आत्मकथा भाग-2 अंश-37
गोरखपुर स्टेशन पर पहुँचकर हमने आम बाजार में स्थित ‘आरोग्य मंदिर’ के लिए रिक्शा किया और इस प्रकार दोपहर बाद लगभग 3 बजे आरोग्य मंदिर पहुँच गये। वहाँ सबसे पहले हमें डा. रहमान मिले। उन्हें अपना हाल बताकर चिकित्सा पुस्तिका बनवायी तथा भोजन आदि के निर्देश प्राप्त किये। हमारे पास जो रुपये थे, उनमें से थोड़े से रुपये हमने अपने पास रखकर शेष सभी रुपये कार्यालय में जमा कर दिये। कार्यालय प्रमुख श्री राम बालक त्रिपाठी बहुत सहयोगात्मक और सज्जन थे। हमें पास-पास चार-चार सीटों वाले कमरों में एक-एक सीट दी गयी, क्योंकि दो सीटों वाला कमरा लेना हमारी आर्थिक स्थिति के अनुसार सम्भव नहीं था, हालांकि अधिकांश खर्च बैंक से मिल सकता था।
अगले दिन हमारी चिकित्सा प्रारम्भ हुई। डा. विट्ठल दास जी मोदी ने हमें विश्वास दिलाया था कि धैर्यपूर्वक चिकित्सा करने से लाभ अवश्य होगा। मैं पूरे मनोयोग से चिकित्सा करा रहा था और डाक्टर साहब के सभी निर्देशों का पूरी तरह पालन कर रहा था। गर्भावस्था के बावजूद श्रीमती जी की चिकित्सा भी ठीक चल रही थी। वहाँ का भोजन बहुत सादा होता था। उबली हुई बिना मिर्च मसाले की सब्जी, मोटी रोटी, फीका दलिया आदि। सलाद अपना ले जाना होता था। किसी-किसी को घी लेने की इजाजत थी। हर चीज वहाँ कूपनों से मिलती थी और डाक्टर साहब की आज्ञा के अनुसार उचित मात्रा में ही खायी जा सकती थी।
भोजन सादा होने के बावजूद बहुत स्वादिष्ट लगता था और सुपाच्य इतना होता था कि खाने के 2-3 घंटे बाद ही भूख लग आती थी। भोजन का समय होने तक तो बहुत कड़ी भूख लग आती थी। भोजन दोपहर को 12 बजे और सायंकाल 7 बजे दिया जाता था। इसके अलावा नाश्ते में रोग के अनुसार दूध, मठा, सेब, नाशपाती, किशमिश, मुनक्का आदि लेने की इजाजत मिलती थी। दोपहर बाद तीन-साढ़े तीन बजे गाजर का एक गिलास जूस दिया जाता था।
हम वहाँ कम से कम दो माह रहने का विचार बनाकर आये थे। परन्तु हमारे दुर्भाग्य से उस समय आरोग्य मंदिर में कुछ ऐसे लोग अपनी चिकित्सा कराने आये हुए थे, जिन्हें प्राकृतिक चिकित्सा में कोई विश्वास नहीं था। ऐसे लोग अन्य सभी पद्धतियों से अपनी चिकित्सा करा चुके होते हैं और कहीं भी लाभ न होने पर ‘चलो इसको भी आजमा लेते हैं’ की मुद्रा में किसी के कहने पर प्राकृतिक चिकित्सा कराने आ जाते हैं। वे यह उम्मीद भी करते हैं कि यहाँ उनका रोग जादू से दूर हो जाएगा। हालांकि वे वर्षों तक अन्य पद्धतियों से अपना इलाज कराकर हजारों रुपये बर्बाद कर चुके होते हैं, परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा के लिए एक-दो माह भी धैर्य नहीं रख सकते।
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वहाँ उन्हें लम्बे समय तक अपने घर से दूर रहकर दिनभर विभिन्न क्रियाओं में भाग लेना पड़ता है और योग-व्यायाम के साथ ही सादा भोजन भी करना पड़ता है। वे ऐसा करना नहीं चाहते और ऐसी जादू की गोलियाँ चाहते हैं, जिनको गटक लेने पर उनका रोग चला जाये। स्पष्ट रूप से ऐसी कोई गोलियाँ नहीं होतीं, अगर होतीं तो वे पहले ही उनको गटक लेते और वहाँ आते ही नहीं।
अगर इतना ही होता तो गनीमत थी। सबसे बुरी बात यह थी कि ऐसे लोग अन्य लोगों को भी तरह-तरह की बातें करके हतोत्साहित करते रहते थे। ऐसे लोग वहाँ कई थे और प्रायः रोज ही एक-दो लोगों से मेरी इस मामले पर बहस हो जाती थी। ऊपर से हमारी श्रीमतीजी गर्भवती थीं, इसलिए उन्हें प्रायः प्रतिदिन ही यह सलाह मिलती थी कि वे चिकित्सा छोड़कर घर जाकर आराम करें। इसके परिणामस्वरूप श्रीमतीजी रोज ही वापस जाने की जिद करने लगीं। बड़ी मुश्किल से मैं इस जिद को टाल रहा था। तभी आगरा से उनकी मम्मी का पत्र आ गया कि वहाँ एकदम काली पड़ जाएगी, यह हो जाएगा, वह हो जाएगा आदि।
इसके बाद तो श्रीमतीजी को वहाँ रोकना लगभग असम्भव ही हो गया। अतः मैंने तंग आकर लौटने का निश्चय कर लिया। एक बार तो मैंने यह भी सोचा कि श्रीमतीजी को अकेले ही आगरा भेज दूँ और मैं यहाँ चिकित्सा कराता रहूँ। परन्तु वे अकेले इतनी दूर जाने को तैयार नहीं थीं और मैं भी खतरा लेना नहीं चाहता था, इसलिए दोनों को लौटना पड़ा। तब तक हमें आरोग्य मंदिर में केवल 12 दिन हुए थे। लौटते हुए हमने मन को यह समझा लिया कि मौका मिलने पर हम एक बार फिर आ जायेंगे। किन्तु वह दिन कभी नहीं आया और आरोग्य मंदिर में अपनी पूर्ण चिकित्सा कराने का मेरा अरमान अधूरा ही रह गया और अभी तक अधूरा है।
(पादटीप- दोबारा आरोग्य मंदिर में रहने का अवसर मुझे पूरे 30 साल बाद मिला, जब मैं प्राकृतिक चिकित्सा की पढ़ायी करने और डिग्री लेने के लिए वहाँ दो माह रहा।)
(पादटीप- दोबारा आरोग्य मंदिर में रहने का अवसर मुझे पूरे 30 साल बाद मिला, जब मैं प्राकृतिक चिकित्सा की पढ़ायी करने और डिग्री लेने के लिए वहाँ दो माह रहा।)
जब हम गोरखपुर स्टेशन पर गाड़ी में बैठे हुए थे, तभी वहाँ लखनऊ के एक प्रचारक मा. सत्येन्द्र पाल सिंह बेदी तथा लखनऊ के महानगर कार्यवाह मा. सुरेश चन्द्रा जी के दर्शन हो गये। वे वहाँ ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक पत्रिका का प्रचार करने के लिए आये थे और बाद में वाराणसी भी आने वाले थे। मैंने उन्हें अपना वाराणसी का पता दिया और घर आने का निवेदन किया। इसके दो-तीन दिन बाद वे वाराणसी आये। मैंने उन्हें अपने निवास पर ले जाकर भोजन कराया। फिर वे लखनऊ चले गये। उसके बाद उनके दर्शनों का सौभाग्य नहीं मिला है।
गोरखपुर से लौटने के बाद मैं काफी चिड़चिड़ा हो गया था, क्योंकि मुझे अपना इलाज बीच में ही छूट जाने का बहुत दुःख था। मैं जरा-जरा सी बात पर झल्ला उठता था। इससे श्रीमतीजी परेशान हो जाती थीं। यदा-कदा हमारे बीच झड़प भी होने लगी। मैं उनकी गर्भावस्था के बारे में भी चिन्तित था। बीच-बीच में हम डाक्टर से सलाह लेते रहते थे। वे वाराणसी की प्रसिद्ध महिला चिकित्सिका डाॅ. जमीला दाऊद की सलाह पर चल रही थीं। उन्हें कैल्शियम और आयरन की गोलियाँ तथा कैप्सूल नियमित लेने होते थे। एक बार सोनोग्राफी भी करायी गयी। सब कुछ सामान्य था। उनका प्रसव सितम्बर माह के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना थी। अतः अगस्त में ही मेरी मम्मी, पिताजी और छोटी बहिन सुनीता वहाँ आ गये थे।
जैसे-जैसे श्रीमतीजी के प्रसव का समय निकट आ रहा था, वैसे-वैसे मेरी चिन्ता बढ़ रही थी। यों उन्हें प्रत्यक्ष में कोई कष्ट या शिकायत नहीं थी, परन्तु मन आशंकाओं से घिरा रहता था। कभी-कभी वे बातें भी ऐसी निराशाजनक करती थीं कि मेरी चिन्ता बढ़ जाती थी। फिर भी मैं ईश्वर पर विश्वास करके कार्य ठीक से सम्पन्न हो जाने की आशा करता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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