आत्मकथा भाग-2 अंश-31

इसके दो दिन बाद ही मैं वाराणसी चला गया। तब तक सगाई के फोटो छपकर आ गये थे और अपनी होने वाली श्रीमती जी का एक फोटो मैं अपने साथ ले गया था। वाराणसी पहुँचकर मैंने अपने साथियों को सगाई का समाचार सुनाया और फोटो भी दिखाया। उन्हें भी आश्चर्य हुआ कि मुझे इतनी सुन्दर पत्नी मिलने वाली है। सुधीर जी की पत्नी श्रीमती सीमा ने तो उसे ‘वीनू’ के बजाय ‘वीनस’ कहा। वीनस ग्रीस (यूनान) में प्रेम, कला और सौन्दर्य की देवी मानी जाती है, ठीक वैसे ही जैसे हम सरस्वती को विद्या की और लक्ष्मी को धन की देवी मानते हैं।
उन दिनों मैं अपनी होने वाली जीवनसंगिनी के ख्यालों में खोया रहता था। कुछ दिन बाद ही मैंने उन्हें एक पत्र लिखा। मैंने अपनी होने वाली साली राधा (गुड़िया) से उनका पता ले लिया था। मुझे आशा थी कि शीघ्र ही उनका उत्तर आ जायेगा, परन्तु एक माह तक कोई उत्तर न आने पर मैं चिन्तित हो गया।
वास्तव में हुआ यह था कि उनके घर वालों और रिश्तेदारों पर मेरा कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। मैं देखने में बहुत मामूली लगता था, ऊपर से काफी दुबला-पतला और छोटे कद का भी था। इसलिए उनकी कोई गलती नहीं है। होने वाली श्रीमती जी पर भी मेरा कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा था, इसलिए वे चिन्ताग्रस्त रहती थीं। उनके घरवालों ने समझा कि इसे लड़का पसन्द नहीं आया है, इसलिए सुस्त रहती है। तब उन्होंने वीनूजी से कहा था कि यदि तुम्हें लड़का पसन्द नहीं है, तो रिश्ता अभी भी तोड़ा जा सकता है। यदि वे ऐसा करते भी, तो उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। लेकिन तभी मेरा पत्र वहाँ पहुँच गया। उसे पढ़कर श्रीमती जी को लगा कि यह कुछ समझदार आदमी है। इसलिए उन्होंने कह दिया कि जो भी मेरे भाग्य में होगा, देखा जायेगा, परन्तु शादी इसी से करूँगी। इस तरह हमारा रिश्ता टूटते-टूटते बचा।
कुछ दिन बाद मुझे उनके इकलौते भाई श्री आलोक कुमार गोयल का पत्र मिला कि आपका पत्र बहिन जी को मिल गया है और वे शीघ्र ही जवाब देंगी। इसके कुछ दिन बाद ही मुझे उनका पहला पत्र प्राप्त हो गया। उसे पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। उन्हीं दिनों मैंने एक कविता लिखी थी, जिसकी पहली पंक्ति थी- ‘दूर नहीं वह दिन जब होगा, सत्य एक चिरसंचित सपना।’ यह कविता मैंने उनको लिख भेजी और उन्हें काफी पसन्द भी आयी। दुर्भाग्य से यह कविता अब मुझसे कहीं खो गयी है, क्योंकि किसी डायरी में नहीं उतारी थी। इस कविता में एक पंक्ति यह थी- ‘हो कवि की साकार कल्पना।’ यदि आपने मेरी आत्मकथा ध्यान से पढ़ी है, तो इसका अर्थ आप स्वयं निकाल सकते हैं।
सितम्बर 1989 में मुझे अपने बैंक की ओर से एक सप्ताह की हिन्दी कार्यशाला में भाग लेने के लिए गुड़गाँव जाने का आदेश मिला। गुड़गाँव दिल्ली के पास है। मैं अपनी पात्रता के अनुसार द्वितीय श्रेणी एसी में यात्रा कर सकता था। तभी हमारे साथी अधिकारी श्री राकेश क्वात्रा ने कहा कि थोड़ा पैसा अपनी जेब से खर्च करके हवाई जहाज से चले जाओ। मैंने कहा- ठीक है। उन्होंने मेरे साथ जाकर वाराणसी से दिल्ली तक इंडियन एयरलाइंस की उड़ान में टिकट बुक करा दी। इस प्रकार मैंने पहली बार हवाई यात्रा की, हालांकि इसमें अधिक मजा नहीं आया। इसका पूरा हाल मैंने अलग से लिख रखा है, जिसे परिशिष्ट ‘क’ में दे रहा हूँ। वापसी में मैं रेलगाड़ी से ही आया था। हवाई यात्रा करने में मेरा जो अतिरिक्त खर्च हुआ वह विविध खर्चों और बैंक से मिलने वाले विराम भत्ते (हाल्ंिटग एलाउंस) से पूरा हो गया। इस तरह वास्तव में मुझे कोई हानि नहीं हुई।
मैंने अपनी हवाई यात्रा का समाचार अपनी होने वाली श्रीमती जी को भी लिख भेजा था। साथ में यह भी लिख दिया था कि दीपावली पर मैं आगरा आ रहा हूँ और उनसे मिलना चाहूँगा। हमारा विवाह दिसम्बर में होना तय हुआ था। हालांकि मैं चाहता था कि मार्च में हो, परन्तु मम्मी ने जल्दी तय कर दिया। श्रीमती जी भी मुझसे मिलना चाहती थीं। अतः टेलीफोन के माध्यम से हमारी मुलाकात तय हो गयी। निश्चय हुआ कि हम ताजमहल देखने चलेंगे। यह मुलाकात तय करने में मेरी छोटी बहिन सुनीता की सबसे अधिक भूमिका रही।
निर्धारित तिथि और समय पर हम राजामंडी चौराहे पर पहुँच गये। मेरे साथ मेरी छोटी बहिन सुनीता के अलावा दोनों भतीजियाँ भी थीं- श्वेता और शिल्पी, जो अपनी होने वाली चाची से मिलने के लिए बहुत व्यग्र थीं। उधर से श्रीमती जी के साथ केवल उनकी छोटी बहिन राधा (गुड़िया) आयी थी। राजामंडी पर एकत्र होकर हम ऑटो तय करके ताजमहल गये। उस दिन मैं ठीक से तैयार होकर गया था, इसलिए देखने में अच्छा लग रहा था। मुझे देखकर श्रीमती जी को भी संतोष हुआ होगा। वे भी पीले रंग की छपी हुई साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थीं।
हम सब ताजमहल पर घूमे, खूब बातें कीं और फोटो भी खींचे। मैं उनके साथ डिनर लेना चाहता था, परन्तु अधिक समय तक बाहर रहना उनके लिए ठीक नहीं होता। इसलिए हमने केवल डोसा खाना तय किया। विचार यह बना कि ताजमहल से हम सीधे बाग मुजफ्फर खाँ चौराहे पर चलेंगे और वहाँ मधु या ब्रजवासी रेस्टोरेंट में डोसा खायेंगे।
जब हम एक ऑटो में ताजमहल से लौट रहे थे, तो रास्ते में मेरे होने वाले साढ़ू श्री सुनील जी अग्रवाल स्कूटर पर आते हुए मिल गये। सगाई से पहले शायद वे एक बार हमारे घर आकर मुझे देख गये थे और सगाई के दिन भी उपस्थित थे। फिर भी मैं उन्हें नहीं पहचान पाया, परन्तु उन्होंने मुझे पहचान लिया। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उनके स्कूटर पर पीछे बैठ जाऊँ। लेकिन मैं 5-5 लड़कियों को एक ऑटो पर असुरक्षित नहीं छोड़ सकता था, इसलिए मैंने साफ मना कर दिया। उनको कुछ बुरा लगा होगा, परन्तु मैंने चिन्ता नहीं की। इस एक घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि सुरक्षा के मामलों में मैं कितना सावधान रहता हूँ।
बाग मुजफ्फर खाँ चौराहे पर पहुँचकर हमने डोसा वगैरह खाये। फिर हम अपने-अपने घर चले गये। शादी से पहले ताजमहल पर अपनी जीवनसंगिनी से हुई यह मुलाकात मेरी सबसे मधुर यादगारों में से एक है। इसके फोटो अभी भी मेरे पास सुरक्षित रखे हैं। इस मुलाकात को हमने अपने ससुराल वालों से गुप्त रखा था, क्योंकि श्रीमती जी के ताऊजी श्री सत्यनारायण जी गोयल को यदि पता चल जाता, तो वे बहुत नाराज होते। वैसे बाद में उन्होंने स्वयं अपनी पोतियों को अपने-अपने मंगेतरों के साथ घूमने की इजाजत दे दी थी।
यहाँ पर यह बता दूँ कि मेरे तइया ससुर श्री सत्य नारायण जी गोयल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अत्यन्त प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक हैं। वे संस्कार भारती के अखिल भारतीय महामंत्री भी रह चुके हैं। वे बहुत अच्छे फोटोग्राफर और चित्रकार हैं। पहले वे ‘अमर उजाला’ दैनिक के लिए फोटोग्राफी करते थे, फिर स्वतंत्र रूप से करने लगे। उनकी कलाकुंज स्टूडियो नाम से बाग मुजफ्फर खाँ चौराहे पर फोटो की मशहूर दुकान है। बाद में कलर फोटो का जमाना आ जाने पर उन्होंने कलर लैब लगा ली हैं, जो स्पीड कलर लैब के नाम से सुविख्यात हैं। इस समय उनकी 5 कलर लैब हैं- तीन आगरा में और एक-एक मथुरा तथा फिरोजाबाद में। अपनी भतीजी के बारे में उन्होंने ही हमारे मामाजी को बताया था और उनकी संजय प्लेस वाली स्पीड कलर लैब में ही हमारी सगाई का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। वे मेरी बहुत इज्जत करते हैं और मैं भी उन्हें पूरा सम्मान देता हूँ। उनके पास लाखों फोटुओं का पुस्तकालय जैसा संग्रह है। ऐसा संग्रह दुनिया में और किसी के पास शायद ही हो। उनके खींचे हुए दुर्लभ फोटो अभी भी संघ की पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं।
(पादटीप- ताऊ जी श्री सत्य नारायण जी गोयल का कुछ वर्ष पूर्व देहावसान हो चुका है।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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