आत्मकथा भाग-2 अंश-38

उन्हीं दिनों मुझे एक अन्तर्राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार लेने हेतु जापान यात्रा का आमंत्रण मिला। मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। मैंने सोचा कि मेरी होने वाली सन्तान मेरे लिए सौभाग्य और सफलताएँ लेकर आ रही है। इसके लिए मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और उसमें मेरा विश्वास पुष्ट हो गया।
प्रसव की संभावित तारीख से दो दिन पहले ही हमने श्रीमती जी को डाॅ. जमीला दाऊद के नर्सिंग होम में भर्ती करा दिया था। मम्मी और सुनीता उनके साथ थीं। मैं उन दिनों कार्यालय भी जा रहा था और जापान यात्रा के लिए आवश्यक व्यवस्था (फोन, टेलेक्स आदि) भी कर रहा था। इसलिए नर्सिंग होम में अधिक समय नहीं दे पा रहा था। जिस दिन उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हुई उस दिन प्रातः मैं अस्पताल में ही था। श्रीमतीजी को कष्ट सहन नहीं हो रहा था। डाक्टर साहिबा ने उनका कष्ट देखकर कह दिया था कि यदि दोपहर 12 बजे तक प्रसव नहीं हुआ तो ऑपरेशन करना पड़ेगा। परन्तु मैंने श्रीमतीजी के सामने ही मम्मी से कह दिया कि ऑपरेशन नहीं कराना है। श्रीमतीजी ने कहा- ‘चाहे मैं मर जाऊँ?’ मैंने कहा- ‘भले ही मर जाओ, पर ऑपरेशन नहीं कराना है।’ मैं जानता था कि डाक्टर लोग मरीजों के घरवालों को डराकर ऑपरेशन कर डालते हैं और अपनी तगड़ी फीस वसूल कर लेते हैं। ऐसा हमारी छोटी भाभीजी के साथ हो चुका था, इसलिए मैं पहले से ही सावधान था।
सौभाग्य से ऑपरेशन की नौबत नहीं आयी और सामान्य प्रसव हुआ। उस समय मैं कार्यालय में था और एक जरूरी टेलेक्स करने बड़े डाकघर जा रहा था। वहाँ से नर्सिंग होम फोन मिलाया, तो काउंटर से किसी ने बताया कि अभी-अभी डिलीवरी हुई है। फौरन मैं श्री अतुल भारती के साथ स्कूटर से भागकर अस्पताल पहुँचा, तो वहाँ मम्मी और सुनीता मिलीं। उनके चेहरे खुशी से दमक रहे थे। इसी से मैं समझ गया कि मुझे पुत्ररत्न प्राप्त हुआ है। मैंने मम्मी के पैर छुए और सुनीता से गले मिला। उस दिन तारीख थी 22 सितम्बर 1990। मैं प्रसव के समय श्रीमतीजी के साथ नहीं था, इसका मुझे अफसोस है। परन्तु मेरे पहुँचने के समय तक भी वे लेबर रूम में ही थीं। थोड़ी देर बाद जब उन्हें बाहर लाया गया, तब मैं गेट पर ही उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने उनके माथे पर हाथ फेरा और मौन शब्दों में आभार व्यक्त किया। ईश्वर को भी मैंने एक बार फिर धन्यवाद दिया, जो सभी पिताओं का पिता अर्थात् परमपिता है। मैं भी एक पुत्र का पिता बनकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा था।
नर्सिंग होमों में नर्सें तथा अन्य कर्मचारी पिता बनने वाले ग्राहकों से तरह-तरह की अपेक्षाएँ करते हैं। यह नर्सिंग होम भी इसका अपवाद नहीं था। उन्हें मम्मी ने किसी तरह संतुष्ट किया। दो-तीन दिन बाद श्रीमती जी को नर्सिंग होम से अवकाश दे दिया गया और हम उन्हें ऑटोरिक्शा में बैठाकर घर ले आये।
पुत्र के नामकरण के दिन हमारे बड़े भाई डाक्टर साहब, भाभीजी, बच्चे तथा बहनोई श्री यतेन्द्र जी, बहिन गीता तथा उनकी बच्ची रिम्मी तथा श्रीमती जी के भाई आलोक और बहिन गुड़िया ये सब आये थे। मैं आर्यसमाजी पद्धति से नामकरण संस्कार कराना चाहता था, परन्तु कोई आर्यसमाजी पंडित उपलब्ध न होने के कारण सनातनी पंडितजी को बुला लिया। उन्होंने जैसे-तैसे हवन कराया और उसकी राशि ‘तुला’ निकालकर ‘राहुल’ नामकरण किया। लेकिन यह नाम हमें पसन्द नहीं आया, इसलिए हमने काफी सोचकर उसका नाम ‘दीपांक’ रखा।
उसके कुछ दिनों बाद दीपावली थी। हमें दीपावली पर आगरा जाना ही था और मुझे जापान यात्रा की टिकट और वीजा आदि लेने दिल्ली जाना था, इसलिए सभी लोग दीपावली से दो-तीन दिन पूर्व आगरा चले गये। मैं टिकट की व्यवस्था करने के लिए टूंडला से सीधा दिल्ली चला गया। वहाँ कितनी मुश्किल से टिकट मिला, यह एक लम्बी कहानी है। इसे मैं अलग से परिशिष्ट ‘ख’ में दे रहा हूँ।
दीपावली के दो-तीन दिन बाद ही मुझे जापान जाना था। उस यात्रा का पूर्ण विवरण भी उसी परिशिष्ट में दिया है। जापान से लौटने वाले दिन सड़क पर जाम के कारण मेरी उड़ान छूट गयी थी। अगली उड़ान 2 दिन बाद थी। वे 48 घंटे मैंने जापान के नारीता एयरपोर्ट पर बैठे हुए किस प्रकार बिताये, यह पूरा विवरण भी उसी परिशिष्ट में दिया है। कल से यहाँ मैं अपनी जापान यात्रा का विवरण लगाऊँगा। यह यात्रा मेरी जिन्दगी का एक बहुत अहम भाग है, इसलिए इसे छोड़ा नहीं जा सकता।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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