आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 11)
मेरी सबसे बड़ी समस्या तो हल हो गयी कि दो दिन बाद की उड़ान बुक हो गयी, वह भी बिना कुछ खर्च किये, परन्तु एक नयी समस्या पैदा हो गयी कि ये दो दिन कहाँ गुजारे जायें। इसका सरल हल तो यह था कि किसी होटल में ठहरा जाय, परन्तु वापस टोकियो जाकर मैं रिस्क लेना नहीं चाहता था। इसलिए मैंने सोचा कि यदि पास में ही कोई होटल हो, तो वहाँ ठहर सकता हूँ। मैंने एअरपोर्ट पर पूछ लिया था कि वहाँ कोई वेटिंगरूम नहीं था, केवल लाबियों में कुर्सियाँ पड़ी हुई थीं।
यहाँ होटल बुक करने वाले एजेन्टों के काउन्टर हैं जिन पर कमसिन लड़कियाँ बैठी रहती हैं। मैंने एक लड़की से होटल के बारे में पूछा। बड़ी मुश्किल से उसकी समझ में यह बात आयी कि मैं सुन नहीं सकता, इसलिए लिखकर बात करनी पड़ेगी। उसने बताया कि पास में ही एक होटल में 11000 (जी हाँ ग्यारह हजार) येन प्रतिदिन पर कमरा मिल जायेगा। मेरे पास न तो इतने रुपये फालतू थे और न मैं एक रात सोने के लिए इतना (लगभग 1500 रुपये) खर्च करने को तैयार था। इसलिए मैंने कहा कोई सस्ता होटल बताओ। वह कहने लगी कि यही सबसे सस्ता है।
मैं इतना खर्च करने को तैयार नहीं था। मैंने सोचा कि श्री हिरानो को सूचना दे देना ठीक रहेगा। इसलिए मैंने पूछा कि क्या वह टोकियो में मेरी ओर से एक फोन कर सकती हैं। उसने मना कर दिया। मैंने उसे लालच दिया कि यदि वह फोन कर देगी तो मैं कमरा बुक करा लूँगा। वह मान गयी और मैंने उसे श्री हिरानो के आफिस का नम्बर दिया। उसने मिलाया और न जाने किससे क्या बात की। मैं सोच रहा था कि वह शायद मेरे ठहरने के इन्तजाम के बारे में बातें कर रही होगी। काफी देर बाद उसने फोन रखा। मैंने पूछा कि श्री हिरानो क्या कह रहे थे, तो उसने बताया कि वे बाहर हैं। फिर मैंने पूछा कि उसकी किससे क्या बात हो रही थी, तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और मुझसे कहने लगी कि मैं कमरा बुक करा लूँ। मैं समझ गया कि यह लड़की मेरी मदद कुछ नहीं करना चाहती, केवल अपना कमीशन चाहती है। इसलिए मैं उससे मदद की उम्मीद छोड़कर चला आया।
अब मैंने अपनी बुद्धि से थोड़ा काम लिया। सबसे पहले तो मैंने यह तय किया कि होटल में ठहरने का विचार बिल्कुल छोड़ देना है। मैं पूरे 48 घन्टे यहीं बिता देने को तैयार था, क्योंकि भारत में रेलवे प्लेटफार्मों पर दो-तीन रातें काट देने का मुझे अनुभव था, परन्तु यहाँ के प्लेटफार्मों पर यह भी सम्भव नहीं है। अतः एअरपोर्ट में ही रुकना था। मैंने सोचा कि लाबी में कुर्सियों पर बैठने से तो मुझे कोई रोक नहीं सकता। इसलिए मैं अपना सामान लेकर चौथी मंजिल की लाबी में गया। वहीं से उड़ानें बाहर जाती हैं।
वहाँ और भी कई लोग बैठे थे। मैंने एक कुर्सी के पास अपना सामान रख दिया और सबसे पहले पास के एक बाथरूम में जाकर अपना मूत्र त्याग किया, जो मैंने कई घंटे से रोक रखा था। वहीं मैंने हाथ-मुँह धोकर अंजुली से पेट भरकर पानी पिया। फिर वापस लाबी में बैठकर सोचने लगा।
सबसे पहले तो मैंने यह तय किया कि यदि किसी ने उठाया नहीं तो मैं कम-से-कम एक रात यहीं बैठकर काट दूंगा। सामान की चोरी का मुझे कोई डर नहीं था। मैंने यह भी सोच लिया कि अगर यह रात आसानी से गुजर गयी, तो दूसरी रात भी यहीं काट दूँगा, नहीं तो सुबह कोई होटल देखूँगा। इस तरह मैं कम-से-कम एक रात का खर्च जरूर बचा सकता था। सबसे ज्यादा चिन्ता मुझे घर की थी। मैं उनसे कह आया था कि मैं 26 को आगरा आ जाऊँगा। अगर मैं तब तक न आया तो वे परेशान होकर पूछताछ करेंगे और जब उन्हें पता चलेगा कि मैं अपनी उड़ान नहीं पकड़ पाया, तो बहुत परेशान हो जायेंगे। परन्तु मैं इस बात से थोड़ा निश्चिन्त था कि पूछताछ से उन्हें यह तो पता चल ही जायेगा कि मेरे लिए 28 तारीख की अगली उड़ान बुक हुई है। यहाँ से भारत फोन करना आसान है, परन्तु अपने दुर्भाग्य के कारण मैं उनसे बात भी नहीं कर सकता था। इसलिए मैं सब कुछ ईश्वर के भरोसे छोड़कर सोने की कोशिश करने लगा।
तभी मेरी भूख ने हल्ला बोला। दोपहर को चिप्स के बाद मैंने कुछ खाया नहीं था। मेरे पास थोड़े बिस्कुट थे। मैंने सोचा कि अगर यहाँ भी पेय बेचने की मशीनें लगी हों तो बड़ा काम चले। थोड़ा ढूँढ़ने पर मुझे एक मशीन ऊपर लगी मिल गयी। उसमें से मैं 150 येन डालकर कोकाकोला का एक डिब्बा लाया। थोड़े से बिस्कुट और एक बोतल कोकाकोला ही उस दिन मेरा रात का भोजन बना, जिससे मुझे कुछ तृप्ति हुई। मैंने यह भी तय कर लिया कि कल का दिन केवल मुसम्मी का रस पीकर काट देना है। थकान के कारण मुझे थोड़ी ही देर में बैठे-बैठे नींद आने लगी।
मुझे अपनी पत्नी वीनू तथा अपने एक महीने के बेटे की बहुत याद आ रही थी। कहाँ तो मैं सोच रहा था कि उड़ान में बढ़िया खाना खाकर सोऊँगा और रात 12 बजे तक दिल्ली पहुँच जाऊँगा और कहाँ यहाँ पर तिरस्कृत/उपेक्षित सा बैठा हूँ। मैंने सोचा शायद ईश्वर मेरी परीक्षा ले रहा है। यह सब सोचते-सोचते मैं सो गया।
मुझे सोये हुए मुश्किल से आधा ही घंटा हुआ होगा कि एक पुलिस वाले ने आकर मुझे जगा दिया। मैंने उससे कहा कि मैं अपनी फ्लाइट का इन्तजार कर रहा हूँ, तो वह बोला कि नीचे पहली मंजिल पर जाकर बैठो। मैंने कहा- ‘ठीक है।’ परन्तु मैं इतनी आसानी से वह आरामदायक जगह छोड़ने को तैयार नहीं था। इसलिए मैं सामान वहीं छोड़कर पहले नीचे देखने गया कि वास्तव में वहाँ कोई जगह है या नहीं। वहाँ मैंने देखा कि बड़ी अच्छी जगह कुर्सियाँ लगी हैं। उन पर और भी कुछ मेरे जैसे ही लोग बैठे थे, जिनकी उड़ान अगले दिन थी। पास में ही पेय की मशीन लगी थी जिसमें केवल 100 येन में एक डिब्बा मिल जाता था, जबकि ऊपर वाली मशीन में 150 येन में मिलता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि वहाँ चौथी मंजिल की तुलना में ठंड भी कम थी, इससे मुझे आराम था, क्योंकि मेरे पास ओढ़ने के लिए कोई चादर भी नहीं थी। इसलिए मैं ऊपर जाकर अपना सामान ले आया और एक कुर्सी के बगल में सामान रखकर दो-तीन कुर्सियों पर लम्बा होकर सो गया।
करीब रात को 12 बजे एक पुलिस अधिकारी ने मुझे जगाया। अब मैं मन-ही-मन घबराया कि कहीं यह बाहर न भगा दे। परन्तु उसने केवल मेरा तथा दूसरे सभी लोगों का भी पासपोर्ट देखा और नाम नोट करके चला गया। वास्तव में वह केवल यह देखने आया था कि यहाँ कोई गलत आदमी तो नहीं बैठा है। उसकी यह बात मेरे हित में गयी, क्योंकि अब मुझे चोरी का बिल्कुल डर नहीं था और न किसी के द्वारा टोके जाने की चिन्ता थी। इसलिए मैं निश्चिन्त होकर सो गया और प्रातः 5 बजे तक सोता रहा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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