आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 6)
जब हम प्रदर्शनी से बाहर आये तो सबके पास ढेर सारे पैम्फलेट (जो ज्यादातर ने जबर्दस्ती पकड़ा दिये थे) तथा अनेक तरह के थैले थे। काफी वजन हो गया था, इसलिए एक जगह जाकर मैंने यह किया कि थैलों को तो मोड़कर एक थैले में रखा और जो पैम्फलेट थे उनमें से केवल अंग्रेजी के काम के पैम्फलेट अलग करके बाकी को एक कूड़े के डिब्बे को समर्पित कर दिया। फालतू वजन कम हो जाने से मुझे बड़ी राहत मिली।
लौटते समय हमें बस में एक-एक पैकेट दिया गया, जिसमें डबल रोटी और मक्खन था। एक डबल रोटी के बीच में मक्खन के बजाय कुछ और था, जिसका स्वाद मुझे अजीब का लगा। मैंने पूछा यह क्या है तो पता चला कि वह मछली है। मैंने तुरन्त वैसी सारी डबल रोटियां अलग की तथा केवल ब्रेड-मक्खन वाली रोटियाँ खायीं। मैंने यह भी कसम खायी कि आगे से प्रत्येक चीज खाने से पहले बहुत सावधान रहूंगा।
वहाँ से हम एक पिकनिक स्पाट पर आये, शायद इम्पीरियल पैलेस। वहाँ एक नदी बहती रहती है तथा काफी हरियाली भरा मैदान है। वहाँ लोग आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं तथा टहलते हुए चले जाते हैं। हमारी तरह घास पर चादर बिछाकर बैठकर खाना-पीना तथा सोना वहाँ नहीं चलता। वैसे वहाँ घास के मैदान भी हैं, पर उन पर जाता कोई नहीं। बाहर कुर्सियाँ बनी हुई हैं, जिन पर लोग बैठ जाते हैं। वैसे तो जगह बड़ी अच्छी है, पर पिकनिक का पूरा मजा नहीं आया। नदी भी कुछ इस तरह बह रही थी जैसे हमारे घर की नालियां बहती हैं। वैसे भी इनका महत्व शहर के नाले से अधिक नहीं। पानी भी बहुत गन्दा है, जिसे कोई छूता भी नहीं, नहाना-धोना तो दूर की बात है।
वहाँ एक योद्धा घुड़सवार की मूर्ति बनी हुई है। वहाँ हमने फोटो खिंचवाये। सभी आगन्तुकों में अकेला मैं ही था, जिसके पास कैमरा नहीं था, क्योंकि मैं कैमरा यहीं से खरीदने वाला था, जिसके लिए अभी तक समय नहीं मिला था। इसलिए श्री हिरानो ने ही अपने कैमरे से मेरी कई तस्वीरें खींची। मेरी जिद पर मेरी दो-तीन तस्वीरें उन्होंने अपने साथ भी खिंचवा लीं। उन्होंने बड़े प्यार से मुझे चिपकाकर तस्वीरें खिंचवायीं।
वहाँ से चलकर हम एन.टी.टी. कम्यूनिकेशन सेन्टर पर आये। यह जापान के सरकारी टेलीफोन और टेलीग्राफ निगम का हैड आफिस है। जापान ने टेली कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में जो भी प्रगति की है उसका कर्ता-धर्ता यही है। यहाँ हमें वीडियो फिल्मों, सजीव उदाहरणों तथा नमूनों द्वारा यह बताया गया कि जापान ने अब तक क्या-क्या किया है और आगे क्या करने वाला है। चित्र वाले टेलीफोन, वीडियो के माध्यम से सम्मेलन करने (वीडियो काँफ्रेंसिंग) का सिस्टम, चलते हुए वीडियो पर किसी भी चित्र को छपवाना तथा सामने खड़े व्यक्ति की आवाज तथा चित्र को रिकार्ड करके कहीं भी दिखा देना इसके कुछ करतब हैं। टेलीफोन, वीडियो, टी.वी. टेलेक्स, कम्प्यूटर आदि अनेक प्रकार के उपकरणों को एक साथ जोड़कर एक संचार सिस्टम बनाना इसकी नयी कारगुजारी है। इन्हें बताना ही विस्मयजनक लगता है, देखना तो मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। खास तौर से वीडियो के माध्यम से दूर-दूर बैठकर कांफ्रेंस करना। इसमें एक ही बड़े पर्दे को चार-छः हिस्सों में बाँट कर सबका चित्र एक-एक हिस्से में प्रदर्शित किया जाता है और लोग एक-दूसरे की बात सुन भी सकते हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे आमने-सामने बैठे हों। हमें इसमें बड़ा मजा आया।
इसी तरह एक ऐसी फैक्स मशीन दिखायी गयी जिसकी स्पीड काफी ज्यादा है और जिसके द्वारा भेजा गया चित्र या पत्र बिल्कुल असली जैसा लगता है। अभी बहुरंगी फैक्स आना बाकी है।
एन.टी.टी. की उपलब्धियों के बारे में हमें बताया एक लड़की ने, जिसका नाम था ‘मासुमी’ किन्तु सुविधा के लिए हम उसे ‘मौसमी’ कह सकते हैं। वह काफी सुन्दर थी। भरे हुए गाल, जिन पर पाउडर की दो पर्तें तथा और होठों पर लिपस्टिक की चार। हर समय मुस्कराना और बात-बेबात हँसना। हँसना भी इस तरह कि मोती जैसे दाँतों के अलावा कुछ और दिखायी न पड़ जाये। लेकिन यह मत समझिये कि मौसमी केवल जापानी गुड़ियाओं में से एक थी। वास्तव में वह काफी योग्य थी। उसने हर बात इतनी अच्छी तरह दिखायी और समझायी कि हमें कोई प्रश्न पूछने की भी जरूरत नहीं पड़ी। उसने हममें से एक का फोटो भी वीडियो से छपवाकर हाथों-हाथ पकड़ा दिया।
चलते समय मौसमी ने बड़ी अदा से कमर तक झुककर हमें नमस्कार किया। जापान में झुककर बिना कुछ बोले नमस्कार किया जाता है। हर बात पर बार-बार झुकना यहाँ का रिवाज है। कुछ कम झुकते हैं, तो कुछ एकदम दोहरे हो जाते हैं। गुड माॅर्निंग कहना यहाँ नहीं चलता।
एन.टी.टी. की विलक्षण खोजें देखकर ही हमने बस नहीं की, बल्कि अभी और भी चमत्कार देखने थे। उसी का एक हिस्सा है, एन.टी.टी. डाटा फेज, जहाँ डाटा कम्यूनीकेशन का एक नया और विलक्षण सिस्टम तैयार किया गया है। उसको हमें दिखाया कु. एम. ओनो ने, जिसे हम सुविधा के लिए मोनो या ‘मोना’ कह सकते हैं। यह मोना मौसमी से कम सुन्दर थी, परन्तु ज्यादा पढ़ी-लिखी थी। उसने भी डाटा फेज समझाया तथा कुछ ऐसी चीजें दिखायीं जिनका उत्पादन अभी केवल प्रयोग के तौर पर किया जा रहा है। यहाँ हमने कम्प्यूटर संगीत के विलक्षण प्रयोग भी देखे। आप अपना पियानो बनाइये, कम्प्यूटर उसे रिकार्ड करता जायेगा। बाद में उस धुन को कम्प्यूटरीकृत पियानो पर जब चाहे सुन लो, और चाहो तो सुधार लो।
यहीं हमने एक कम्प्यूटरीकृत संगीत प्रोग्राम भी सुना (मैंने केवल देखा)। इसमें एक माॅडल कई प्रकार से हरकतें करता है तथा बैकग्राउंड में संगीत बजता रहता है। काफी प्रभावित करने वाला कार्यक्रम था। मोना ने भी उसी तरह हमें झुककर विदा दी तथा कुछ कागज-पन्ने भी भेंट में दिये।
यहाँ से हमें अशोका रेस्टोरेन्ट जाना था, जहाँ हमारे रात के खाने का प्रबन्ध किया गया था। श्री हिरानो ने यहाँ मेरा काफी ध्यान रखा। मैं तो केवल रोटी तथा एक सब्जी चाहता था, परन्तु उन्होंने दो सब्जी तथा रायता भी मंगवा लिया। यह होटल जापान के गिने-चुने ऐसे रेस्तराओं में से एक है, जहाँ भारतीय खाना मिलता है। मेरे सामने जो मेन्यू लाया गया, वह सारा जापानी में छपा था, अंग्रेजी में एक शब्द भी नहीं। इसलिए वह मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर था। लेकिन उसमें हर चीज के चित्र भी छपे हुए थे। वहीं एक पन्ने पर मुझे बन्द गोभी की सब्जी का चित्र दिखाई पड़ गया। मैंने उसी पर उँगली रख दी कि यह ले आओ और वह ले आया। मेरे अलावा सबने माँसाहारी भोजन किया था। यहाँ मैंने छककर पानी पिया। एक गिलास सन्तरे का रस भी पिया तथा भारतीय पद्धति की चाय अन्त में मिली, जो कि यहाँ एक बड़ी दुर्लभ वस्तु है।
श्री हिरानो वहाँ से हमें होटल के लिए विदा करके चले गये। मैंने वहाँ से कैमरा खरीदने का प्रयत्न किया, परन्तु जिस दुकान से मुझे खरीदना था, वह बन्द हो चुकी थी। इसलिए हम टैक्सी में बैठकर वापस आ गये। टैक्सी के पैसे श्री हिरानो दे गये थे। मेरे साथ पाकिस्तान के श्री बट्ट थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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