आत्मकथा भाग-2 अंश-39
परिशिष्ठ ‘ख’ में मैं लिख चुका हूँ कि दो दिन बाद की अगली फ्लाइट मुझे आसानी से मिल गयी थी और मैं आराम से दिल्ली के पालम हवाईअड़डे पर उतर गया था। उस समय रात के 12 बजे थे। मेरे पास टैक्स देने लायक कोई वस्तु नहीं थी, इसलिए मैं आराम से ग्रीन चैनल से निकल आया।
यहाँ मैंने एक बहुत बड़ी भूल कर दी। मुझे यह कल्पना नहीं थी कि मेरे घरवाले और ससुरालवाले मेरे लिए कितने परेशान हो रहे होंगे। मुझे सबसे पहले दिल्ली पहुँचते ही या सुबह ही आगरा फोन करा देना चाहिए था कि मैं यहाँ सुरक्षित पहुँच गया हूँ और जल्दी ही आगरा पहुँच जाऊँगा। परन्तु यह फोन कराने की बात मेरे दिमाग में नहीं आयी। मुझे चिन्ता तो अपने डालरों को रुपयों में बदलवाने की थी। अतः मैं सुबह होते ही सिटी बस से सबसे पहले अशोका होटल गया और वहाँ डालर देकर रुपये प्राप्त किये। वहाँ से मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन गया। मेरा विचार था कि कोई न कोई गाड़ी आगरा की तरफ जा ही रही होगी, मैं उसमें चढ़कर 2-3 घंटे में आगरा पहुँच जाऊँगा।
लेकिन यहाँ मैं बहुत बड़ी भूल पर था, क्योंकि उन दिनों अयोध्या में कारसेवा होने वाली थी और उ.प्र. की मुलायम सिंह सरकार ने चारों ओर से प्रदेश की नाकेबंदी कर दी थी, ताकि श्रीराम जन्मभूमि परिसर अयोध्या में ‘कोई परिन्दा भी पर न मार सके।’ वैसे मुझे जापान में ही अखबारों से पता चल गया था कि श्री लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने रोककर उनको गिरफ्तार कर लिया है और उसके जवाब में भाजपा ने तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। लेकिन यहीं आकर पता चला कि स्थिति कितनी भयावह थी। सारी रेलगाड़ियाँ रद्द कर दी गयी थीं और अन्तर्राज्यीय बस सेवाएँ भी रोक दी गयी थीं, ताकि कोई कारसेवक उत्तर प्रदेश में न घुस सके।
मजबूर होकर मैं एक ऑटो से मथुरा रोड पर स्थित हरिनगर आश्रम बस स्टाॅप पर पहुँचा। मेरा विचार था कि वहाँ से मथुरा-आगरा की तरफ जाने वाली कोई न कोई बस मिल ही जाएगी। उस दिन तब तक मैंने कुछ भी खाया नहीं था, इसलिए उसी स्टाॅप से कुछ केले लेकर खाये।
वहाँ खड़े हुए एक सज्जन ने बताया कि मथुरा-आगरा की तरफ जाने वाली बसें केवल यू.पी. बाॅर्डर तक जा रही हैं। वहाँ से पैदल बाॅर्डर पार करके मैं मथुरा की तरफ जा सकता हूँ। मैंने सोचा कि यही सही, अतः जो पहली बस वहाँ आयी, मैं उसी में चढ़ गया। भारी भीड़ के कारण मुझे खड़े-खड़े जाना पड़ा। मेरे पास 2 अटैची और एक बैग था, उनको किसी तरह बस में रख लिया। खड़े-खड़े 2 घंटे की बस यात्रा के बाद मैं यू.पी. बाॅर्डर पर उतरा। वहाँ से सारा सामान हाथों में लटकाकर मैंने बाॅर्डर पार की। लगभग 400 मीटर मुझे सारे सामान के साथ पैदल चलना पड़ा।
सौभाग्य से तभी एक ट्रैक्टर-ट्राॅली कोसी की तरफ जाती हुई मिल गयी। शायद वह सवारियाँ ही ढो रही थी। मैं उसमें चढ़ गया और 15-20 मिनट में उसने हमें कोसी पहुँचा दिया। कोसी में मुझे 10-15 मिनट में ही मथुरा जाने वाली बस मिल गयी। उसमें बैठकर मैं डेढ़ घंटे बाद मथुरा के नेपाल होटल वाले नये बस अड्डे पर पहुँच गया। वहाँ आगरा जाने वाली एक बस तैयार खड़ी मिली। मैं उसमें भी चढ़ गया और उसके लगभग डेढ़ घंटे बाद अपने घर के पास देहली गेट आगरा के स्टाॅप पर उतर गया। उस समय शाम के 5 बजे थे। वहाँ से मैं रिक्शे में घर पहुँचा।
उस समय हमारे घर पर हालत बहुत खराब थी। सभी लोग मेरे न लौटने और कोई समाचार भी न मिलने के कारण परेशान थे। श्रीमतीजी एक बार रो-धोकर अपने मायके राजामंडी जा चुकी थीं और वहाँ पर दिल्ली जाकर मुझे खोजने की योजनाएँ बनायी जा रही थीं। जब मैं अपने घर पहुँचा, तो मम्मी ने रोते हुए मुझे गले लगाया। फिर उन्होंने तत्काल ही राजामंडी फोन किया कि मैं पहुँच गया हूँ, तब सबकी जान में जान आयी। सायंकाल मुझे ससुराल जाने का आदेश मिला और मैं वहाँ गया। उस समय तक मैं शारीरिक और मानसिक रूप से इतना थक गया था कि खाना खाकर रातभर बेसुध पड़ा सोता रहा।
इसके बाद मुझे 15 दिन और आगरा में ही रुकना पड़ा, क्योंकि अयोध्या आन्दोलन के कारण कर्फ्यू लगा हुआ था और रेलों का आवागमन अनिश्चित था। स्थिति सामान्य होने पर ही मैं परिवार के साथ वाराणसी जा सका।
बता दूँ कि मेरे जापान से लौटने के कुछ दिन बाद ही वी.पी. सिंह की सरकार गिर गयी थी और उसके कुछ दिन बाद कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चन्द्रशेखर की सरकार बनी। यह सरकार भी मात्र 6 माह चली और चुनाव घोषित हो गये। वह चुनाव चार चरणों में होना था और दो चरण हो चुके थे, जिनमें भारतीय जनता पार्टी की हालत बहुत अच्छी बतायी गयी थी। तभी दुर्भाग्य से चुनाव प्रचार करते समय राजीव गाँधी की हत्या तमिल आतंकवादियों ने कर दी। इस हत्या से चुनाव का माहौल ही बदल गया। अगले चरणों में जो चुनाव हुए, उनमें हवा कांग्रेस के पक्ष में बहने लगी। जब परिणाम निकले तो कांग्रेस बहुमत से दूर रहकर भी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि के सांसदों को खरीदकर कांग्रेस के नरसिंह राव ने बहुमत पूरा कर लिया और अपनी सरकार बना ली थी। मैं इन घटनाओं को बहुत रुचि के साथ पढ़ा करता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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