आत्मकथा भाग-2 अंश-32
अब श्रीमतीजी के पूरे परिवार का परिचय देना उचित रहेगा। हमारे ससुराल पक्ष का खानदान आगरा के प्रतिष्ठित परिवारों में से एक है। इनका पुश्तैनी मकान राजामंडी में रेल के फाटक के निकट है। हमारे ससुरजी श्री मोतीलाल जी गोयल तीन भाई थे और उनके चार चचेरे भाई भी थे। इनमें से एक चचेरे भाई श्री स्वरूप चंद जी गोयल (अब स्वर्गीय) बम्बई में स्थापित हैं और अग्रवाल समाज तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय स्तर के कार्यकर्ता हैं। उनके एक भाई के परिवार की कई टूरिस्ट बसें चलती हैं तथा एक भाई बिजली के सामान के विक्रेता और व्यापारी हैं। चौथे भाई के यहाँ भी कपड़े का व्यापार होता है और वे भी बम्बई में स्थापित हैं।
मेरे ससुर जी के सबसे बड़े भाई स्व. श्री राज नारायण गोयल के 6 पुत्र हैं और सभी विभिन्न व्यवसायों में लगे हैं। उनके दो-तीन पुत्रों के प्लास्टिक के ब्रश बनाने के कारखाने हैं। उनसे छोटे श्री सत्य नारायण जी गोयल का परिचय ऊपर दे चुका हूँ। इनके चार पुत्र हैं जो सभी विभिन्न कलर लैबों को सँभालते हैं। इनके सबसे छोटे पुत्र विवेक को सबसे बड़े पुत्र श्री विजय गोयल ने गोद ले रखा है।
(पादटीप- श्री विजय गोयल वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आगरा महानगर संघचालक हैं।)
(पादटीप- श्री विजय गोयल वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आगरा महानगर संघचालक हैं।)
मेरे ससुर जी श्री मोती लाल जी गोयल (अब स्वर्गीय) सभी भाइयों में सबसे छोटे हैं। वे प्रारम्भ से ही सीधे-साधे हैं। उनको दिखाई कम देता है और सुनाई और भी कम देता है। इस कारण कोई भी उनको मंदबुद्धि समझने की गलती कर सकता है। उनकी माली हालत शुरू से ही अच्छी नहीं है, जबकि उनके खानदान के अन्य सभी लोग खूब सम्पन्न हैं।
मेरी श्रीमतीजी चार बहनें और एक भाई हैं। सबसे बड़ी बहन श्रीमती सुमन मथुरा में ब्याही हैं और आजकल सूरत में रहती हैं। उनके पति (मेरे बड़े साढ़ू) श्री हरिओम जी अग्रवाल साड़ियों के व्यापारी हैं। उन्होंने सूरत में अपना फ्लैट भी खरीद लिया है। दूसरी बहिन श्रीमती रेणु (अब स्वर्गीय) आगरा में ही कमला नगर में श्री सुनील कुमार अग्रवाल से विवाहित हैं। उनकी जनरेटर पार्ट बनाने की फैक्टरी है। उनकी माली हालत बस ठीक-ठाक है और उन्होंने अपना मकान बसन्त विहार में बना लिया है। उनसे छोटी श्रीमती वीनू हैं, जो मेरी अर्धांगिनी हैं।
उनसे छोटे उनके एक मात्र सगे भाई श्री आलोक कुमार गोयल (अन्नू) हैं, जो आगरा में ही कपड़े की थोक की दुकान साझेदारी में करते हैं और अपने खर्च लायक कमा लेते हैं। सबसे छोटी बहिन श्रीमती राधा (गुड़िया) हैं, जिनका जिक्र ऊपर कर चुका हूँ। वे भी विवाहित हैं और उनके पति (मेरे छोटे साढ़ू) श्री विजय कुमार जिन्दल भी कपड़े के कमीशन एजेंट हैं और थोड़ा बहुत शेयरों का काम भी कर लेते हैं। उन्होंने भी अपना मकान बसन्त विहार, कमला नगर में बना लिया है।
आजकल तो सभी भाई-बहिनों की माली हालत ठीक है, परन्तु जब मेरा विवाह हुआ था, तब मेरे ससुर जी की माली हालत बहुत खराब थी। उनकी सबसे बड़ी पुत्री सुमन जी का विवाह परिवारियों के सहयोग से हो गया था। उसका कन्यादान उनकी बड़ी भाभी ने किया था, जिनके कोई पुत्री नहीं है। दूसरी पुत्री रेणु जी का विवाह भी इसी प्रकार ठीक-ठाक हो गया था। अन्हें आशा थी कि इसी प्रकार उनकी शेष दोनों पुत्रियों की शादी भी हो जाएगी। लेकिन दुर्भाग्य से उनकी पत्नी अर्थात् मेरी सास श्रीमती मुन्नी देवी के पैर में कोई खतरनाक घाव हो गया। मेरी सगाई के समय वे ठीक थीं, लेकिन विवाह से कुछ दिन पूर्व ही हालत बहुत खराब हो गयी। विवाह की तारीख तय हो चुकी थी, लग्न भी हो चुकी थी, इसलिए विवाह टल नहीं सकता था।
मम्मीजी का इलाज आगरा में नहीं हो पाया, तो उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाकर भर्ती कराया गया। हमारे विवाह के दिन भी उनका वहीं इलाज चल रहा था। वीनू जी का कन्यादान उनकी दूसरी ताई (कलाकुंज स्टूडियो वाली ताईजी) ने किया था। वीनू जी ने मुझे बाद में बताया था कि लगातार तीसरी बेटी होने के कारण उनकी मम्मी का ज्यादातर गुस्सा उनके ऊपर ही उतरता था। एक दिन क्रोध में उन्होंने कह दिया था कि ‘तू मुझे बहुत मारती है, मेरा कन्यादान मत करना।’ ईश्वर की लीला कुछ ऐसी हुई कि उनकी मम्मी उनका कन्यादान नहीं कर पायीं।
उनके विवाह के लिए जो पैसा इधर-उधर से इकट्ठा हुआ था, उसमें से काफी मम्मीजी के इलाज में खर्च हो गया था। इसलिए बहुत सादगी से विवाह हुआ। वह दिन था 6 दिसम्बर 1989। बस बारात की खातिरदारी ठीक हो गयी। किसी लेन-देन का कोई प्रश्न ही नहीं था। मैंने भी कोई उम्मीद नहीं की थी। मैंने अपने वेतन से करीब 15-20 हजार रुपये बचा लिये थे, जो मेरे विवाह में काम आ गये। बैंड-बाजों के बिना सादगी से विवाह हुआ। हालांकि मेरे सभी रिश्तेदार इस पर आश्चर्य कर रहे थे कि कोई लेन-देन नहीं हुआ, परन्तु सभी खुश थे कि दुल्हन अच्छी आ गयी है।
मेरे विवाह में रिश्तेदार अच्छी संख्या में आ गये थे, जैसा कि प्रायः होता है। मैंने अपने बैंक के साथियों और एच.ए.एल., लखनऊ के पुराने साथियों को भी स्वयं जाकर आमंत्रित किया था, परन्तु कोई शामिल नहीं हुआ। हाँ, लखनऊ से हमारे संघ चालक श्री यशोदानन्दन माहेश्वरी जी पधारे थे। दुर्भाग्य से इसके बाद मैं उनके दर्शन नहीं कर सका, क्योंकि कुछ माह बाद ही उनके स्वर्गवास का समाचार मिला। वे दिल्ली चले गये थे, वहीं उनका स्वर्गवास हो गया।
मेरे विवाह में जो एक विशेष अतिथि सम्मिलित हुए थे, वे थे ब्रह्मचारी श्री विश्वनाथ दास शास्त्री। आप 1989 में अप्रैल माह में संघ संस्थापक डा. हेडगेवार की जन्मशताब्दी के अवसर पर हमारे नगर के कार्यक्रम में लखनऊ आये थे। यह कार्यक्रम हमारी शाखा के स्थान पर ही हुआ था। तभी मेरा उनसे परिचय हुआ। हालांकि वे कबीरपंथी हैं और मैं स्वयं वैदिक विचारधारा को मानने वाला आर्यसमाजी हूँ, फिर भी मैं उन्हें गुरुतुल्य सम्मान देता हूँ। अयोध्या में जानकी घाट में उनका आश्रम है। बाद में वे एक बार भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर सुल्तानपुर से सांसद भी चुने गये थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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