आत्मकथा भाग-2 अंश-29

अपने कम्प्यूटर विभाग के अधिकारियों के अलावा जिस अधिकारी से मेरी विशेष घनिष्टता थी, वे थे श्री नरेन्द्र प्रसाद धस्माना। वे हमारे हिन्दी अधिकारी थे, जिसे तकनीकी भाषा में राजभाषा अधिकारी कहा जाता है। वे भी उसी अनन्ता काॅलोनी में रहते थे, जिसमें मैं रहता था। उनकी रुचि आध्यात्मिक और धार्मिक विषयों की तरफ अधिक थी। वे प्रायः आचार्य रजनीश (ओशो) की मोटी-मोटी किताबें पढ़ा करते थे। हिन्दी में मेरी भी रुचि होने के कारण हम दोनों मिलकर कई कार्य करते थे। कई बार हमने मिलकर वाराणसी मंडल की राजभाषा पत्रिका ‘इला भारतेन्दु’ प्रकाशित करायी थी। मैं उन दिनों हिन्दी कम्प्यूटरों पर कुछ शोधकार्य कर रहा था। श्री नरेन्द्र जी मुझे इसमें काफी प्रोत्साहित किया करते थे। बाद में उनका स्थानांतरण मेरठ हो गया और वहाँ से प्रधान कार्यालय, कोलकाता। उन्होंने संन्यास दीक्षा ले ली है, परन्तु बैंक सेवा कर रहे हैं। वे अनुवाद कार्य में काफी दक्ष हैं।
(पादटीप- श्री नरेन्द्र धस्माना अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और मेरठ में ही अपने घर में रहते हुए अपने पोते-पोती के साथ खेलते रहते हैं। उनसे मेरा सम्पर्क बना हुआ है।)
इन अधिकारियों के अतिरिक्त उस कार्यालय में जिनका उल्लेख करना आवश्यक लगता है, वे थीं कुमारी डाॅली चक्रवर्ती। वे उस समय लिपिक अर्थात् बाबू थीं और डिस्पैच का कार्य किया करती थीं। वे काफी योग्य और मेहनती हैं, इसलिए मैं उन्हें असिस्टेंट आॅफीसर कहा करता था। आवश्यक होने पर, जैसे लेखाबन्दी के समय, वे हमारे कम्प्यूटर विभाग के कार्यों में बहुत सहायता किया करती थीं। वे हालांकि चश्मा लगाती थीं, परन्तु काफी आकर्षक लगती थीं। इससे प्रारम्भ में मैं उनकी ओर आकर्षित हो गया था। मैं सोचा करता था कि यदि कभी मैं किसी ऊँचे पद पर पहुँचा, तो डाॅली जी को ही अपना व्यक्तिगत सहायक (पी.ए.) बनाऊँगा। उन्हें हिन्दी का अच्छा ज्ञान था और शे’र तथा कविताएँ भी लिखा करती थीं। हिन्दी दिवस के अवसर पर होने वाली प्रतियोगिताओं में वे हर वर्ष कोई न कोई पुरस्कार जीत लेती थीं। मैंने उनको लक्ष्य करके एक कविता भी लिखी थी, जो निम्न प्रकार है-
जाने क्या बात है तुम्हारी उदास आँखों में
झाँकता हूँ जब भी मैं काँच के भीतर
दहला देता है तुम्हारी आँखों का सूनापन!
खोजती हों जैसे महाशून्य में कुछ
जो भर दे इनका खालीपन!
कैद हूँ मैं अपने दायरों में
दे देता नहीं तो अपना सब कुछ
और हटा देता तुम्हारा अकेलापन!!
बाद में मेरा विवाह हो जाने पर मैं उनकी ओर से उदासीन हो गया था। मेरे वाराणसी छोड़ने के बाद वे आफीसर बन गयी थीं और आजकल डिपोजिटरी सैल, वाराणसी में ही कार्य कर रही हैं। विवाह उन्होंने अभी तक नहीं किया है, शायद करना ही नहीं चाहतीं। उनके ऊपर उम्र का असर होने लगा है और जवानी में ही बूढ़ी-सी नजर आने लगी हैं। काफी दिनों से मैं वाराणसी नहीं गया हूँ, परन्तु उनके समाचार मिल जाते हैं।
(पादटीप- कु. डाॅली चक्रवर्ती अब लखनऊ में ही मंडलीय कार्यालय परिसर में एक विभाग में हैं। मेरी उनसे यदा-कदा भेंट हो जाती थी। अब शायद वे भी शीघ्र अवकाश प्राप्त करने वाली हैं।)
वाराणसी में प्रारम्भ में मैं संघ कार्यालय गोदौलिया में रहा। वहाँ मुझे कोई कष्ट नहीं था। सोने के लिए एक बड़ा सा कमरा था और खाना मैं बाहर खा लेता था। परन्तु माताजी-पिताजी सारे सामान के साथ लखनऊ में ही थे, इसलिए तुरन्त मकान लेना आवश्यक था। मजबूरी में मुझे एक कामचलाऊ फ्लैट लेना पड़ा, जो टकसाल सिनेमा के पीछे था। यह फ्लैट ग्राउंड फ्लोर पर था और उसमें धूप और हवा बिल्कुल नहीं आती थी। अगर इतनी ही होता, तो गनीमत थी, परन्तु उसमें सीलन बहुत थी। इसलिए हम उसमें अधिक दिनों तक नहीं रह सकते थे। किसी तरह हमने उसमें 4 महीने काटे। तभी मुझे अनन्ता कालोनी में तीसरी मंजिल पर एक अच्छा फ्लैट मिल गया। हालांकि वह भी ज्यादा हवादार नहीं था, परन्तु उसके ऊपर की पूरी छत हमारी थी। इसलिए काफी आरामदायक था। पानी के लिए मकान मालिक ने ही एक अच्छी पम्प लगवा दी थी, इसलिए कोई कष्ट नहीं था।
जुलाई 1989 में अचानक मेरा विवाह तय हो गया। वैसे तो मेरी माताजी काफी दिनों से मुझे खूँटे से बाँधने की कोशिश कर रही थीं, परन्तु कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिला था। एक रिश्तेदार ने एक लड़की बतायी थी, जो इलाहाबाद बैंक में ही सेवा करती हैं। हालांकि वे देखने में आकर्षक नहीं हैं, फिर भी अपने छोटे मामाजी श्री दाऊ दयाल जी (अब स्वर्गीय) और अपनी मम्मी के कहने पर मैं उनसे विवाह करने के लिए तैयार हो गया। लेकिन मैं ऐसी जीवन संगिनी चाहता था, जो केवल घर की देखभाल करे। मैं महिलाओं के लिए नौकरी करना तब तक उचित नहीं समझता, जब तक कि कोई मजबूरी न हो। मेरा मानना है कि घर को सँभालना पूरे समय का कार्य (फुल-टाइम जाॅब) है। इसलिए मैंने शर्त लगा दी कि उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी, परन्तु उनके घरवाले इसके लिए राजी नहीं हुए। फिर मैंने प्रस्ताव किया कि यदि वे नौकरी करना चाहती हैं, तो मैं स्वयं नौकरी छोड़कर घर सँभाल लूँगा। लेकिन वे इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। तभी कुछ ऐसी बात हो गयी कि हमारे मामाजी का ही मन उनसे उचट गया। उन्हें लगा कि यह घर-परिवार ठीक नहीं है, इसलिए उन्होंने स्वयं ही उनसे मना कर दिया। इस तरह अपना पीछा छूट जाने से मुझे प्रसन्नता हुई। यह अप्रैल-मई 1989 की बात है। तब तक मैं लखनऊ में ही था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान

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