आत्मकथा भाग-2 अंश-35
अनन्ता कालोनी, नदेसर, वाराणसी के जिस फ्लैट नं. ए-2/32 में हम रहा करते थे, वह तीसरी मंजिल पर था। उस मंजिल पर एक दूसरे से सटे हुए 4 फ्लैट थे। हमारे बगलवाला फ्लैट उस समय खाली था। बाद में उसमें फिलिप्पीन से लौटे हुए एक सिन्धी सज्जन श्री किशोर शिवदासानी आ गये थे। उनसे अगला फ्लैट एक मुसलमान सज्जन का था, जो पर्यटन विभाग में ड्राइवर थे।
हमारे ठीक सामने वाले फ्लैट में एक अन्य सिन्धी परिवार रहता था। उस परिवार के मुखिया का नाम है श्री मोहन दास पंजाबी। उनके साथ हमारी सबसे अधिक घनिष्टता थी। वे साड़ी के व्यापारी हैं। पहले वे अपने भाई के साथ साझे में व्यापार करते थे, बाद में अलग होकर अकेले करने लगे। उनके दो पुत्र हैं, कोई पुत्री नहीं है। बड़ा पुत्र मनोज (राजू) वाराणसी में ही व्यापार सँभाल रहा है और छोटा पुत्र प्रकाश (पिकी) चीन चला गया है। मनोज की शादी में हम सब कानपुर से वाराणसी जाकर शामिल हुए थे। बहुत अच्छा विवाह हुआ था। उसकी पत्नी वन्दना काफी सुन्दर है। सिंधियों में विवाह के बाद लड़की का नाम बदल देने की परम्परा है, इसलिए उसका नाम ‘रश्मि’ कर दिया है।
(पादटीप- श्री मोहनदास पंजाबी अब विरार (मुम्बई का एक उपनगर) में रहते हैं। उनके दोनों पुत्र चीन में ही रहकर व्यापार करते हैं। जब हम नवी मुम्बई में थे, तो उनसे मिलने की योजना कई बार बनायी, पर बहुत दूर होने के कारण हम विरार नहीं जा पाये। इसका हमें बहुत खेद रहा।)
(पादटीप- श्री मोहनदास पंजाबी अब विरार (मुम्बई का एक उपनगर) में रहते हैं। उनके दोनों पुत्र चीन में ही रहकर व्यापार करते हैं। जब हम नवी मुम्बई में थे, तो उनसे मिलने की योजना कई बार बनायी, पर बहुत दूर होने के कारण हम विरार नहीं जा पाये। इसका हमें बहुत खेद रहा।)
हमसे नीचे के फ्लैटों में भी कई परिवार रहते थे। उनमें से एक श्री अनुरोध कुमार गुप्ता के परिवार से हमारी घनिष्टता थी। उनकी श्रीमतीजी आगरा की ही हैं। वे पहले रेलवे में माल बाबू थे, अब अधिकारी हो गये हैं। वे नीचे के 2 जुड़वाँ फ्लैटों में रहते थे। पीछे वाला फ्लैट प्रायः खाली रहता था, क्योंकि उनका छोटा सा परिवार है- एक लड़का और एक लड़की। वे अब रेलवे से अवकाशप्राप्त कर चुके हैं।
गुप्ताजी के सामने के जुड़वाँ फ्लैट में एक अन्य परिवार रहता था श्री राय साहब का, जो गाजीपुर के रहने वाले हैं। उनके बड़े पुत्र मैरीन इंजीनियर हैं और शिप पर रहते हैं, इसलिए वे साल में 2 माह के लिए आते हैं। उनके छोटे पुत्र श्री सर्वेश उस समय प्रायः बेरोजगार रहते थे, बाद में कोई कार्य करने लगे थे। इस परिवार से हमारी बहुत घनिष्टता तो नहीं थी, परन्तु अच्छा परिचय था।
हमारे फ्लैट के आसपास के फ्लैटों में रहने वाले अधिकांश परिवारों से हमारा सामान्य परिचय था, मगर घनिष्टता केवल एक से थी। वे थे श्री गोपाल लाल पुरोहित, जो राजस्थानी थे और वाराणसी में एक मारवाड़ी सेठ के यहाँ एकांउटेंट थे। वे संघ के काफी कर्मठ कार्यकर्ता थे और हमारे नगर के कार्यवाह भी रहे थे। इसलिए उनसे काफी घनिष्टता हो गयी थी। बाद में वे वाराणसी छोड़कर अपने गृह नगर किशनगढ़ (अजमेर) चले गये थे और अभी वहीं हैं। उनके यहाँ पावरलूम पर कपड़े की बुनाई का कार्य होता है।
जैसा कि प्राइवेट नौकरियों में होता है, गोपाल जी से उनके सेठजी द्वारा जमकर कार्य लिया जाता था। वे सायंकाल देर से लगभग 8 बजे लौटते थे और लौटने के बाद से ही सिरदर्द से पीड़ित रहते थे। रातभर सोने के बाद ही उनका सिरदर्द ठीक होता था। बाद में उनके मूत्र में मवाद भी आने लगा था। इसके लिए ऐलोपैथिक डाक्टरों ने उन्हें ऑपरेशन कराने के लिए कहा था, जिसमें 15-20 हजार रुपये खर्च होने की संभावना थी और 1 माह का समय भी लग जाता। आज की तरह उन दिनों भी मैं ऐलोपैथी चिकित्सा प्रणाली से बहुत घृणा करता था और प्राकृतिक चिकित्सा विधियों द्वारा न केवल स्वयं स्वस्थ रहता था, बल्कि अन्य लोगों को भी सलाह दिया करता था। जो लोग मेरी सलाह पर चलते थे, वे लाभ उठा लेते थे।
जब मुझे गोपाल जी की बीमारी के बारे में पता चला, तो मैंने उन्हें प्राकृतिक चिकित्सा कराने की सलाह दी। मैंने उनसे कहा- ‘आपकी इन दोनों शिकायतों का इलाज है पानी। आपको कम से कम 4-5 लीटर पानी प्रतिदिन पीना चाहिए। यदि आप सुबह जगने से रात्रि में सोने तक हर घंटे पर एक गिलास पानी पीयेंगे, तो दिन भर में 16 गिलास पानी पी लेंगे, जो लगभग 5 लीटर के बराबर होता है। इतने से ही आपकी समस्या हल हो जाएगी। इसमें कोई खर्च भी नहीं होगा और आप ऑपरेशन से बच जायेंगे।’
पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस रोग के लिए डाक्टरों ने ऑपरेशन बताया है, वह केवल पानी से जा सकता है। लेकिन शायद यह सोचकर कि करके देखने में कोई हर्ज नहीं है, उन्होंने मेरी सलाह के अनुसार पानी पीना शुरू कर दिया। लगभग एक सप्ताह तक तो उन्हें कोई अन्तर मालूम नहीं पड़ा, लेकिन फिर उनका सिरदर्द कम होने लगा और 15-20 दिन में ही सिरदर्द बिल्कुल समाप्त हो गया। इससे साथ ही पेशाब में मवाद आने की शिकायत भी कम होने लगी और 1 माह में ही बिल्कुल ठीक हो गयी। गोपाल जी अब पहले से काफी स्वस्थ हो गये थे और उनकी कार्यक्षमता भी बढ़ गयी थी। उसके बाद मेरे सामने उन्हें स्वास्थ्य सम्बंधी कोई शिकायत नहीं हुई। इस अनुभव से मेरा विश्वास भी प्राकृतिक चिकित्सा में और दृढ़ हो गया। मैं स्वयं खूब पानी पीता था और सदा स्वस्थ और सक्रिय रहता था।
वाराणसी में हमारा कोई निकट रिश्तेदार नहीं था। केवल श्रीमती जी की मौसेरी बहिन श्रीमती विमला जी (अब स्वर्गीय) वाराणसी के मैदागिन क्षेत्र में गोलघर मुहल्ले में रहती थीं। उनके यहाँ हम खूब आते-जाते थे। उनका साड़ियों का अच्छा कारोबार था। उनके एक पुत्र है- बंटू और दो पुत्रियाँ हैं- मोनिका और भाव्या। आजकल बंटू व्यापार सँभाल रहा है। मोनिका का विवाह आगरा के एक जैन परिवार में हुआ है। उसके विवाह में शामिल होने केवल मैं वाराणसी से आगरा गया था। जब हम कानपुर आ गये थे, तब बंटू का विवाह हुआ था। उसमें हम सब शामिल हुए थे। उसके विवाह में अच्छी व्यवस्था थी। उसकी पत्नी भी एक घरेलू टाइप की अच्छी और सुन्दर लड़की है। विमला जीजी का पिछले वर्ष (2004 में) कैंसर से देहान्त हो चुका है। उससे कुछ माह पूर्व उनके पति का भी देहान्त हो गया था। उनकी छोटी पुत्री भाव्या का विवाह विमला जीजी के देहान्त के बाद ही हुआ, परन्तु हम उसमें शामिल नहीं हो सके।
इनके अलावा श्रीमती जी के एक चचेरे भाई श्री अमीरचन्द गोयल (उर्फ अमीरो), जो आगरा में ट्रेवल एजेंसी चलाते हैं, प्रायः वाराणसी आया करते थे। उनका वाराणसी में हथुआ पैलेस स्थित पल्लवी इंटरनेशनल होटल में भी एक ऑफिस था। उस ऑफिस में एक मैनेजर, एक ड्राइवर और एक चपरासी नियमित रहते थे। अमीरो भाईसाहब बीच-बीच में वहाँ आते थे और एक होटल में कमरा लेकर रहते थे। बाद में जब हम कानपुर आ गये, तो उन्होंने वाराणसी का कार्यालय बन्द कर दिया।
इन दोनों के अलावा बीड़ी वाले मामाजी श्री श्रीनिवास गोयल, जिनका विस्तृत परिचय मैं भाग-1 में दे चुका हूँ, की एक भानजी भी वाराणसी में ब्याही हैं, जिनका नाम है श्रीमती अंजू अग्रवाल (उर्फ बबली)। उनके पति श्री दिलीप कुमार जैन (उर्फ बच्चा) साड़ी के कमीशन एजेंट हैं। उनके यहाँ भी हमारा आना-जाना था। बाद में बबली की एक छोटी बहिन का विवाह भी वाराणसी में हो गया था, जिसमें हम भी शामिल हुए थे। वाराणसी छोड़ने के बाद हमें उनका कोई समाचार नहीं मिला है।
(पादटीप- श्रीमती अंजू अग्रवाल की पुत्री आकांक्षा एक बार लखनऊ में मेडीकल की प्रवेश परीक्षा देने अपने पिता के साथ आयी थी, उसका सेंटर गोमती नगर में ही विपुल खंड में था। तब हम भी गोमती नगर में ही रहते थे। उसके बाद उनसे हमारी भेंट नहीं हुई है।)
(पादटीप- श्रीमती अंजू अग्रवाल की पुत्री आकांक्षा एक बार लखनऊ में मेडीकल की प्रवेश परीक्षा देने अपने पिता के साथ आयी थी, उसका सेंटर गोमती नगर में ही विपुल खंड में था। तब हम भी गोमती नगर में ही रहते थे। उसके बाद उनसे हमारी भेंट नहीं हुई है।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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