आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 4)

21 अक्तूबर 1990
जब मेरी नींद खुली तो उस समय तक सब सो रहे थे। मैंने जरा खिड़की का पर्दा सरकाया, तो तेज धूप अन्दर आयी। एक-दो लोग चौंक गये तथा आपत्ति की, इसलिए मैंने तुरन्त पर्दा वापस सरका दिया। इतनी देर में ही मैं देख चुका था कि सवेरा हो गया है और वहाँ के हिसाब से 7 बजे होंगे। मुझे ऐसा लगा कि हमारा जहाज बर्फ के पहाड़ों केे ऊपर से उड़ रहा है। फिर मैंने सोचा कि यहाँ बर्फ कहाँ से आयी? मैंने अनुमान लगाया कि ये बादल होंगे। बाद में मेरा अनुमान सही निकला, क्योंकि बोइंग 747 विमान हमेशा बादलों से ऊपर उड़ता है। खिड़की में से धूप इसलिए आयी थी कि हमारा जहाज ठीक उत्तर की ओर उड़ रहा था और मेरी खिड़की पूर्व की ओर थी। हम ओसाका हवाई अड्डे की ओर जा रहे थे।
रास्ते में हमें एक फाॅर्म भरने को दिया गया, जो हमारे स्वास्थ्य के बारे में था। करीब 11.15 बजे (जापानी समय पर) हम ओसाका में उतरे। मुझे वहाँ उतरना नहीं था, अतः निश्चिंत बैठा था। तभी एक सज्जन मेरा नाम पूछते हुए पधारे। वे सीधे मेरी सीट पर आये और इशारे से पूछा कि क्या मैं ही सुनने में असमर्थ हूँ? मैं समझ गया कि ये श्री हिरानो के निर्देश पर पधारे हैं। मैंने तुरन्त उठकर उनसे हाथ मिलाया। उन्होंने मुझे कुछ औपचारिकताओं के लिए एक सुन्दर लड़की कु. रिसूको तनाका के साथ कर दिया, जो जापान एअर लाइन्स में प्रशिक्षण ले रही थीं। वे मेरा स्वास्थ्य का फार्म लेकर आगे-आगे चलने लगीं और औपचारिकताएँ पूरी करा दीं।
मैं उन दिनों अपने पेट के इलाज के लिए आयुर्वेदिक दवा खा रहा था, जो पुड़ियों में थी और उसको शहद के साथ लेता था। इसलिए मैं दवा की पुड़िया और शहद की शीशी साथ ले गया था। उन्होंने उस दवा की कई बार सूँघ-सूँघकर जाँच की कि कहीं ये नशे की पुड़िया तो नहीं हैं। मेरे बताने पर कि यह आयुर्वेदिक दवा है और इस शीशी में शहद है, जिसके साथ यह दवा ली जाती है, उन्हें बड़ी मुश्किल से विश्वास हुआ।
कु. तनाका अंग्रेजी बहुत कम जानती थीं, इसलिए मुझे एक-एक शब्द धीरे से बोलना पड़ता था। उन्होंने मुझे बाहर बैठाया और कहा कि अभी आपकी उड़ान होगी तब बुला लेंगे। मैंने पानी पीने की इच्छा जतायी। उन्होंने देखकर कहा कि साॅरी यहाँ पीने का पानी नहीं है। मुझे आश्चर्य तो बहुत हुआ, परन्तु सोचा कि हो सकता है यहाँ भी नल चला गया हो, जैसे हमारे यहाँ चला जाता है। फिर वे कहने लगीं कि अब मैं जाऊँगी। मैंने पूछा क्या आप मेरी उड़ान से पहले फिर लौटेंगी। उन्होंने कहा कि ‘नहीं’। तब मैंने उन्हें सहायता के लिए धन्यवाद देकर विदा किया।
लगभग 11.45 बजे हम फिर वहाँ से उड़े और लगभग 1.30 बजे दोपहर बाद नारीता हवाई अड्डे पर उतरे। वहाँ कस्टम से सुलटने में थोड़ा समय लगा और अपना सामान लेकर बाहर आया। वहीं मैंने अपने 100 डालरों को येन में बदलवाया जिनसे मुझे लगभग 12000 येन मिले।
श्री हिरानो के निर्देशों के अनुसार मुझे वहाँ से बस में टोकियो सिटी एअर टर्मिनल जाना था। 2500 येन में टिकट मिली। मेरी बस का समय 2.10 था। वहाँ (यानी गेट नं. 1 पर) 2.00 बजे वाली बस खड़ी थी। मैंने उसमें चढ़ना चाहा तो कन्डक्टर ने बताया कि 2.10 वाली बस में आना। मैंने ऐसा ही किया मजे में जाकर बस में बैठ गया। यहाँ की बसें बहुत आरामदेह हैं। थोड़ी मँहगी हैं, परन्तु ज्यादा नहीं। किराया था 2500 येन यानी हमारे हिसाब से लगभग 350 रुपये।
मजेदार बात यह रही कि हमारी बस लगभग 70 कि.मी. प्रति घंटा की चाल से लगातार चलती रही। उसे केवल एक या दो बार चुंगी देने के लिए रुकना पड़ा, जिसमें मुश्किल से 10 सेकेंड लगे होंगे। बीच में न तो कोई लाल बत्ती पड़ी और न कहीं स्टाप पड़ा। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे होता है। रास्ते में ही इसका रहस्य मुझे ज्ञात हो गया। बात यह है कि जैसे हमारे यहाँ जलेबी की धार एक के ऊपर एक डाली जाती है, उसी तरह यहाँ सड़क के ऊपर सड़क बनायी जाती है। यानी एक के ऊपर एक तीन सड़कें। तिमंजिला मकान तो बहुत देखे थे, परन्तु तिमंजिला सड़क पहली बार देखने को मिली। जरा सा मुड़ने के लिए चाहे कितना भी चक्कर काटना पड़े पर सड़कें ऐसी ही बनती हैं। तिमंजिला सड़क शहर के बाहर ही नहीं, भीतर भी देखने को मिल जाती हैं।
रास्तों पर काफी सफाई थी। पैदल चलता आदमी बिल्कुल दिखाई नहीं देता था। जापान में शायद कुत्ते-बिल्ली हैं ही नहीं। चिड़िया-कबूतर जैसे पक्षी भी देखने को नहीं मिले। करीब एक घंटे तक चलने के बाद मुझे लगा कि बस किसी बनारस की गली में घुसी है। ध्यान से देखा तो वह बनारस नहीं, बल्कि टोकियो का सिटी एअर टर्मीनल था, जहाँ मुझे जाना था। मैं उतरा और टैक्सी की तलाश करने लगा। जहाँ से टैक्सी ली जाती है, वह जगह मुझे आसानी से मिल गयी। यहाँ से मेरा होटल जहाँ मेरे ठहरने का प्रबन्ध किया गया था मुश्किल से 10 कि.मी. है, परन्तु टैक्सी इतनी महँगी है कि इतनी सी दूरी के लिए टैक्सी का किराया था 2760 येन अर्थात् लगभग 400 रुपये। सौभाग्य से ये रुपये मुझे नहीं देने थे।
वह टैक्सी वाला भी एक ही गधा था। उसने मुझे उसे होटल के दूसरे किनारे पर उतारा, जहाँ से मुख्य काउन्टर तक मुझे पूछ-पूछकर आना पड़ा। कमरा मुझे आसानी से मिल गया, क्योंकि वह पहले से ही मेरे नाम बुक था, परन्तु मुझे आश्चर्य यह था कि श्री हिरानो की ओर से कोई व्यक्ति वहाँ नहीं था। मैंने होटल वाली लड़की से कहा कि उन्हें फोन पर बता दो कि मैं आ गया हूँ। उसको अपनी बात समझाने में काफी मुश्किल हुई। यहाँ के बहुत कम लोग अंग्रेजी जानते हैं, वह भी मामूली और उन्हें अपनी बात समझाना टेढ़ी खीर है, क्योंकि हमारा और उनका अंग्रेजी उच्चारण बहुत अलग होता है। एक बार श्री हिरानो ने मुझसे कहा भी था कि तुम्हारी अंग्रेजी बहुत स्थानीयकृत (Localised) है। किसी तरह श्री हिरानो को सूचना दे दी गयी और मैं अपने कमरे में आया।
सबसे पहले तो मैंने अपने कपड़े बदले, नहाया और फिर दो घंटे सोया। करीब शाम को 6.00 बजे मुझे भूख लगी, तो मैं बाहर गया। वहाँ मुझे कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जो शाकाहारी हो तथा जिसे खाकर मैं अपनी भूख मिटा सकूँ। मजबूरन मैंने 180 येन में काॅफी वाली 3 डबल रोटियां लीं, जो उस दुकानदार लड़की ने बहुत अच्छी तरह पैक करके दीं। 180 येन लगभग 25 रुपये के बराबर होते हैं। हमारे देश के हिसाब से यह बहुत ज्यादा है। परन्तु यहाँ के हिसाब से सस्ती है, क्योंकि यहाँ 100 येन (लगभग 14 रुपये) से नीचे कोई बात ही नहीं करता।
डबल रोटी लेकर मैं एक चाय-काॅफी की दुकान पर आया। मैंने एक कप चाय ली। जिसकी कीमत थी 257 येन (टैक्स मिलाकर) यानी हमारे हिसाब से 36 रुपये मात्र। खैर चाय-डबलरोटी से मैंने अपनी भूख शान्त की। उसी समय मैंने तय किया कि कम-से-कम अपना नाश्ता मैं लड्डू-मठरी से किया करूंगा, जो कि श्रीमतीजी की मम्मीजी ने मना करते-करते रख दिये थे। ये यहाँ बड़े काम आये।
रात कौ इतना सा खाना खाकर मैं थोड़ा इधर-उधर घूमा और कहीं रास्ता भूल न जाऊँ इस डर से कमरे में आकर सो गया। उस समय लगभग 8 बजे थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल

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