आत्मकथा भाग-2 अंश-26
28 दिसम्बर को मैं समय पर बैंक पहुँच गया और वहाँ उपप्रबंधक (ईडीपी) का कार्यभार ग्रहण कर लिया। मेरे पास एक दस्तावेज कम था, शायद प्रशंसापत्र या चरित्र प्रमाणपत्र। वह मैंने अगले दिन जमा कर दिया।
मेरे साथ एक अन्य नये अधिकारी ने भी उसी पद पर कार्यभार ग्रहण किया था। वे थे श्री गया प्रसाद गौड़। उनसे मेरी अच्छी निभती थी। वे एक अनुसूचित जाति से सम्बंधित हैं, लेकिन उनका व्यवहार बहुत सौम्य और गरिमामय था।
जब मैंने इलाहाबाद बैंक में सेवा प्रारम्भ की थी, उस समय लखनऊ का मंडलीय कार्यालय राजनीति का अखाड़ा बना हुआ था। हमारे सहायक महा प्रबंधक थे श्री राधे रमण शर्मा। वे केवल अपने चमचे अधिकारियों से प्रसन्न रहते थे और एवार्ड स्टाफ अर्थात् लिपिकों का लगभग सारा वर्ग उन्हें घृणा की हद तक नापसन्द करता था। इसका कारण यह था कि वे अकारण ही कर्मचारियों का उत्पीड़न करते रहते थे और बैंक के नियमों के विरुद्ध दूर-दूर की शाखाओं में उनका मनमाना स्थानांतरण कर देते थे। इसके परिणामस्वरूप उन्हें प्रायः रोज ही कर्मचारी नेताओं के कोप का भाजन बनना पड़ता था तथा नारेबाजी व गाली-गलौज से दो-चार होना पड़ता था। कई अधिकारियों को उन्होंने अपनी कठपुतली बना रखा था और उनसे मनमाने आदेश जारी करा देते थे।
उस समय हमारे मुख्य प्रबंधक थे श्री मोहन चन्द्र जोशी। सहायक महा प्रबंधक के विपरीत वे बहुत सज्जन प्रकृति के थे और राजनीति से अलिप्त रहने का प्रयास करते थे। मेरी आदत क्योंकि किसी की मक्खनबाजी करने की नहीं है, इसलिए श्री राधे रमण शर्मा मुझसे प्रारम्भ से ही असंतुष्ट रहे। इसमें काफी बड़ा हाथ मेरे विभाग के एक अधिकारी श्री अरुण तलवार का था, जो मेरे बारे में उनसे न जाने क्या-क्या बोल आते थे।
वास्तव में बैंकों के अधिकांश बड़े अधिकारी अपने से वरिष्ठों की चमचागीरी और चापलूसी करके ही ऊँचे पद पर पहुँचे होते हैं। इसलिए वे भी अपने कनिष्ठ अधिकारियों से चापलूसी की आशा और अपेक्षा करते हैं। जो अधिकारी ऐसा नहीं करते, उनसे वे स्वाभाविक रूप से रुष्ट रहते हैं। श्री राधे रमण शर्मा इस श्रेणी के जीव थे।
उन दिनों बैंक में हमारे पास कोई विशेष कार्य नहीं था। कुछ तो इसलिए कि वहाँ कई कार्यों का कम्प्यूटरीकरण पहले ही हो चुका था और यह स्पष्ट नहीं था कि आगे किन-किन कार्यों का कम्प्यूटरीकरण किया जाएगा। दूसरे इसलिए भी कि मैं एच.ए.एल. में जिस कोबाॅल भाषा में कार्य करता था, उसका बैंक में कोई विशेष उपयोग नहीं था। वहाँ के कम्प्यूटर और साॅफ्टवेयर सभी अलग थे, जो मेरे लिए बिल्कुल नये थे और मुझे सीखने भी थे। इसलिए मैं प्रारम्भ के एक-दो माह वहाँ कोई विशेष कार्य नहीं कर सका। इसका श्री शर्मा पर यह प्रभाव पड़ा कि यह कुछ करना नहीं चाहता।
परन्तु उनकी धारणा बिल्कुल गलत थी, क्योंकि एक बार जब हमारा कम्प्यूटर बिल्कुल खराब हो गया था, तो उन्होंने मुझ सहित कम्प्यूटर विभाग के कई अधिकारियों को दूसरे विभागों में कार्य करने के लिए भेज दिया था। मुझे भविष्य निधि विभाग में लगाया गया। वहाँ मेरा काम था कर्मचारियों के भविष्य निधि खाते का वर्ष भर का विवरण बनाना। वहाँ मैंने 15-20 दिनों में ही इतना काम कर दिया था, जितना वहाँ के कर्मचारी 2-3 महीनों में भी नहीं कर पाते थे।
फिर जब हमारा कम्प्यूटर ठीक हो गया, तो मैं वापस अपने विभाग में आ गया। तब भविष्य निधि विभाग के मैनेजर बीच-बीच में मुझसे पूछा करते थे कि ‘अब आपका कम्प्यूटर कब खराब होगा? क्या उसके लिए कोई पूजा-पाठ कराया जाये?’ मेरी कर्मठता की ऐसी छवि दूसरे विभागों पर बन गयी थी। लेकिन हमारे सहायक महा प्रबंधक महोदय पर इसका एकदम उल्टा प्रभाव हुआ। शायद उनके लिए कर्मठता की कसौटी केवल मक्खनबाजी करना था और इसी ‘कार्य’ में मैं सबसे अधिक फिसड्डी था।
इसलिए अकारण ही उन्होंने मुझे मेरे अधिकारों से वंचित करने का प्रयास किया। बैंक अधिकारी होने के नाते यह मेरा अधिकार था कि मैं अपने लिए पर्सनल लीज पर निर्धारित सीमा तक किराये का कोई भी मकान ले सकता था, जिसके किराये का भुगतान बैंक द्वारा किया जाना था। जब मैंने इसके लिए आवेदन किया, तो मेरा आवेदन इस बहाने से हमारे प्रधान कार्यालय कोलकाता अग्रसारित कर दिया गया कि मैं अभी प्रोबेशन पर हूँ। यह स्पष्ट रूप से मुझे मेरे अधिकार से वंचित करने का षड्यंत्र था। उस आवेदन को कोलकाता भेजने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि हमारे ही कार्यालय में ऐसे एक से अधिक उदाहरण उपलब्ध थे, जिनमें प्रोबेशन वाले अधिकारियों को लीज पर मकान लेने की अनुमति दी गयी थी।
मैंने इसका विरोध किया, क्योंकि अन्याय सहना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं है। इस पर उन्होंने यह राय दी कि मैं चाहूँ तो अपने जोखिम पर मकान किराये पर ले सकता हूँ और जब प्रधान कार्यालय से अनुमति आ जायेगी, तो बकाया किराये का भुगतान कर दिया जाएगा। इस पर मैंने मार्च 1989 से अपने एक मित्र का मकान लीज पर ले लिया। परन्तु बैंक ने मई 1989 से ही उसका किराया देना शुरू किया।
तभी अचानक मई के अन्त में मेरा स्थानांतरण वाराणसी कर दिया गया। इतना ही नहीं मुझे ठीक उसी दिन शाम को कार्यमुक्त कर दिया गया, जिस दिन मुझे स्थानांतरण का पत्र मिला था। यह स्थानांतरण भी स्पष्ट रूप से मेरे साथ घोर अन्यायपूर्ण था, क्योंकि मेरी कानों की बीमारी को ध्यान में रखते हुए मेरे गृह नगर आगरा से इतनी दूर स्थानांतरण नहीं होना चाहिए था। परन्तु मैंने इसे चुनौती नहीं दी, क्योंकि मैं वहाँ के राजनीतिक वातावरण से दूर जाना चाहता था। कभी-कभी तो मैं सोचता था कि इससे तो अच्छा था कि एच.ए.एल. में ही रहता। फिर भी मैं वाराणसी चला गया। 2 जून 1989 को मैं वाराणसी पहुँचा। वहाँ मेरा कोई परिचित या मित्र नहीं था, इसलिए मैं पहले संघ कार्यालय गोदौलिया में ठहरा और लगभग एक माह बाद मकान किराये पर लिया।
सौभाग्य से वाराणसी का वातावरण लखनऊ के एकदम विपरीत था। वहाँ राजनीति का नामोनिशान भी नहीं था। वहाँ के सहायक महा प्रबंधक श्री नरेन्द्र कुमार सूद बहुत सज्जन थे और मेरे कम्प्यूटर विभाग के अधिकारी भी बहुत सहयोगात्मक थे। इसलिए मैं वहाँ प्रसन्न था, भले ही आगरा से थोड़ा अधिक दूर हो गया था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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