आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 10)

26 अक्तूबर, 1990 (शुक्रवार)
आज हमारा टोकियो में अन्तिम दिन था। मेरी उड़ान इटालियन एयरलाइन्स अलइटालिया के साथ बुक थी, जो रात 7 बजे जाती थी। इसलिए मैंने होटल से एअरपोर्ट तक जाने के लिए बस में सीट बुक कर ली। वह बस 3.15 बजे दोपहर बाद जाती थी और 5 बजे हवाई अड्डे पहुँचा देती थी। मैंने सोचा कि अगर थोड़ा बहुत लेट भी हो गयी, तो 5.30 या हद से हद 6 बजे तक वहाँ पहुंच जाऊंगा और उड़ान पकड़ लूँगा।
मेरे पास तीन बजे तक का समय था। मेरा विचार माउन्ट फूजी देख लेने का था, जो वहाँ से काफी दूर थी। पता चला कि अगर गये तो तीन बजे तक लौटना सम्भव नहीं होगा और फ्लाइट छूट जायेगी, इसलिए यह विचार त्याग दिया। श्री वी.के. गुप्ता जो उसी उड़ान में मेरे साथ दिल्ली जाने वाले थे प्रेसीडेन्ट होटल में ठहरे थे। उनका विचार अगले दिन खरीदारी करने का था। इसलिए हमने यह तय किया कि मैं प्रातः 9 बजे तक उनके होटल में आ जाऊँगा और वहाँ से साथ चलेंगे।
परन्तु इस दिन कुछ बारिश हुई और मौसम जरा ठंडा था इसलिए मैं नहीं जा पाया। करीब 8 बजे जब मौसम खुला तो मैं निकला। मेरा विचार तो प्रेसीडेन्ट होटल जाने का था, परन्तु अकेला होने के कारण मैं गलत गाड़ी में चढ़ गया और कहीं का कहीं पहुँच गया। अब प्रेसीडेन्ट होटल जाने का सवाल ही नहीं था इसलिए, मैं उसी लाइन पर वापस आया और अपने होटल में पहुँच गया। मेरा विचार वहाँ बैठकर लिखने का था, ताकि समय का कुछ तो उपयोग हो सके।
मैंने लिखना शुरू किया। मुश्किल से 11ः30 बजे होंगे कि होटल का एक लड़का वहाँ आया और पूछा कि मैं कमरा कब खाली करूँगा। मैंने बताया कि मैं तीन बजे बस से एअरपोर्ट जाऊँगा, इसलिए 2 बजे कमरा खाली कर दूँगा।
उसने पहले अपने होटल के काउन्टर पर कुछ बात की, फिर मुझसे बोला कि वहाँ बात कर लो। मैं फोन पर बात कर नहीं सकता था, अतः उसके साथ नीचे गया। वहाँ रिसेप्शन पर एक अंग्रेजी जानने वाली लड़की ने मुझसे लिखकर कहा कि सी.आई.सी.सी. ने 5 दिन का किराया दिया है, जिसका समय 11 बजे खत्म हो गया है। अतः यदि मैं 2 बजे खाली करूँगा, तो 33 प्रतिशत किराया देना पड़ेगा। मैं इतने समय के लिए करीब 500 रुपये खर्च करने को तैयार नहीं था, इसलिए मैंने कहा कि कमरा मैं तुरन्त खाली कर सकता हूँ। इसके लिए वह तैयार हो गयी और मैं अपना सामान जो प्रायः बंधा रखा था, लेकर आ गया और चाबी उसे सोंप दी। मैंने कुछ और सेवा ली नहीं थी, इसलिए और कुछ देना नहीं था।
अब मुझे लगभग साढ़े 3 घंटे गुजारने थे। मैंने अपने दोनों बक्स (अटैची) वहीं जमा कर दिये जो कि बस में जाने थे और शेष एक थैले तथा कैमरे को लेकर बाहर निकला। मेरा विचार इधर-उधर चक्कर मारने का था। पहले मैं शहर की ओर गया। काफी दूर तक पैदल चला। पुलों पर चढ़ा। इधर-उधर दो चार फोटो खींचे। एक जगह बच्चे स्कूल जा रहे थे या शायद लौट रहे थे। उनके साथ एक टीचर भी थी। बच्चों के पास कोई वर्दी नहीं थी, परन्तु सबने एक जैसे एक ही रंग के हैट लगा रखे थे। उनकी लाइन बड़ी अच्छी लग रही थी। यहाँ के बच्चे वैसे भी काफी सुन्दर होते हैं। मैंने उनके भी फोटो खींचे। एक औरत अपने बच्चे को गाड़ी में ले जा रही थी। मैंने उसका भी फोटो खींच लिया।
वहीं घूमते-घामते मैंने एक रेस्तरां में चिप्स खाये। यह चौकोर फली जैसे होते हैं तथा आलू के बनते हैं। (उनका नाम फ्रेंच फ्राई मुझे बहुत बाद में पता चला।) 240 येन देकर एक पैकेट चिप्स लिये। मैंने वाटर कहकर पानी माँगा, तो वह नहीं समझ पायी। मिईजी कहने पर उसकी समझ में आ गया और वह एक गिलास पानी बर्फ डालकर ले आयी। चिप्स खाकर और पानी पीकर मैंने अपना पेट भरा।
वहाँ से मैं अपने होटल तक आया। तब तक मात्र एक बजकर 30 मिनट हुए थे, इसलिए मुझे अभी डेढ़ घंटा और बिताना था। इसलिए मैं अब दूसरी ओर निकला। वहाँ एक पुल से शहर का दृश्य अच्छा लगता था। मैंने वहाँ दो चार फोटो खींचे। एक जगह चौकोर पत्थर लगे थे। कुछ देर वहाँ बैठा और अन्त में एक चक्कर काटकर वापस आया। ठीक 3 बजे मैं होटल में आ गया और जो आदमी बस में बैठाने वाला था और जहाँ मेरा सामान रखा था, उनको बता दिया कि मैं यहाँ इन्तजार कर रहा हूँ।
बस ठीक 3ः20 बजे आयी। मैं बैठ गया। अपने होटल से मैं अकेला ही बैठा था। दूसरी सवारियां उसे दूसरे होटलों से लेनी थीं, जो आसपास ही हैं। जब बस चली तो मैं निश्चिन्त था कि 5 बजे एअरपोर्ट पहुंच जाऊँगा। लेकिन रास्ते में बस न केवल धीमी हो गयी बल्कि एकदम रुक गयी। जब काफी देर तक बस न चली तो मैं घबराया क्या बात है। पता चला कि आगे चुंगी की वजह से ट्रैफिक जाम है। चुंगी तक पहुंचते-पहुंचते 5ः30 बज गये। अब मैं घबराया कि अगर 6 बजे तक भी बस एयरपोर्ट तक नहीं पहुंची, तो मेरी उड़ान छूट जायेगी। बस वाले ने बस पूरी स्पीड पर भगाई़, परन्तु एअर पोर्ट वहाँ से 65 कि.मी. दूर था। इसलिए खूब तेज चलने पर भी हम 6ः20 बजे एअरपोर्ट पहुंचे। सामान लेकर मैं उसके भीतर घुसा।
एअरपोर्ट मेरे लिए नया था और जब तक मैं पूछ-पूछकर अलइटालिया के चैक इन काउन्टर पर पहुँचा, तब तक वह बन्द हो चुका था, यानी मेरी फ्लाइट छूट चुकी थी। जिसका मुझे डर था वही हुआ। अब मैं बहुत घबराया। मैं वहाँ सात समुन्दर पार घोर परदेस में किसी को जानता भी नहीं था। एक श्री हिरानो थे जो वहाँ से 80 कि.मी. दूर बैठे थे। मैं अपनी कानों की बीमारी के कारण किसी से फोन पर भी किसी से बात नहीं कर सकता था। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?
पहले मैं एअरपोर्ट के सूचना काउन्टर पर गया। वहाँ एक लड़की कम्प्यूटर लिये बैठी थी। उसमें उड़ान की नवीनतम जानकारी आ रही थी। मैंने अपनी समस्या उसे बतायी। उसने कम्प्यूटर देखकर बताया कि वह जहाज उड़ने ही वाला है। देखते-देखते जहाज उड़ गया और कम्प्यूटर पर भी आ गया। मैंने उससे पूछा कि अब क्या करूँ? पहले उसने अलइटालिया के ऑफिस से कुछ बात की, फिर मुझे उसका पता बताया और वहाँ जाने की राय दी।
थोड़ा भटकने के बाद मैं अलइटालिया के ऑफिस में पहुँचा। मैंने अपनी समस्या बतायी, तो उन्होंने न घबराने की राय दी। मैं जानता था कि वे अगली फ्लाइट दे सकते हैं, परन्तु मुझे डर था कि वे उसकी कीमत मांगेंगे, जो मैं दे नहीं सकता था। परन्तु सौभाग्य से उन्होंने कुछ नहीं मांगा और मेरे नाम 28 तारीख की उड़ान बुक कर दी। 27 तारीख को कोई उड़ान दिल्ली के लिए नहीं थी, इसलिए मुझे पूरे 48 घंटे इन्तजार करना था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल

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