आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 12 अंतिम)

27 अक्तूबर, 1990 (शनिवार)
लगभग 5 बजे सुबह मेरी नींद खुली। आस-पास और भी लोग बैठे थे तथा कुछ सो रहे थे। मेरा सामान सही सलामत था। वैसे मैंने अपना कपड़े का बैग जिसमें मेरा पासपोर्ट, टिकट, अन्य कागजात और कुछ मालमत्ता था, तकिये की तरह सिर के नीचे लगा रखा था। बाकी सामान की मुझे उतनी चिन्ता नहीं थी।
सबसे पहले बाथरूम में जाकर मैंने कुल्ला-दातुन किया, हाथ-मुँह धोये और शौच से भी निवृत्त हुआ। थोड़ी शौच आने पर मुझे प्रसन्नता हुई, क्योंकि पिछले दिन मैंने कुछ विशेष नहीं खाया था। नहाने का प्रश्न ही नहीं था और कपड़े मैंने इसलिए नहीं बदले कि अभी मुझे एक रात और सोना था तथा मेरे पास केवल एक जोड़ी कपड़े धुले हुए रह गये थे। इसलिए मैंने तय किया कि आज केवल पूरी आस्तीन की जर्सी पहनूँगा तथा कल शर्ट-पैन्ट बदल लूँगा।
एक रात आराम से गुजर जाने पर मुझे संतोष हुआ। मैंने तय किया कि आज दिन भर यहीं बैठे रहना है, क्योंकि इससे सुरक्षित और आरामदायक जगह यहाँ और कोई नहीं है। आस-पास मैंने देख लिया कि वहाँ शाकाहारी खाना कहीं उपलब्ध नहीं है। इसलिए दिन भर मुसम्मी के रस पर रहा। 100 येन के एक सिक्के में एक बोतल (करीब 200 मिलीलीटर) रस आता है। मैंने तीन-तीन घंटे पर वही पिया। सबेरे 9 बजे बचे हुए कुछ बिस्कुट खाये तथा एक बोतल रस पिया। फिर 12 बजे एक बोतल रस लिया। फिर 3 बजे, फिर 6 बजे। भूख बिल्कुल भी मालूम नहीं पड़ी। बीच-बीच में पानी भी पीता रहा। मन कुछ बेचैन रहा, पर धैर्य रखने की कोशिश की।
आज के समय का उपयोग जापान यात्रा की कहानी लिखने में किया। बीच में थोड़ा इधर-उधर से लाये गये अखबार पढ़ता रहा। करीब 12-13 पेज डायरी के लिख लिये। ये शब्द लिखने तक रात्रि के 7 बज चुके हैं यानी मुझे इन्तजार करते-करते पूरे 24 घन्टे गुजर गये। अभी 20 घन्टे और गुजारने हैं। ईश्वर की दया से ये भी सही सलामत गुजर जायें और उड़ान मिल जाये, तब आगे लिखूँगा।
28 अक्तूबर, 1990 (रविवार)
ये पंक्तियाँ मैं टोकियो से दिल्ली की उड़ान में लिख रहा हूँ। मेरी पिछली रात उसी तरह सीटों पर सोते हुए बीती, जैसे इससे पहली रात बीती थी। आज सुबह के समय कुछ ठंडक मालूम पड़ी, हालांकि इतनी नहीं कि कष्ट हो। सुबह 5 बजे उठकर बाथरूम गया। कुल्ला-दातुन किया। दो दिन से नहाया नहीं हूँ, इसलिए कुछ आलस्य अनुभव हो रहा था। परन्तु वहाँ नहाने की कोई सम्भावना नहीं थी, इसलिए मजबूरन हाथ-मुँह धोकर पेन्ट-शर्ट बदल लिये। इस समय यही जोड़ी धुले कपड़ों की मेरे पास रह गयी है। कल दिल्ली या आगरा पहुँचकर नहाऊँगा।
मेरी दो रातें तो इन्तजार करते आसानी से बीत गयीं, परन्तु आज का दिन बिताना मुश्किल लग रहा था। कुछ चिन्ता भी थी कि पता नहीं आज की उड़ान मिलेगी या नहीं। सौभाग्य से वह नौबत नहीं आयी। अल इटालिया का काउन्टर करीब 1 बजे खुला। तब तक मैं कई बार आकर देख गया था कि काउंटर खुला या नहीं खुला। वहाँ कुछ टी.वी. के पर्दे लगे हुए थे। जिन पर प्रत्येक उड़ान की नवीनतम स्थिति की सूचना आती रहती है। उससे मुझे पता चल गया था कि हमारी उड़ान लगभग समय पर होगी। पहले मैंने अपने सभी येन डालरों में बदलवाये। मैं ट्रैवलर्स चेक चाहता था, परन्तु उसने केवल नकद दिये। इससे मुझे कुछ घाटा पड़ा, पर ऐसे घाटे की चिन्ता किसे है? इस समय मेरे पास 100 येन भी नहीं रह गये थे, जिनसे मैं एक बोतल रस भी पी सकता। मैं कुछ सिक्के बचाना भूल गया था। खैर, पानी पीकर काम चलाया।
ठीक 1.15 बजे मैं अल इटालिया के काउन्टर पर गया। सौभाग्य से वहाँ केवल 5 मिनट में मेरा काम हो गया। ये लोग काफी दक्ष होते हैं, खासतौर से जापानी लड़कियों की दक्षता का जवाब नहीं। वहाँ से मैं एमीग्रेशन, कस्टम वगैरह से निबटने गया। उसमें भी मुझे मुश्किल से 10 मिनट लगे। यानी ठीक 1 बज कर 45 मिनट पर मैं लाबी में बैठा हुआ जहाज आने का इन्तजार कर रहा था। वह अपने समय से कुछ देरी से आया, परन्तु चला ठीक समय पर।
दो-तीन दिन से मैंने ठीक से खाना नहीं खाया था। आज उड़ान शुरू होते ही बढ़िया खाना खाने को मिला, जिससे तन-मन तृप्त हो गया। यह जहाज हांगकांग, दिल्ली होता हुआ रोम जायेगा। आज रात को 11ः30 बजे दिल्ली पहुँचूँगा। वहाँ से आगरा पहुँचना पड़ेगा। वहाँ भी थोड़ी मुश्किल होगी। पर अभी तो मैं इसलिए प्रसन्न हूँ कि मैं 48 घंटे की स्वघोषित कैद से मुक्त हूँ। सौभाग्य से मेरा ज्यादा खर्च भी नहीं हुआ। मुश्किल से 300 रुपये का घाटा पड़ा, परन्तु जो मानसिक कष्ट हुआ था, उसकी कोई कीमत नहीं लगायी जा सकती।
रास्ते में हमारा जहाज हांगकांग हवाईअड्डे पर स्थानीय समय के अनुसार रात्रि 8 बजे उतरा। वहाँ लोगों को जहाज ठहरने के समय तक हवाईअड्डे की दुकानों में घूमने की अनुमति है। इसलिए कई लोग जा रहे थे। जहाज के कप्तान वगैरह ने मुझे भी जाने के लिए कहा। मैं चला गया। हमें हवाईअड्डे की इमारत में घुसते समय एक ट्रांजिट पास दिया गया था, जो लौटने में काम आया। वहाँ अनेक विलासिता की वस्तुएँ बिक रही थीं बिना टैक्स तथा ड्यूटी के। लोग जिस तरह उन पर टूटे पड़ रहे थे, उससे मैंने अनुमान लगाया कि ये चीजें सस्ती होनी चाहिए। वहीं कुछ भारतीय भी मिले, जो हांगकांग से दिल्ली लौट रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या ये चीजें वास्तव में सस्ती हैं। उन्होंने भी कहा- ‘हाँ।’ मगर अफसोस कि मैं अपने डालर बैग में जहाज पर ही छोड़ आया था, इसलिए कुछ खरीद नहीं सका।
हांगकांग एक बहुत सुन्दर शहर है। जब हमारा जहाज उतर रहा था, तो मैंने खिड़की से देखा कि वह शहर समुद्र के किनारे पहाड़ों और नदियों के बीच बसा हुआ है। हवाई अड्डा भी समुद्र के ठीक किनारे पर है। समुद्र का लेवल भी ज्यादा नीचा नहीं है, परन्तु मालूम पड़ता है कि उसका पानी हवाई अड्डे पर नहीं आता। मुझे हवाई अड्डे का परिसर पसन्द आया। हांगकांग शीघ्र ही चीनी नियन्त्रण में जाने वाला है। यहाँ की लड़कियां भी जापानी लड़कियों से कम सुन्दर नहीं है। मालूम पड़ता है कि यहाँ भारतीयों की संख्या भी काफी है, क्योंकि यहाँ से अनेक भारतीय दिल्ली के लिए चढ़े हैं। टोकियो से तो मैं अकेला ही भारतीय चढ़ा था। मैंने यह तय किया कि अगली बार हांगकांग, सिंगापुर, बैंकाक की तरफ आने का मौका लगा तो तीनों शहर देखकर ही जाऊँगा। अपने आधे घंटे का समय हांगकांग में बिताने की मुझे बहुत खुशी और संतोष है।
यहाँ भी अल इटालिया के विमान कर्मी एअर इंडिया की तुलना में बहुत ही विनम्र तथा सहयोगात्मक हैं। एअर इंडिया वाले काम देर से करते थे, ये फटाफट करते हैं।
इस समय यहाँ 8ः30 बजे हैं दिल्ली में शायद 6ः30 या 7 बजे होंगे, जबकि जहाज वहाँ 11ः30 बजे पहुँचेगा। यानी कम से कम 5 घंटे की उड़ान और है। पता चला है कि इस उड़ान के दौरान हमें फिर डिनर दिया जायेगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल

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