूर-दूर जाती है और हमारे पास इतना समय नहीं था।
यहाँ जापानी रेलों के बारे में बता देना उचित रहेगा। जापान में तीन तरह की रेल हैं- टोकियो शहर की सब-वे रेल (जो जमीन के भीतर चलती हैं), जापान रेलवे तथा बुलेट ट्रेन। टोकियो शहर की यातायात की जिम्मेदारी सब-वे रेलों पर है। यह हमारे यहाँ की मेट्रो जैसी है। पूरे शहर में एक-एक डेढ़-डेढ़ किलोमीटर पर स्टेशन बने हुए हैं, जिनसे होकर करीब 10-12 रूटों पर रेलें चलती हैं। इनमें काफी भीड़ होती है तथा खास-खास समय (पीक आवर्स) पर रेलें दो-दो मिनट में आती रहती हैं। टिकटें प्रायः मशीन से खरीदनी पड़ती हैं। अपना नोट या सिक्के मशीन में डालिये। जितनी कीमत की टिकट चाहिए उसका बटन दबाइये तथा नीचे टिकट और बचे हुए पैसे आ जायेंगे। अन्दर जाने के लिए या तो अपनी टिकट को टिकट चैकर से पंच कराइये या फिर यह काम भी मशीन से कराइये।
ये मशीनें ऐसी हैं कि एक ओर अपना टिकट रखिये। अगर वह वैध होगी तो टिकट में गोल छेद होकर आगे से निकल आयेगी और दरवाजा खुल जायेगा। नहीं तो उस टिकट को मशीन जब्त कर लेगी और दरवाजा नहीं खुलेगा।
लौटते समय पर होता है कि टिकट यदि वैध है तो मशीन टिकट रख लेगी और दरवाजा खोल देगी, नहीं तो मशीन टिकट आपको वापस कर देगी और दरवाजा बन्द ही रहेगा। यह लगता तो बड़ा सीधा है, पर मेरे खुराफाती दिमाग ने इसमें भी कुछ पेंच ढूँढ़ लिये। मैंने कहा कि यदि कोई वैध टिकट रखे और जब उसके लिए दरवाजा खुले तभी उसके साथ ही कोई दूसरा आदमी भी बाहर निकल जाये, तो मशीन क्या कर लेगी, इसका जबाव कोई नहीं दे पाया। इसी तरह भीतर जाने के लिए भी ट्रिक से काम लिया जा सकता है। ऐसे आदमी को पकड़ पाना असंभव होगा, क्योंकि भीतर यानी चलती गाड़ी में कोई चैकिंग नहीं होती। परन्तु यह जापान है, भारत नहीं। यहाँ ऐसी बेईमानी कोई करता नहीं। लोग तो यहाँ इतने ईमानदार हैं कि यदि वे कहीं दूर के स्टेशन से आ रहे हैं तथा टिकट कम पैसों की ली है, तो बाकी पैसे बाहर निकलते समय टिकट चैकर से पूछकर दे जाते हैं, जिनकी कोई रसीद भी नहीं दी जाती और एक-एक पाई सही जगह जमा हो जाती है।
रेलवे स्टेशन वैसे ही हैं जैसे हमारे यहाँ होते हैं। भीतर दुकानें भी है परन्तु गन्दगी नाम को भी नहीं तथा बैठकर इन्तजार करने के लिए सीटें भी नहीं क्योंकि किसी को इन्तजार करने की जरूरत नहीं। गाड़ियाँ 5-5 मिनट पर एक के बाद एक आती रहती हैं। प्रत्येक में 5-6 ही बड़े-बड़े डिब्बे होते हैं। उतने में जितने आदमी आ जायें, उन्हें लेकर चल देती है। बाकी अगली गाड़ी से आ सकते हैं। ज्यादा भीड़ के समय पर गाड़ियां दो-दो मिनट बाद भी आती रहती हैं, इससे किसी का भी समय बेकार नहीं जाता।
स्टेशन एक-एक, डेढ़-डेढ़ किलोमीटर दूर बने हुए हैं। प्रत्येक स्टेशन पर सैकड़ों लोग चढ़ते उतरते हैं। प्रत्येक डिब्बे में चार-चार पाँच-पाँच दरवाजे होते हैं। जिनको चढ़ना होता है वे दरवाजे के बाहर लाइन लगाकर खड़े रहते हैं, यह आश्चर्यजनक है कि लाइनें ठीक उसी जगह लगती हैं, जहाँ दरवाजा आकर रुकता है और दरवाजा ठीक उसी जगह रुकता है, जहाँ लाइनें लगती हैं। इसका रहस्य मैं अभी तक नहीं जान पाया हूँ, क्योंकि वहाँ ऐसा केाई चिह्न नहीं था, जिससे पता चले कि दरवाजा वहीं आकर खुलेगा। जब मैंने श्री हिरानो से इसका रहस्य पूछा, तो वे केवल मुस्करा दिये।
हाँ तो मैं कह रहा था कि जैसे ही गाड़ी आकर रुकती है दरवाजा अपने आप खुल जाता है और लगभग आधे मिनट तक खुला रहता है। पहले सब उतरने वाले उतरते हैं और जब वे सब उतर जाते हैं तब चढ़ने वाले चढ़ते हैं। किसी के पास ज्यादा सामान होता नहीं। मुश्किल से हाथ में या कन्धे पर लटकाने वाले बैग होते हैं। इसलिए उतरने-चढ़ने में दो कदम चलने जितना समय लगता है। भारत की तरह धक्का-मुक्की बिल्कुल नहीं होती, चाहे भीड़ कितनी भी हो। यहाँ दरवाजे भी कई और बड़े-बड़े होते हैं।
भीतर दीवाल के सहारे कुर्सियाँ बनी होती हैं। उन पर कुछ लोग बैठ जाते हैं, बाकी डंडा या छल्ला पकड़कर खड़े रहते हैं। ऊपर सामान रखने के लिए भी जगह है। परन्तु उनका उपयोग बहुत कम लोग करते हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग एक-दो स्टेशनों के बाद ही उतर जाते हैं और नयी गाड़ी पकड़ते हैं।
यहाँ मैंने एक विचित्र बात देखी कि ज्यादातर लोग गाड़ी में लगने वाले समय का सदुपयोग किताबें पढ़कर करते हैं। हालांकि ये किताबें ज्यादातर अखबार, उपन्यास जैसी ही होती हैं। बाकी लोग सो लेते हैं। दो-दो मिनट की रेलयात्रा में सो जाना जापानियों की ही विशेषता है। कई लोग अपना अखबार पढ़ने के बाद गाड़ी में ही छोड़ जाते हैं, ताकि दूसरा कोई पढ़ना चाहे, तो पढ़ सके। यहाँ हमारे देश की तरह अखबार रखकर घर ले जाने की परम्परा नहीं है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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