आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 5)

22 अक्टूबर 1990
सुबह 5.00 बजे मेरी नींद खुल गयी। श्री हिरानो के निर्देशानुसार मुझे ठीक 7.50 पर नीचे लाबी में पहुँच जाना था। इसलिए पहले मैंने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर नाश्ता किया। बाहर से कोकाकोला लाकर पिया। थोड़ा सा लिखा और फिर चलने के लिए तैयार हो गया।
यहाँ ठंडे-गर्म पेय बेचने की मशीनें लगी हुई हैं। प्रत्येक पेय का मूल्य समान है, परन्तु जगह-जगह के हिसाब से मूल्य बदलता है। सार्वजनिक स्थानों में एक डिब्बे की कीमत 100 येन है, जबकि होटलों में 150 येन और कहीं-कहीं 200 येन। इन मशीनों में हर तरह के पेय के डिब्बों के नमूने प्रदर्शित होते हैं, जिनके नीचे बत्ती वाले बटन है। प्रत्येक पेय टिन के खास डिब्बों में होता है। आप अपने सिक्के या नोट निर्धारित स्थान पर डालें। जितने के सिक्के या नोट आपने दिये होंगे, उतनी संख्या एक जगह उभर आयेगी। यदि यह चीज खरीदने के लिए काफी हैं, तो जो डिब्बे उपलब्ध होंगे उनके नीचे की बत्ती जल जायेगी। आप अपनी पसन्द के डिब्बे के बत्तीदार बटन को दबाइये और नीचे एक खाने में वही डिब्बा हाजिर हो जायेगा। यदि आपके पैसे बचते होंगे तो उनके बराबर के सिक्के भी एक दूसरे खाने में आ जायेंगे। यानी दोनों तरफ से बेईमानी की कोई संभावना नहीं। मुझे इन मशीनों को देखकर बड़ा मजा आया।
यद्यपि हमें 7.50 पर नीचे बुलाया गया था, परन्तु मैं 7.30 बजे ही वहाँ पहुँच गया। तब तक कोई नहीं आया था। मैं इधर-उधर घूमने चला गया। जब लगभग 7.45 पर लौटा, तो देखा कि एक सज्जन एक किनारे पर खड़े अपने बैग में कुछ ढूँढ़ रहे थे। उनके बैग पर अंग्रेजी में "CICC Welcomes" का कागज लगा हुआ था। इससे मैं समझ गया कि आप ही श्री युसूके हिरानो हैं। आप देखने में 45 वर्ष के लगते हैं, साधारण डील-डौल, एक कन्धा कुछ झुका हुआ, साधारण ढंग से पहना हुआ ढीला-ढाला सूट। उस समय उन्हें देखकर मेरे ऊपर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु कहावत है कि महान व्यक्ति देखने में साधारण लगते हैं। यह कहावत श्री हिरानो पर पूरी तरह सही उतरती है। मैं जानता था कि श्री हिरानो की ही सक्रियता और कृपा से मैं जापान आने में सफल हुआ हूँ, वरना एअर इंडिया वालों ने तो मेरा पत्ता काटने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी।
मैंने बड़ी श्रद्धा से उन्हें नमस्कार किया, हाथ मिलाया और बताया कि मैं विजय कुमार हूँ। साथ ही इशारे से यह भी बता दिया कि मैं सुनने में असमर्थ हूँ। थोड़ी देर में पाँच लोग और आ गये। एक श्री तलत महबूब बट्ट (पाकिस्तान), दूसरे श्री लुकमिन लियान्टो (इंडोनेशिया), तीसरे श्री गोंजालेज (मैक्सिको), चौथे श्री ढुंगलस एस.एल. तुंग (हांगकांग) तथा पाँचवे श्री एन. बेन लिम (सिंगापुर)। छठा मैं था।
इनमें से पहले तीन लोग सी.आई.सी.सी.में 6-6 महीने की ट्रेनिंग ले चुके थे। उन्होंने अपने लेखों में यह बताया था कि वे सी.आई.सी.सी. से प्राप्त ज्ञान और अनुभव का उपयोग अपने यहाँ कैसे कर रहे हैं। शेष तीन व्यक्ति नये थे। इनमें से मेरे अलावा दोनों ने अपने लेखों में यह बताया था कि वे अपने-अपने स्थान पर क्या कर रहे हैं। केवल मैंने ही अपने लेख में लिखा था कि हमारे देश में कम्प्यूटरों का प्रसार किस प्रकार किया जा सकता है।
हम सबका एक दूसरे से परिचय हुआ। विजिटिंग कार्डों का आदान-प्रदान हुआ। मैंने अपने साथ जो विजिटिंग कार्ड रख लिये थे, वे यहाँ बहुत काम आये। कार्ड कुछ कम पड़ गये, मुझे उम्मीद नहीं थी कि कार्डों का आदान-प्रदान इस प्रकार भी होता है। कारण यह है कि मैं लम्बे समय से सी.एस.आई. (कम्प्यूटर सोसाइटी आफ इंडिया) के सम्मेलनों में भाग लेने नहीं जा सका हूँ। ऐसा न करके मैंने अपना बहुत नुकसान कर लिया है। आगे हर साल इस सम्मेलन में भाग लेने की कोशिश करूँगा और इसका पूरा फायदा उठाया करूँगा।
सबके आ जाने के बाद हम चले। हमें डाटा शो देखने जाना था, जहाँ के लिए सी.आई.सी.सी. की बस तय की गयी थी। बस तक पहुँचने के लिए हमें टैक्सी में ले जाया गया। एक टैक्सी में यों तो 4 लोग बैठ सकते हैं, परन्तु श्री हिरानो ने हमारे कष्ट (?) को ध्यान में रखकर तीन टैक्सियां कीं। चलने से पहले उन्होंने हमें तथा टैक्सी वाले को जगह का नक्शा भी दिया तथा एक टैक्सी में खुद बैठे। यहाँ टोकियो की सड़कें बनावट तथा उलझनपूर्ण होने में बनारस की गलियों से टक्कर लेती हैं। अतः नक्शा हाथ में रहने पर भी एक टैक्सी वाला रास्ता भूल ही गया। करीब 10 मिनट इन्तजार करने पर वे हमें मिले।
वहाँ हमें सी.आई.सी.सी. की बस भी मिल गयी। उसमें बड़े आराम से हम बैठे और आगे चले। बस ने हमें वहाँ उतारा जहाँ ‘डाटा शो’ नामक प्रदर्शनी लगी थी। उस दिन प्रदर्शनी का उद्घाटन था, जो 10 बजे होना था और हम जरा जल्दी पहुँच गये थे। तब तक हम एक खुले रेस्तराँ में बैठे और हमसे कहा गया कि हम पास की मशीनों से अपनी पसन्द का पेय ले लें। मशीनों के लिए सिक्के वे खुद दे रहे थे। मैंने पानी माँगा, तो उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे कोई चिड़ियाघर का जानवर हो। परन्तु श्री हिरानो की महानता थी कि वे न जाने कहाँ से एक गिलास पानी ले आये, जिसे पीकर मैंने अपनी प्यास बुझायी।
यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि जापान में और सब चीजें मिलना आसान है, परन्तु पीने का पानी मिलना ही सबसे ज्यादा मुश्किल है। वास्तव में वे पानी को पीने लायक चीज मानते ही नहीं, उसके लिए कोकाकोला है, तरह-तरह की काॅफी हैं और जाने कितने तरह की शराब है, जो सब मशीनें बेचती हैं। इसलिए यहाँ पानी माँगना किसी अपराध से कम नहीं। वैसे यहाँ की चकाचौंध को देखकर बड़े-बड़े धुरन्धर पानी माँग जाते हैं, मेरे जैसे साधारण देहाती की क्या बिसात? इसलिए मैंने आगे यह नियम बनाया कि कमरे में से निकलने से पहले ही दो गिलास पानी पीकर चला करूँगा। बीच में पानी मिल गया तो ठीक, नहीं तो लेमन सोडा या कोकाकोला ही सही। कुछ रेस्तराँ ऐसे हैं जो पानी दे देते हैं, यदि उनकी समझ में आ जाये कि आपको पानी चाहिए। Water (वाटर) शब्द यहाँ बहुत कम लोग समझ पाते हैं। जापानी में पानी से Miejo कहते हैं जिसका उच्चारण मिज्जो या मिउजो जैसा होता है।
ठीक दस बजे प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ। फीता काटा गया और सैकड़ों हजारों गुब्बारे उड़ाये गये। मजे की बात यह है कि सब गुब्बारे उड़ने से पहले इस तरह बांधे गये थे कि उनकी शक्ल भी एक बड़े गुब्बारे जैसी थी। वैसे उद्घाटन में उतना भी समय नहीं लगा, जितनी देर तक तालियां बजी थीं, क्योंकि कोई भाषण नहीं हुआ।
प्रदर्शनी 5 बड़े-बड़े हाॅलों में लगी थी। हम घुसे तो एक साथ थे, परन्तु भीतर जाकर भीड़ की वजह से अलग-अलग हो गये। हमसे कहा गया था कि ठीक 11.50 पर बाहर आ जाना। मैंने सभी हाॅल घूम-घूमकर देखे, क्योंकि पूरे 2 घंटे का समय मेरे पास था। फिर भी वहाँ इतनी कम्पनियां आयीं थी कि सबको ध्यान से देखने का समय बिल्कुल नहीं था।
भीतर का दृश्य ज्यादातर कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया की वार्षिक प्रदर्शनियों जैसा ही था। वैसे अन्तर भी थे। सबसे बड़ा अन्तर तो यह था कि यहाँ 99 प्रतिशत जापानी का प्रयोग किया जाता है। हालांकि मूल कम्प्यूटर हार्डवेयर तथा साॅफ्टवेयर अंग्रेजी के ही हैं। परन्तु डाटा प्रोसेसिंग पूरी तरह जापानी में होता है तथा प्रोग्रामिंग भाषाओं में भी जापानी का प्रयोग खुलकर किया जाता है। काश हमारे यहाँ भी हिन्दी का प्रयोग इतना हो पाता। मुझे वहाँ अंग्रेजी में छपे पैम्फलेट वगैरह प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई होती थी। दो-चार कम्पनियों के पास ही अंग्रेजी के पैम्फलेट थे, जो माँगने पर मिल जाते थे। अनेक जगह हमें बढ़िया प्लास्टिक के बैग उपहार में दिये गये। दो जगह पेन भेंट में मिले तथा एक ने मेरे विजिटिंग कार्ड पर प्लास्टिक का कवर चढ़ाया। एक जगह रंगीन चित्रों की फोटो कापी हो रही थी। मुझे अफसोस हुआ कि उस समय मेरे पास कोई फोटो नहीं था, नहीं तो मैं उसकी कापी करा लेता।
एक दूसरा फर्क मैंने यह नोट किया कि प्रत्येक कम्पनी के पंडाल पर दो-तीन अति सुन्दर लिपी-पुती जापानी लड़कियाँ माइक पर कमेन्टरी दे रही थीं (जापानी भाषा में)। कोई सुन रहा हो या न सुन रहा हो, उन्हें अपनी बात कहे जाना था। ऐसा प्रायः हमारे यहाँ नहीं होता। मैं कई वर्षों से कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया के सम्मेलनों में नहीं गया हूँ, इसलिए अगर वहाँ होता हो, तो पता नहीं।
जापान ने इलेक्ट्रानिक और कम्प्यूटर के क्षेत्र में जो भयंकर प्रगति की है उसकी एक झलक हमें यहाँ मिल गयी। हर तरह की नयी तकनीक यहाँ प्रदर्शित की गई थी, केवल उनको छोड़कर जिनमें शोध चल रहा था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल

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