आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 1)
कम्प्यूटर मेरा प्रिय विषय है। यह वास्तव में गणित की ही एक विकसित शाखा है। गणित में मेरी प्राकृतिक रुचि होने के कारण कम्प्यूटरों में भी मेरी रुचि बनी। मैं इसके लिए एम.स्टेट. के अपने शिक्षक श्री ब्रजेन्द्र कुमार लहरी का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने इनसे मेरा परिचय कराया। उस समय मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह विषय मुझे कभी विदेश यात्रा का सौभाग्य दिलायेगा।
मेरी जापान यात्रा अथवा पहली विदेश यात्रा की कहानी का सही प्रारम्भ सन् 1987 से मानना चाहिए, जब जापान के एक प्रतिष्ठित संस्थान ‘कम्प्यूटरीकरण हेतु अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग केन्द्र’ (सी.आई.सी.सी.) ने एक निबन्ध प्रतियोगिता आयोजित की थी। उसका विषय था- ‘किन तरीकों से आपके देश में कम्प्यूटरीकरण आगे बढ़ाया जा सकता है।’ उस समय मैं लखनऊ में हिन्दुस्तान ऐरोनाॅटिक्स लि. में कम्प्यूटर अनुभाग में अधिकारी था। मेरे पास ज्यादा सोचने-विचारने का समय नहीं था, अतः मैंने यही ठीक समझा कि आवश्यक योग्यता के पेशेवरकर्मी जैसे प्रोग्रामर, सिस्टम एनालिस्ट आदि पर्याप्त संख्या में होने पर कम्प्यूटरीकरण का विस्तार किया जा सकता है। अतः इस विषय पर मैंने लेख भेजना तय किया।
मैंने उस लेख पर काफी मेहनत की। एक पत्रिका डाटा क्वेस्ट में कुछ महीने पहले इसी विषय पर विस्तृत जानकारी निकली थी, मैंने उसका भी जी भरकर उपयोग किया तथा कई अन्य लेखों/पुस्तकों का सन्दर्भ भी दिया। मैंने उस लेख पर 15-20 दिन तक मेहनत की। उससे भी ज्यादा मेहनत से उसे स्वयं कम्प्यूटर पर टाइप किया और छपवाया। यद्यपि मैं उसकी भाषा में ज्यादा सुधार न कर सका, क्योंकि समय कम था। फिर भी किसी तरह तैयार करके समय पर भेज दिया।
भेजने के बाद मैं उसे भूल ही गया था कि एक दिन मुझे एक पत्र प्राप्त हुआ। वह जापान के उसी केन्द्र से आया था। उसमें सूचना दी गयी थी कि यद्यपि मेरा लेख किसी विशेष पुरस्कार के योग्य नहीं समझा गया है, किन्तु उस पर यादगार के रूप में एक कैलकुलेटर देना तय किया गया है। मुझे बड़ी खुशी हुई। दो महीने बाद ही वह कैलकुलेटर आ पहुँचा। दो महीने इसलिए लग गये थे कि वह समुद्री रास्ते से आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए पधारा था।
उस कैलकुलेटर के आने के बाद मेरी धूम मच गयी। लोग बड़े लालच से उसे देखते थे। तब मैंने अपना लेख जरा ध्यान से पढ़ा और फालतू-असंगत बातों को काटकर छोटा किया, तो मैंने अनुभव किया कि अगर मैं इसे एक बार और सुधार देता, तो मुझे कोई बड़ा इनाम अवश्य मिल जाता। खैर मैंने मन ही मन तय किया कि अगली बार इस अवसर का पूरा लाभ उठाऊँगा। लेकिन अगली दो प्रतियोगिताओं में मैं भाग नहीं ले सका, क्योंकि उनकी सूचना मेरे पास देर से पहुंची। इसी बीच मैंने एच.ए.एल. छोड़ दिया। साथ ही मेरा विवाह भी हो गया और लिखना-पढ़ना बिल्कुल बन्द।
तभी जुलाई, 1990 माह की कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया की मासिक पत्रिका सी.एस.आई. कम्प्यूनिकेशन्स मेरे पास लगभग 20 जुलाई को आयी, जिसमें इस प्रतियोगिता को पुनः आयोजित करने की घोषणा की गयी थी। लेख भेजने की अन्तिम तिथि 10 अगस्त थी। समय पर्याप्त था। अतः मैंने इसका लाभ उठाना तय किया। सबसे पहले तो मैंने अपनी श्रीमतीजी से सहयोग माँगा, क्योंकि यह कार्य मनोयोग से करने के लिए एकाग्रता आवश्यक थी। मैंने उन्हें बताया कि इस बार जापान जाने का मौका मिल सकता है, क्योंकि मेरे पास कुछ ऐसे विचार हैं, जिन्हें यदि मैं लिखकर भेज दूँ, तो लोग बहुत पसन्द करेंगे। मैंने यह भी कहा कि पिछली बार मुझे कैलकुलेटर इनाम में मिला था। इस बार अगर जापान घूमने का मौका न भी मिला, तो कैलकुलेटर से बड़ा कोई न कोई इनाम अवश्य मिल जायेगा। शायद इसी लालच में वे मान गयीं और मुझे काम से न रोकने का वादा किया। मैंने यह भी जोड़ दिया कि शादी के बाद मैं पहली बार कलम उठाऊँगा, तो हो सकता है तुम्हारे भाग्य से मुझे जापान जाने का अवसर मिल जाये। इस पर वे और प्रसन्न हो गयीं।
मेरा विचार 20 जुलाई से कार्य प्रारम्भ करके 25 जुलाई तक पूर्ण कर लेना था और आवश्यक होने पर संशोधन करके 30 जुलाई को हर हालत में लेख डाक में डाल देना था। परन्तु उन दिनों ऑफिस का काम ज्यादा रहता है, इसलिए मैं 23 तारीख तक तो कुछ कर ही नहीं पाया और 24 जुलाई से ही कार्य प्रारम्भ किया।
प्रारम्भ में मेरे दिमाग में लेख का स्वरूप स्पष्ट नहीं था। केवल यही सोचा था कि हिन्दी कम्प्यूटरों की आवश्यकता पर बल देना है तथा कुछ तकनीकी विचार भी देने हैं। साथ ही मैंने यह भी तय किया कि इस बार किसी लेख या पुस्तक का कोई सन्दर्भ नहीं देना है, ताकि लेख पूरी तरह मौलिक लगे। वास्तव में यह एक नया विषय था और इस पर किसी सन्दर्भ की कोई सम्भावना भी नहीं थी।
पहले दिन के कार्य से मुझे सन्तोष हुआ। लेख की रूपरेखा कुछ स्पष्ट हुई तथा मेरे दिमाग के विचारों को भी दिशा मिली। यद्यपि पहले दिन मैं केवल एक बटा छः भाग कार्य ही कर पाया। परन्तु कहावत है कि हजारों मील की यात्रा पहले कदम के साथ शुरू हो जाती है, अतः शुरूआत हुई यही बड़े सन्तोष की बात थी। मैंने श्रीमती जी को बताया कि लेख मेरी उम्मीद से भी अधिक अच्छा होने जा रहा है। दूसरे दिन मैंने फिर कार्य किया। पहले दिन के लिखे हुए में थोड़ा संशोधन किया और आगे लिखा।
अब तक एक तिहाई से अधिक काम पूरा हो चुका था। मैं काफी आश्वस्त था। तीसरे दिन कुछ ज्यादा लिखा और चौथे दिन काम पूरा कर लिया। पूरा लेख करीब 10 पृष्ठों का था, जबकि सीमा 16 पृष्ठों की थी। परन्तु मैंने पहले ही तय कर लिया था कि उसमें अनावश्यक बातें नहीं दूँगा, चाहे लेख छोटा ही हो, क्योंकि अनावश्यक बातों से एक तो लेख बोझिल हो जाता है, दूसरे उसकी भाषा का प्रवाह बिगड़ जाने का डर रहता है।
27 जुलाई को मेरा पूरा लेख लिखकर तैयार हो गया। अब इसको कम्प्यूटर में प्रविष्ट करके छपवाना था। साथ ही मुझे इसमें काफी संशोधन भी करने थे। समय बहुत कम रह गया था। अतः मैंने कार्य इस प्रकार करना तय किया कि दिन में कम्प्यूटर में टाइप करता था और रात को घर पर पूरे लेख में सुधार करता था। करीब तीन बार लेख का हुलिया बदला गया और ठीक 31 जुलाई को लेख अन्तिम रूप से तैयार हो गया। परन्तु उस दिन मैं उसे छपवा नहीं सका। अतः यह सोचा कि यह कार्य कल पूरा करके डाक से भेज दूँगा।
अगले दिन एक अगस्त थी। ऑफिस में काफी काम था। उससे अगले दिन छुट्टी थी इसलिए छपवा तो लिया, लेकिन काम पूरा करते-करते सायं के 5 बज गये। डाकघर में रजिस्ट्री 3 बजे तक होती थी। सोचा रेलवे मेल सर्विस से रजिस्ट्री कर दूँगा। रजिस्ट्री करने को तो वे तैयार थे, परन्तु उनके पास डाक टिकट नहीं थे। मजबूरीवश मुझे 3 अगस्त का इन्तजार करना पड़ा। डर था कि कहीं लेट न हो जाये, परन्तु और कोई चारा नहीं था। इसलिए स्वयं जाकर 10 बजे ही रजिस्ट्री कर आया, जिसमें 23 रुपये लगे। एक बात का मुझे संतोष था कि लेख मेरी अपेक्षा के अनुरूप ही बन पड़ा था, यद्यपि उसमें सुधार की अभी भी काफी गुंजाइश थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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