आत्मकथा भाग-2 अंश-34
इसके कुछ दिन बाद ही हमें वाराणसी जाना था। गंगा-यमुना एक्सप्रेस (जो अब फरक्का एक्सप्रेस के नाम के चलती है, परन्तु आगरा से होकर नहीं जाती) में हमारा आरक्षण था। हमारे पास सामान बहुत था। वह गाड़ी हालांकि राजामंडी स्टेशन पर 2 मिनट रुकते हुए जाती थी, लेकिन अधिक सामान होने के कारण हमने आगरा कैंट स्टेशन से उसमें बैठना उचित समझा। वह स्टेशन घर से काफी दूर होने के कारण हमें विदा करने केवल श्रीमती जी के भाई आलोक अपने कुछ मित्रों के साथ पहुँचे थे। हमारे माताजी-पिताजी भी हमारे साथ वाराणसी गये थे।
जब गाड़ी राजामंडी में मेरी ससुराल वाले घर के सामने से निकली, तो हम पहले ही अपने डिब्बे के दरवाजे पर आकर खड़े हो गये थे। उनके घर के बाहर ही हमें अपने तमाम ससुराल वाले खड़े हुए दिखायी पड़े। वहीं से हाथ हिलाकर उन्होंने हमें विदाई दी।
वाराणसी में जो नया फ्लैट मैंने किराये पर लिया था, वह श्रीमतीजी को बहुत पसन्द आया। अगले कुछ दिन घर को जमाने में लगे। उस समय मेरे पास कोई विशेष फर्नीचर आदि नहीं था। केवल दो फोल्डिंग पलंग, एक तख्त और एक साधारण मेज-कुर्सी थी। कुछ दिनों के बाद ही मुझे बैंक से आवश्यक फर्नीचर मिल गया। 2 कमरों का छोटा सा फ्लैट होने के कारण मैंने सीमित फर्नीचर ही लिया था- एक डबल बैड, गद्दे, एक अलमारी, एक ड्रेसिंग टेबल, एक मेज-कुर्सी और एक स्टूल। इससे अधिक फर्नीचर के लिए वहाँ जगह ही नहीं थी। सबसे अधिक आवश्यकता हमें फ्रिज की थी। यह बैंक से मिलता नहीं है। इसलिए मैंने बैंक से उपभोक्ता ऋण लेकर फ्रिज खरीद लिया। इससे श्रीमती जी बहुत खुश हुईं। मनोरंजन के लिए एक काला-सफेद पोर्टेबल टीवी हमारे पास था ही। कुल मिलाकर हमारी समय अच्छा कटने लगा।
लगभग 15 दिन बाद श्रीमती जी के भाई आलोक (अन्नू) अपने मित्र सत्येन्द्र (पप्पू) के साथ उन्हें लेने आ गये। उनके साथ पहले हम वाराणसी घूमे, मंदिर देखे, गंगाजी में नहाये और सारनाथ भी गये। फिर वे वीनू जी को लेकर आगरा चले गये। उनकी गाड़ी मुगलसराय से छूटती थी। मैं उन्हें छोड़ने मुगलसराय जाना चाहता था, परन्तु साले साहब ने मना कर दिया। इसलिए मैंने नदेसर से ही उनको ऑटो में बिठाकर विदा कर दिया।
इसके कुछ दिन बाद मैं अपने माताजी-पिताजी के साथ आगरा वापस आया। उस समय मैं पहले डाक्टर भाईसाहब के घर पर ही गया था। वे उन दिनों बाग फरजाना में एक किराये के मकान में रहते थे, जहाँ से मेरी बहिन गीता का विवाह भी हुआ था। मैं वहाँ पहुँचा तो हमारी भाभीजी ने एकान्त पाते ही मुझे समाचार दिया कि मैं पिता बनने वाला हूँ। मुझे इस समाचार से प्रसन्नता हुई, हालांकि मैं चाहता था कि पहली संतान एक-दो साल बाद हो। परन्तु श्रीमती जी माँ बनने का गौरव जल्दी पाना चाहती थीं, इसलिए ईश्वर ने हमारी इच्छा पूरी की। उसी दिन शाम को जब मैं अपनी ससुराल गया, तो श्रीमती जी ने मुझे यही समाचार सुनाया। जब मैंने बताया कि भाभीजी ने मुझे यह बता दिया है, तो वे थोड़ा मायूस हुईं, क्योंकि वे यह समाचार मुझे सबसे पहले स्वयं सुनाना चाहती थीं।
उस समय ससुराल में मेरी बहुत इज्जत हुई। वैसे भी नये दामाद और पुरानी बहू की इज्जत ज्यादा होती है। उस समय तक घर का भोजन पूर्ण मात्रा में नियमित मिलने और वैवाहिक जीवन के प्रारम्भिक आनन्द के कारण मेरा स्वास्थ्य कुछ सुधर गया था। मेरे पिचके हुए गाल भी कुछ भर गये थे, इसलिए मैं काफी अच्छा लगने लगा था। इससे भी बड़ी बात यह थी कि श्रीमती जी की मम्मी भी स्वस्थ होकर घर आ गयी थीं और घर की हालत ठीक हो गयी थी।
एक सप्ताह बाद हम वाराणसी वापस गये। अब केवल हम दोनों ही वाराणसी में थे और वैवाहिक जीवन का आनन्द उठा रहे थे। उस समय मेरा कुल वेतन लगभग 4 हजार रुपये मासिक था, जिसमें से भविष्य निधि और ऋण आदि की किस्तों की कटौती के बाद मुझे लगभग 2800 रुपये मिल जाते थे। फ्लैट का किराया बैंक देता ही था। हम दोनों के लिए यह पर्याप्त से भी अधिक था। इसलिए हम लगभग 500 रुपये प्रतिमाह बचत कर लेते थे और शेष धन से घर-गृहस्थी की चीजें खरीदते हुए आनन्दपूर्वक अपना समय बिता रहे थे।
पुनः वाराणसी आने के लगभग एक सप्ताह बाद हमें समाचार मिला कि उनके मायके में बेबी का विवाह फरवरी माह में होना तय हुआ है। पहले मैंने समझा कि किसी लड़की की शादी की बात हो रही है, परन्तु बाद में मुझे पता चला कि उनकी बड़ी ताईजी के सबसे छोटे पुत्र श्री अनूप कुमार गोयल का प्यार का नाम ‘बेबी’ है। उन्हीं की शादी फरवरी 1990 में होनी थी। जब तक हम आगरा में थे, तब तक उनके विवाह का कोई संकेत नहीं था, नहीं तो उन्हें वाराणसी आने की आज्ञा नहीं मिलती और बेबी जी का विवाह करके ही आने दिया जाता। वाराणसी से फिर इतनी जल्दी आगरा जाना हमारे लिए सम्भव नहीं था, इसलिए हम इस विवाह में शामिल नहीं हो सके। इसका हमें काफी खेद हुआ।
यहाँ यह बता दूँ कि श्रीमती जी के चचेरे भाइयों की एक बड़ी संख्या है। इनमें से अधिकांश उस समय विवाहित थे और शेष विवाह योग्य थे। वे सभी एक ही परिसर में पास-पास के कमरों या घरों में रहते थे। इसलिए वहाँ हर साल ही एक-दो विवाह होते थे और 2-3 बच्चे भी पैदा होते थे। एक दिन मैंने मजाक में श्रीमती जी से कहा था- ‘तुम्हारे घर में दो-तीन भाभियाँ हमेशा प्रिगनेंट (गर्भवती) रहती ही हैं।’ यह डायलाॅग उन्होंने आगरा में सुनाया, तो इस पर सब लोग खूब हँसे थे।
मार्च में होली थी। हमारा आगरा जाने का विचार नहीं था। इसलिए हमारे बहनोई श्री यतेन्द्र जी, मेरी बहिनों गीता और सुनीता के साथ घूमने वाराणसी आये। हम उनके साथ खूब घूमे। उस समय मेरी भानजी ऋतु (रिम्मी) 4-5 महीने की थी। वह बहुत हँसती थी। उससे मेरा मन खूब लगता था। मैंने गीता से कहा कि इसको यहीं छोड़ दे, मेरा मन लग जाएगा। वह बोली- कुछ महीने और रुक जा, तुझे भी खिलौना मिल जाएगा।
मेरे विवाह के बाद मेरे कम्प्यूटर विभाग के सहयोगी अधिकारी मुझसे विवाह की पार्टी देने को कह रहे थे। मैंने उनसे कहा कि परम्पराओं के अनुसार तो आप सब लोगों को मिलकर हमें पार्टी देनी चाहिए और उल्टे हमसे पार्टी माँग रहे हैं। इस पर वे चुप हो गये। वैसे उनमें से श्री राकेश क्वात्रा और श्री प्रफुल्ल चन्द्र पंडा को छोड़कर सभी ने हमें अलग-अलग अपने-अपने घर भोजन पर बुलाया था और हमने भी उन्हें बुलाया था। उनकी पत्नियों के साथ हमारी श्रीमती जी की अच्छी मित्रता हो गयी थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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