आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 3)
18 तारीख को आगरा से मैंने श्री हिरानो को फिर टेलेक्स किया और आगरा तथा दिल्ली का एक-एक फोन नम्बर दिया, जहाँ वे मुझसे सम्पर्क कर सकते थे। उसी दिन उनका फोन आ गया कि तुम्हारा टिकट पक्का हो गया है और दिल्ली जाकर ले लो। तब मम्मी ने कहा- ”एक बार और दिल्ली चला जा। टिकट मिल जाये तो ठीक है, नहीं तो भाड़ में गया जापान।“ मैं भी इससे सहमत था।
अगले दिन (19 अक्टूबर को) मैं टैक्सी से दिल्ली गया, क्योंकि कुतुब एक्सप्रेस 2-3 घंटे लेट थी। 11 बजे पहुंचा तो सीधा जापानी दूतावास गया और वीसा ले आया। वहाँ से बस से एयर इंडिया आफिस गया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और क्रोध भी आया, जब कु. मसीह ने बताया कि पी.टी.ए. अभी तक नहीं आया है। उन्होंने अनुमान लगाया कि वह वाराणसी में हो सकता है, कानपुर में नहीं, तो मैंने कहा कि वाराणसी बात करिये। उन्होंने काल बुक करने और मुझसे इन्तजार करने को कहा। मैं ज्यादा इन्तजार करने को तैयार नहीं था, फिर भी सबसे पहले मैंने श्री हिरानो को टेलेक्स किया कि एयर इंडिया अभी भी यही कह रहा है कि पी.टी.ए. नहीं आया। मैंने यह भी लिख दिया कि अगर आज टिकट नहीं मिली, तो मैं वापस चला जाऊँगा।
मैं उनके जबाब का इन्तजार करने लगा। परन्तु 4ः30 बजे तक कोई जबाब नहीं आया। तब मैं कु. मसीह को धन्यवाद देकर तथा श्रीमती राठौर के लिए धन्यवाद सन्देश देकर चला आया। वे मुझसे और इन्तजार करने को कह रही थी, परन्तु मैं तैयार नहीं था। वहाँ से मैं साहिबाबाद गया। वहाँ मेरे बड़े भाई साहब की ससुराल है। उन्हीं का फोन नम्बर मैंने श्री हिरानो को दिया था। उसी रात जापान से वहाँ फोन आया कि विजय कुमार का पी.टी.ए. वाराणसी से दिल्ली भेजा जा रहा है और इस बार टिकट पक्की है।
खैर, दूसरे दिन 9 बजे हमने एअर इंडिया को फोन मिलाया तो वे बोले कि टिकट पक्का है, आकर ले जाइये। मैं निश्चिंत हुआ और भाई साहब के साथ टैक्सी में दिल्ली गया। वहाँ मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब किसी नये (अनाड़ी) क्लर्क ने बताया कि पी.टी.ए. अभी तक नहीं आया है। मैंने उनसे कहा कि अभी तुरन्त जाकर अपने सभी टेलेक्स देख लो। वे गये और काफी देर बाद पी.टी.ए. लेकर लौटे। तब मेरी जान में जान आयी। उन्होंने टिकट बनाने में जरूरत से ज्यादा समय लिया। 12ः30 बज गये थे। उसी दिन फ्लाइट थी तथा मुझे विदेशी मुद्रा भी लेनी थी। उस दिन केवल अशोका होटल में विदेशी मुद्रा मिल सकती थी।
अतः हम तुरन्त वहाँ गये। वहाँ से 500 डालर लिये, जिसमें करीब 1 घंटा लग गया। हमें साहिबाबाद भी जाना था, क्योंकि हमारा सारा सामान वहीं रखा था। दौड़ते-दौड़ते हम वहाँ 2.40 पर पहुँच पाये। जल्दी-जल्दी हमने खाना भी खाया और सामान ठीक करके तथा श्री हिरानो के लिए एक छोटी सी भेंट लेकर हम ठीक 3.15 पर चल दिये। इस बार हम आउटर रिंग रोड पर होकर चले, क्योंकि वहाँ ट्रैफिक कम था। लाल बत्ती की भी चिन्ता नहीं थी। ठीक 4.15 पर हम एअर पोर्ट टर्मीनल-2 पर पहुँच गये। वहाँ जाकर पता चला कि हमारी उड़ान 2 घंटे लेट है।
अब हमें इन्तजार करना था। मेरे साथ मेरे भाई साहब, भाभी जी, उनके भाई, मेरा भतीजा सनी (साहिल) और भतीजी शिल्पी भी गये थे। मैंने उनसे कहा कि उड़ान तक अगर आप इन्तजार करेंगे, तो लौटने में बहुत रात हो जायेगी। इसलिए आप चले जाइये। काफी कहने पर वे मान गये और ठीक 6 बजे उनसे विदा लेकर मैं हवाई अड्डे के अन्दर चला गया।
पहले मैं कभी देश से बाहर नहीं गया था, इसलिए हवाई अड्डे के अन्दर मुझे थोड़ी परेशानी हुई। सौभाग्य से एक सिख सज्जन ने मदद की। उनके कहने पर सबसे पहले मैंने 300 रु. का एअरपोर्ट टैक्स जमा किया। फिर सामान की जाँच करायी और एक सूटकेस सामान के साथ रखने के लिए दे दिया। दूसरे सूटकेस में मेरी जरूरत की सभी चीजें थी, वह मैंने अपने साथ रखा। इमीग्रेशन (प्रवास) विभाग की जाँच में काफी समय लग गया। मुझे तो केवल 1 मिनट लगा, परन्तु दूसरे जो लोग लाइन में मुझसे आगे खड़े थे, उन्होंने काफी समय लगाया। खैर, अब कस्टम से पाला पड़ा। उन्होंने भी साथ के सामान की जाँच की। उस समय 6.30 बजे थे।
मेरी फ्लाइट आठ बजे बतायी गयी थी, परन्तु वह और देरी से होने की संभावना थी। इसलिए मुझे एक कार्ड दिया गया था, जो महाराजा लाउंज का था। वहाँ जाकर मैं आराम कर सकता था। मैंने वही किया। मुफ्त में चाय बिस्कुट लिये और वहाँ रखे देशी-विदेशी अखबार देखने लगा। मेरी तरह और भी दो-चार सज्जन वहाँ इन्तजार कर रहे थे। वे भी टोकियो जाने वाले थे।
ठीक 8.45 बजे हमें बुलाया गया। रास्ते में फिर दो बार हाथ के सामान की जाँच हुई। विमान में मुझे एक्जीक्यूटिव क्लास में बैठाया गया था। विमान में मेरे लिए नयापन कुछ नहीं था, क्योंकि मैं एक बार वाराणसी से दिल्ली विमान यात्रा कर चुका था। नयापन केवल वहाँ के डिनर में था, जो था तो शाकाहारी, परन्तु उसमें बहुत सी नयी चीजें थी, जिन्हें खा पाना मेरे लिए संभव नहीं था। अतः उनको छोड़कर मैंने रोटी-चावल खाये। एक रूमाली रोटी और मंगा ली।
9.30 बजे रात्रि हम दिल्ली से उड़े थे। मुझे नींद आ रही थी, इसलिए खाना खाकर मैं सो गया। करीब 12.30 बजे मेरी नींद खुली। पता चला कि 1 बजे जहाज बैंकाक में उतरेगा। तब तक मैं पूरी तरह जग गया था। मैंने ऊपर से ही बैंकाक का जायजा लिया। कुछ इमारतों और लाइटों के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। करीब आधा घंटा वहाँ रुकने के बाद जहाज फिर उड़ा और उसे उड़ते छोड़कर मैं सो गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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