आत्मकथा भाग-2 अंश-36

मैं पहले लिख चुका हूँ कि आरोग्य मंदिर, गोरखपुर में अपने कानों की प्राकृतिक चिकित्सा कराने की मेरी बहुत इच्छा थी। इसीलिए मैं अपना विवाह कुछ महीने टालना चाहता था, परन्तु हमारी मम्मी इसके लिए राजी नहीं हुईं। विवाह के बाद मेरा विचार बना कि मार्च की लेखाबंदी के बाद मुझे श्रीमती जी के साथ आरोग्य मंदिर जाना चाहिए। बड़ी मुश्किल से श्रीमतीजी तैयार हुईं। तब मैंने आरोग्य मंदिर से पत्र-व्यवहार किया और अपनी पत्नी की गर्भावस्था का भी उल्लेख किया। वहाँ से उत्तर आया कि गर्भावस्था में प्राकृतिक चिकित्सा कराने में कोई कठिनाई नहीं होती है, बल्कि इससे प्रसव सामान्य होने में सहायता मिलती है और बच्चा भी स्वस्थ होता है। यह जवाब आने पर श्रीमती जी चलने को राजी हुईं थीं, हालांकि उनका प्राकृतिक चिकित्सा में बिल्कुल भी विश्वास नहीं था।
(पादटीप- प्राकृतिक चिकित्सा में श्रीमती जी का कोई विश्वास आज भी नहीं है, भले ही अब मैं एक सफल प्राकृतिक चिकित्सक हूँ।)
रामनवमी निकट थी। इसलिए हमने पहले अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन करके वहाँ से एक-दो दिन बाद गोरखपुर जाने का विचार किया। अयोध्या में मेरे गुरुतुल्य श्री विश्वनाथ दास शास्त्री का आश्रम है, इसलिए हमें ठहरने की कोई समस्या नहीं थी। सौभाग्य से हमारे वाराणसी मंडल के सहायक महाप्रबंधक श्री नरेन्द्र कुमार सूद बहुत सज्जन थे। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुझे चिकित्सा के लिए अवकाश दे दिया और छुट्टियों को आगे हिसाब में लगा लेने की भी अनुमति दे दी, क्योंकि चिकित्सा मंें 2-3 माह लगने की संभावना थी और बैंक में केवल एक साल पुरानी नौकरी होने के कारण मेरे पास इतनी छुट्टियाँ नहीं थीं।
अपने साथ आवश्यक धन लेकर हम किसान एक्सप्रेस से अयोध्या पहुँचे। रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद हम जानकी घाट के लिए रिक्शा करना चाहते थे। लेकिन हमें यह अनुमान नहीं था कि रामनवमी पर अयोध्या में इतनी अधिक भीड़ होती है कि मुख्य मार्गों पर रिक्शे, ताँगे तथा अन्य वाहन नहीं चलने दिये जाते। किसी तरह एक रिक्शा 20 रुपये में तय हुआ, जो शहर के बाहरी भागों की जाने किन-किन गलियों में होकर हमें जानकी घाट तक ले गया। वहाँ शास्त्रीजी का आश्रम आसानी से मिल गया। वे हमें देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उन दिनों उनके आश्रम में और भी बहुत से भक्त-यात्री आये हुए थे। इसलिए उन्होंने अपने ही कमरे में हमारे ठहरने की व्यवस्था कर दी। कुछ भोजन हम साथ लाये ही थे, कुछ शास्त्रीजी ने भी भिजवा दिया। उससे तृप्त होकर हम अयोध्या दर्शन के लिए निकल पड़े।
वहाँ हर मंदिर में बहुत भीड़ थी। श्रीराम जन्मभूमि पर हम भीड़ में पिसते हुए बड़ी मुश्किल से दर्शन कर सके। आसपास कुछ और मंदिर भी देखे, जैसे कनक भवन, हनुमान गढ़ी आदि। फिर आश्रम लौटे। दूसरे दिन प्रातः हम सरयू स्नान के लिए गये। वहाँ से सरयू कुछ दूर है, परन्तु हम पैदल ही गये और आये। सरयू में स्नान करके हमें बहुत प्रसन्नता हुई। हालांकि राम की पैड़ी में पानी के आवागमन का उचित प्रबंध न होने के कारण वहाँ के पानी में बदबू आ रही थी, परन्तु सरयू का जल शुद्ध था। अतः वहाँ आनन्दपूर्वक नहा लिये, हालांकि भीड़ वहाँ भी बहुत थी।
उसी दिन दोपहर से पूर्व एक चमत्कारिक घटना हुई। उस समय उसी आश्रम के दूसरे भाग में श्री गया प्रसाद मिश्र रहा करते थे। मेरा उनसे पूर्व परिचय था। वे पहले संघ के प्रचारक थे और योग की शिक्षा दिया करते थे। कुछ वर्ष पूर्व 1983 में प्रयाग में हमारा जो शीत शिविर लगा था, उसमें मैं और वे भी सम्मिलित हुए थे। वहीं मैंने उनसे योग के कुछ आसन और प्राणायाम सीखे थे। हालांकि वे मैं पहले से पुस्तकें पढ़कर जानता था, परन्तु उन्होंने प्रत्यक्ष ज्ञान दिया और अपने सामने कराकर भी देखे थे। बाद में उनकी रुचि योग-ध्यान में अधिक हो गयी, तो वे प्रचारक का दायित्व और संघकार्य छोड़कर हिमालयवासी स्वामी श्याम जी के शिष्य बन गये थे और अयोध्या में रहकर योग-ध्यान किया करते थे तथा जिज्ञासुओं को भी सिखाया करते थे। उन्होंने अपना नाम भी बदलकर ‘चैतन्य’ रख लिया था। स्वामी श्याम जी ने उन्हें डाक्टरेट की उपाधि प्रदान कर दी थी, इसलिए उस समय वे ‘डा. चैतन्य’ के नाम से जाने जाते थे और अब भी उसी नाम से प्रसिद्ध हैं।
मुझे यह ज्ञात नहीं था कि वे उसी आश्रम में रह रहे हैं और उन्हें भी यह पता नहीं था कि मैं उस आश्रम में आया हुआ हूँ। तभी ध्यान करते हुए उन्हें कुछ ऐसी अनुभूति हुई कि आश्रम में उनका कोई पूर्व परिचित ठहरा हुआ है। अतः वे अनायास ही शास्त्रीजी के कमरे की ओर आ निकले। वहाँ मुझे देखते ही उन्होंने पहचान लिया। मैं भी उन्हें वहाँ देखकर आश्चर्य में पड़ गया। फिर श्रीमतीजी से उनका परिचय कराया। वे बहुत प्रसन्न हुए। काफी बातें हुईं। उन्होंने मुझे ध्यान करने की प्रणाली बतायी, हालांकि मैं ज्यादा नहीं समझ पाया। साथ में उन्होंने कुछ किताबें भी दीं।
सायंकाल वे मुझे अपने साथ सरयू किनारे ले गये। उस समय वहाँ पूर्ण शान्ति थी। हमने वहाँ बैठकर काफी देर तक ध्यान किया। फिर लक्ष्मण किला मंदिर में एक सन्त से मिलने गये, जहाँ लड्डू खिलाये गये। वहाँ से हम अँधेरा होने तक वापस आये।
अगले दिन हमें गोरखपुर के लिए प्रस्थान करना था। हमारा विचार था कि अब तक भीड़ छँट गयी होगी तथा बसें चलने लगी होंगी, परन्तु वैसा नहीं हुआ था। पूर्व दिशा की ओर जाने वाला सरयू का पुल वाहनों के लिए बन्द था, उसे केवल पैदल पार किया जा सकता था। यहाँ डा. चैतन्य जी ने हमारी बड़ी सहायता की। वे हमारी एक अटैची लेकर पैदल ही सरयू पुल के पार तक हमारे साथ गये। वहाँ भी बसें उपलब्ध नहीं थीं। अतः हम ताँगे में बैठकर कटरा की ओर चले। वहीं डा. चैतन्य ने हमसे विदा ली। कटरा से हम एक टैम्पो में बैठकर गोंडा रेलवे स्टेशन तक पहुँच गये। उसके थोड़ी देर बाद ही हमें गोरखपुर की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी मिल गयी। हम उसमें बैठकर आराम से गोरखपुर पहुँच गये।
(पादटीप- योगाचार्य डाॅ चैतन्य जी अब भी अयोध्या में ‘विवेक सृष्टि अन्तर्राष्ट्रीय योग संस्थान’ चलाते हैं और साधकों को योग सिखाते हैं। उनके संस्थान से जुड़े हुए योग साधकों की एक बड़ी संख्या है। मेरा उनसे सम्पर्क बना हुआ है, हालांकि दोबारा दर्शनों का सौभाग्य अभी तक नहीं मिला है।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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