आत्मकथा भाग-2 अंश-27

यहाँ वाराणसी के बारे में संक्षेप में लिख देना उचित समझता हूँ। यह शायद भारत की सबसे प्राचीन नगरी है। यह वरुणा और असी इन दो नदियों के बीच गंगाजी के बायें किनारे पर बसी हुई है। यहाँ गंगाजी उत्तरवाहिनी हैं, इससे इसका महत्व बढ़ गया है। वाराणसी को ‘काशी’ भी कहा जाता है और बोलचाल में इसे ‘बनारस’ कहते हैं। इसकी मुख्य विशेषता हैं यहाँ के घाट और मंदिर। यहाँ जैसे घाट दुनिया में कहीं नहीं हैं- अयोध्या, मथुरा, इलाहाबाद और हरिद्वार में भी नहीं। कहा जाता है कि यहाँ 108 प्रमुख घाट हैं।
एक बार मैंने हरिश्चन्द्र घाट से प्रारम्भ करके सभी घाटों के नाम लिखने का कार्य किया। करीब दो घंटों में मैं मणिकर्णिका घाट तक ही 50 घाटों के नाम लिख सका। मणिकर्णिका घाट से आगे राजघाट तक घाटों की अटूट शृंखला है। मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है। बताया जाता है कि हजारों वर्षों से यहाँ चिताओं की आग कभी बुझी नहीं है अर्थात् कोई न कोई चिता हमेशा जलती रहती है। दूर-दूर से मुर्दे यहाँ लाये जाते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर अन्येष्टि होने से स्वर्ग मिलता है।
वाराणसी के मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें सबसे प्रमुख है- बाबा विश्वनाथ का मंदिर, जो बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है। उसी के पास में ज्ञानवापी है, जहाँ विश्वनाथ का मूल मन्दिर था, जिसे औरंगजेब ने तोड़ा था। अब उस मंदिर के ढाँचे पर मसजिदनुमा इमारत बनी हुई है, जिसको हिन्दू हटा देना चाहते हैं। वर्तमान विश्वनाथ मंदिर महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने बनवाया था। अधिकतर यात्री इन दोनों मन्दिरों को देखने आते हैं। इनके अलावा संकटमोचन मन्दिर, मानस मन्दिर, दुर्गा कुंड का दुर्गा मन्दिर तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अन्दर बना हुआ विश्वनाथ मंदिर (बिड़ला मंदिर) मुख्य रूप से प्रसिद्ध हैं। वैसे वाराणसी में हजारों मन्दिर हैं। यहाँ पर नवरात्रों में पूजी जाने वाली सभी नौ देवियों के अलग-अलग बड़े-बड़े मन्दिर बने हुए हैं, जिनमें नवरात्र के दिनों में भारी भीड़ रहती है।
वाराणसी में पर्यटक बहुत आते हैं। प्रमुख तीर्थ होने के कारण देशी पर्यटक तो आते ही हैं, विदेशी पर्यटक भी बहुत आते हैं। हम आगरा से वाराणसी प्रायः गंगा-यमुना एक्सप्रेस से आया-जाया करते थे। उसमें बहुत से विदेशी भी हमारे साथ यात्रा करते थे। मैं हालांकि सुन नहीं सकता, लेकिन होठों के पढ़ सकने की अपनी विशेषता के कारण उनसे अंग्रेजी में बातें कर लेता था। मुझे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते देखकर मेरी श्रीमतीजी आश्चर्यचकित हो जाती थीं। उन विदेशियों के बारे में मेरे कई संस्मरण हैं, लेकिन उनका यहाँ उल्लेख करना व्यर्थ है। कई बार हिन्दी जानने वाले विदेशी भी मिल जाते थे। उनमें से एक ने मुझे हिन्दी में लिखकर अपना नाम बताया था- जाॅन फाॅन स्टीफन। उसने मुझे यह भी बताया था कि ‘फाॅन’ को रोमन लिपि में ‘वाॅन’ लिखा जाता है, लेकिन ‘फाॅन’ पढ़ा जाता है। मैं यह बात पहले से जानता था, परन्तु उसने जिस तरह शुद्ध हिन्दी में लिखकर बताया, उससे मैं चकित रह गया।
एक बार एक विदेशी युवक उस यात्रा का पूरा आनन्द ले रहा था। हर बार जब भी किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकती थी, तो वह आगे के दरवाजे से उतरकर डिब्बे के सामने से ‘चाऽऽऽय...’ की आवाज लगाता हुआ निकलता था और पीछे के दरवाजे से चढ़ता था। इस पर हमें बड़ा मजा आता था। एक बार तीन विदेशी लड़कियों से हमारी घनिष्टता हो गयी। जिस दिन हम आगरा पहुँचे, उसी दिन रात को सदर के दिवाली मेले में वे तीनों लड़कियाँ हमें फिर मिल गयीं। हमें वहाँ देखकर वे बहुत खुश हुईं थीं।
वाराणसी में जब कोई किसी से मिलता है, तो सबसे पहले यही पूछता है- ‘और क्या हाल है?’ पहले तो मैं चकराता था कि अभी तो बात शुरू भी नहीं हुई है, यह ‘और’ कहाँ से आ गयी। लेकिन बाद में पता चला कि इस बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में ‘बाबा की दया है!’ यह बात हर जगह हर समय हर परिस्थिति में हर व्यक्ति के द्वारा कही हुई मानी जाती है। इसलिए बात इससे आगे चालू की जाती है कि इसके अलावा और क्या हाल-चाल है? इसके जवाब में प्रायः यही कहा जाता है- ‘बस, बाबा की ही दया है!’
वाराणसी से थोड़ी ही दूर पर सारनाथ नामक प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है, जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था। यहाँ एक स्तूप भी बना हुआ है, जिसमें कहा जाता है कि भगवान बुद्ध के दाँत रखे हुए हैं। सारनाथ बड़ी सुन्दर और शान्त जगह है। जब भी हमारा मन करता था, हम वहाँ चले जाते थे। वहाँ किसी महल या बौद्ध विहार के खंडहर हैं। मैं इन खंडहरों में बहुत घूमा करता था। अशोक की एक लाट के टुकड़े भी वहाँ रखे हुए हैं। वहीं पास में एक संग्रहालय है और एक जैन मंदिर भी है। संग्रहालय में अशोक की लाट का शीर्ष भाग अर्थात् 4 सिंह रखे हुए हैं, जो हमारा राष्ट्रीय चिह्न है। सारनाथ में एक छोटा सा चिड़ियाघर भी बनाया गया है।
काशी के बारे में कहा जाता है कि यदि कोई कष्ट न हो और मजबूरी न हो, तो उसको छोड़ने का विचार भी नहीं करना चाहिए। कहावत है-
चना चबैना गंगजल जो पुरबै करतार।
काशी कबहुँ न छाँड़िये विश्वनाथ दरबार।।
अर्थात् यदि खाने को चना-चबैना मिल जायें और पीने को गंगाजल मिल जाये, तो कभी भी काशी नहीं छोड़नी चाहिए।
मैं लगभग साढ़े छः वर्ष वाराणसी में रहा और मेरा यह समय प्रायः आनन्दपूर्वक ही गुजरा। मेरे ऊपर बाबा विश्वनाथ की कृपा प्रारम्भ से ही बनी रही। यहीं मुझे कई सफलताएँ भी मिलीं, जिनका उल्लेख आगे करूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21