आत्मकथा भाग-2 अंश-30

कुछ दिन बाद जुलाई 1989 में मैं अपने घर आगरा गया। वहाँ पता चला कि हमारे गाँव दघेंटा के पास ही अनौड़ा गाँव में हमारे एक भतीजे का विवाह होने वाला है और उसकी बारात पचावर गाँव में जायेगी। मैं इस शादी में जाने को तैयार हो गया, क्योंकि एक तो सभी सम्बंधियों से मिलने का लालच था, दूसरे अपने गाँव जाने का भी मौका था, क्योंकि पचावर गाँव हमारे गाँव के बहुत निकट है। वहाँ मैं बारात में गया।
पचावर गाँव में आकर मैंने अपने साथियों से इच्छा व्यक्त की कि उसी गाँव में रहने वाले मेरे प्राइमरी के शिक्षक श्री चरण सिंह (मुंशीजी) के दर्शन करना चाहता हूँ, जिनका विस्तृत परिचय मैं अपनी आत्मकथा के पहले भाग में दे चुका हूँ। मेरे दो चचेरे भाई श्री कुंज बिहारी (अब स्वर्गीय) और श्री राज कुमार इसके लिए सहर्ष तैयार हो गये। पूछते हुए हम उनके घर की ओर चले। सौभाग्य से वे वहीं मिल गये। मैंने बड़ी मुश्किल से उनके चरण स्पर्श किये, क्योंकि वे रोक रहे थे। मेरे बारे में यह जानकर वे बहुत प्रसन्न हुए कि मैं बैंक में प्रबंधक बन गया हूँ। परन्तु मेरे कान ठीक नहीं हुए, इसके लिए वे दुःखी हुए। 15-20 मिनट उनसे बातें करने के बाद हम वापस आ गये।
उस रात को बारातियों के सोने की व्यवस्था अच्छी नहीं थी। हल्की बरसात के कारण ठंड भी हो गयी थी। मुझे काफी ठंड लगी। ओढ़ने के लिए कुछ भी नहीं था। किसी तरह रात काटी। प्रातः होते ही मैं अपने छोटे चाचाजी श्री शिवनन्दन लाल की साइकिल पर बैठकर अपने गाँव आ गया। पचावर से हमारा गाँव मुश्किल से दो कोस है यानी 4 मील या लगभग 6 किलोमीटर। अपने घर की देहरी को छूते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी, क्योंकि मैं लगभग 6 साल बाद गाँव आया था। इससे पहले आखिरी बार मैं तब आया था जब हमारे वरिष्ठ पितामह स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी (लाल बाबा) का ठीक 100 वर्ष की आयु में देहावसान हुआ था।
मैं 2-3 दिन गाँव में रहा और सबसे मिला। मेरा मन गाँव छोड़ने को नहीं कर रहा था, परन्तु छुट्टियाँ खत्म होने लगी थीं, इसलिए आगरा आना पड़ा। गाँव में ही हमारे एक चचेरे भाई श्री सन्त कुमार अग्रवाल ने बताया कि उनकी एक साली की लड़की शादी लायक है। वे मुझे जानते हैं और मेरी बीमारी के बारे में भी। उस लड़की की माँ किसी घातक रोग से पीड़ित हैं, इसलिए अपने सामने ही लड़की के हाथ पीले कर जाना चाहती हैं। अतः मैं लड़की को देखकर ‘हाँ’ कर दूँ। मैंने बताया कि कल मुझे आगरा जाना है और 2 दिन बाद ही वापस वाराणसी जाना है। इसलिए लड़की दिखानी हो, तो तुरन्त दिखा दें। उन्होंने कहा कि वे लड़की को लेकर कल ही आगरा आ जायेंगे, वहीं देख लेना। मैंने कह दिया कि ठीक है।
आगरा हमारे गाँव से लगभग 45 किमी दूर है। अगले दिन दोपहर को मैं आगरा पहुँचा। तभी थोड़ी देर बाद ही हमारे बड़े मामाजी श्री दयाल चन्द जी गोयल आ गये और बोले कि उन्होंने एक अच्छी लड़की देखी है, जो काफी सुन्दर और पढ़ी-लिखी है, लेकिन गरीब घर की है और उसके पैरों पर थोड़े से सफेद दाग हैं। उसको देख लो। मैंने कहा कि ठीक है, देख लूँगा। मामाजी ने तुरन्त भाग-दौड़ करके लड़की देखने की व्यवस्था कर दी। उस समय मेरी तबियत थोड़ी ढीली थी, ठंड लग जाने के कारण हल्का सा बुखार था और 2-3 दिन से दाढ़ी भी नहीं बनायी थी। लेकिन मुझे इसका ध्यान नहीं रहा और ऐसे ही कपड़े बदलकर लड़की देखने चल दिया।
ठीक उसी समय श्री सन्त कुमार भाई साहब का लड़का मेरा भतीजा मुकेश चन्द वहाँ आ गया और कहने लगा कि उसकी मौसी की लड़की उसके घर आ गयी है, इसलिए मैं उसे देखने चलूँ। लेकिन मैं तो मामाजी की बतायी लड़की को देखने जा रहा था और वे लोग भी संजय प्लेस में अपनी स्पीड कलर लैब दुकान पर मेरा इन्तजार कर रहे थे। इसलिए मैंने मुकेश से कहा कि इस लड़की को देखने के बाद मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। मैं अपने घर वालों के साथ संजय प्लेस गया। वहाँ मैंने वह लड़की देखी, जो अब मेरी जीवनसंगिनी हैं। देखते ही मैंने उन्हें पसन्द कर लिया, क्योंकि वे वास्तव में बहुत सुन्दर हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि दाग कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रहे थे। मेरी मम्मी ने उनके पैरों पर से साड़ी हटाकर मुझे दिखाया भी कि दाग केवल घुटनों के नीचे यहाँ पर हैं, परन्तु मैंने ध्यान से देखा ही नहीं और तुरन्त ‘हाँ’ कर दी।
यह मुझे पहले ही बता दिया गया था कि वे एम.ए. पास हैं। मुझे डर था कि कहीं वह लड़की मुझे ही नापसन्द न कर दे। इसलिए आपसी बातचीत में मैंने उनसे सीधे पूछ लिया कि ‘आप मुझे पसन्द हैं, क्या आपको मैं पसन्द हूँ?’ वह लड़की सबके सामने मना कर नहीं सकती थी, इसलिए उसने भी कह दिया कि पसन्द हैं। वैसे हमारे डा. भाई साहब और मम्मी ने कहा भी कि हो सकता है कि तुम्हारे बच्चों को भी ऐसे दाग हो जायें। परन्तु मैं जानता था कि यह छूत का रोग नहीं है, इसलिए मुझे दागों की चिन्ता नहीं थी। फिर भी मैंने कह दिया कि अगर हुए भी तो मैं भुगत लूँगा, पर शादी इसी लड़की से करूँगा।
(पादटीप- मेरा यह विश्वास सत्य निकला, क्योंकि प्रभु कृपा से हमारे दोनों बच्चे पूर्णतः स्वस्थ, सुन्दर एवं योग्य हैं।)
दोनों तरफ से ‘हाँ’ होते ही विचार बन गया कि अब वहीं इनकी बाकायदा सगाई कर दी जाये। तुरत-फुरत सारे इंतजाम किये गये। अँगूठी पहनने-पहनाने की रस्म हुई। फोटो खींचे गये, अच्छा जलपान हुआ। जलपान के समय ही मुझे उस लड़की का नाम पता चला- बीनू या वीनू। उस समय तक हमारे और उनके सभी प्रमुख रिश्तेदार, जो सभी आगरा में ही रहते हैं, वहाँ आ गये थे, इससे अच्छा खासा फंक्शन हो गया। मुकेश चन्द इस पूरे समय मेरे साथ ही था। उसे भी अपनी होने वाली चाची अच्छी लगी, लेकिन वह थोड़ा मायूस भी था, क्योंकि उसकी मौसी की लड़की को तो मैंने देखा भी नहीं। तब मैंने उससे कहा कि अब देखने का कोई अर्थ नहीं है, इसलिए मेरी ओर से क्षमा माँग लेना।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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