आत्मकथा भाग-2 अंश-9
उस समय तक किरण की उम्र 25 को पार कर गयी थी और उनके चेहरे पर कुछ रूखापन सा आने लगा था। तभी एक अच्छे कायस्थ परिवार में उनका विवाह हो गया। लड़का मैरीन इंजीनियर था, जो साल में 10 महीने पानी के जहाज (शिप) पर रहता था और 2 महीने की छुट्टी पर घर आता था। उनका नाम मुझे याद है- श्री अमिताभ माथुर। उनकी शादी लखनऊ के पंचतारा होटल क्लार्क्स अवध में हुई थी, जिसमें प्रति थाली रु. 500 का खाना था। शायद खर्च बचाने के लिए ही उन्होंने हमारे सेक्शन से किसी को ठीक से नहीं बुलाया, केवल एक कार्ड भिजवा दिया था। इसलिए कोई भी उनके विवाह में नहीं गया।
लेकिन विवाह के बाद जो रिसेप्शन हुआ, उसमें उन्होंने हम सभी को आग्रहपूर्वक आमंत्रित किया। अतः हम सब उसमें गये थे। वहीं उनके पति से हमारा परिचय हुआ। शादी के एक साल के अन्दर ही वे एक सुन्दर प्यारी सी बच्ची की माँ बन गयी थीं। जब मेरी बहिन गीता और मम्मी मेरे साथ लखनऊ में थीं, तो किरण एक-दो बार हमारे घर भी आयी थीं।
जब उनकी बच्ची थोड़ी बड़ी हुई और स्कूल भी जाने लगी, तो उनके लिए नौकरी करना कठिन हो गया, क्योंकि उनकी सास को कैंसर था। वे लगातार छुट्टियों पर चल रही थीं। वे एच.ए.एल. छोड़ना चाहती थीं, परन्तु उन्होंने 5 साल का बाॅण्ड भर रखा था, इसलिए इतने दिनों तक नौकरी करना अनिवार्य था, नहीं तो बड़ी रकम देनी पड़ती। वे रकम देना नहीं चाहती थीं, इसलिए बिना वेतन के छुट्टी पर चलती रहीं। अन्त में एच.ए.एल. ने ही उन्हें बाॅण्ड से मुक्त कर दिया और वे चली गयीं। उसके बाद मेरी उनसे मुलाकात नहीं हुई। बाद में मैंने भी एच.ए.एल. छोड़ दिया था। कुछ समय बाद मुझे पता चला कि किरण अपने मुसलमान जीजा के पास कनाडा चली गयी हैं। बाद में शायद वे वापस आ गयीं। अब कहाँ हैं, मुझे ज्ञात नहीं। शायद लखनऊ में ही हों।
शादी के बाद जब उनके पति वापस शिप पर चले गये थे, तो वे कार से ऑफिस आती थीं। कार ड्राइवर चलाता था। एक बार मैंने मजाक में कहा था- ‘तुम ड्राइवर के साथ मत आया करो, नहीं तो किसी दिन वह कार और तुम्हें दोनों को ले भागेगा। 50 हजार की तो कार और 50 हजार की तुम। एक लाख किसको बुरे लगते हैं?’ उनकी प्रतिक्रिया थी- ‘मैं बस 50 हजार की? बस??’
एक मजेदार बात और है। ऊपर मैं बता चुका हूँ कि हमारे सेक्शन में अधिकारियों और ऑपरेटरों की संख्या काफी थी, परन्तु कम्प्यूटर टर्मिनल कम थे। इसलिए जब मैं जनरल शिफ्ट में जाता था, तो मुझे कम्प्यूटर खाली मिलना मुश्किल होता था। काम बहुत अर्जेण्ट होने पर ही कम्प्यूटर मुझे दिया जाता था। लेकिन इस समस्या का एक हल मैंने निकाल लिया। वह यह कि हर शिफ्ट के लोग प्रायः 1 घंटे बाद काम शुरू करते थे और अपनी शिफ्ट समाप्त होने से एक घंटे पहले ही काम बन्द कर देते थे। इसी तरह लंच के पहले और उसके बाद भी आध-पौन घंटा बरबाद करते थे। इस प्रकार दोपहर साढ़े बारह बजे के बाद कोई न कोई कम्प्यूटर अवश्य खाली रहता था।
इसलिए मैंने अपने मैनेजर श्री रमेश राव की आज्ञा से दोपहर साढ़े बारह या एक बजे जाना प्रारम्भ किया और सायं सात या साढ़े सात बजे तक काम करके लौटता था। इस तरह मैंने 1 बजे से साढ़े सात बजे तक की एक नई शिफ्ट बना ली थी। इसको मैं ‘के’ शिफ्ट कहता था। यहाँ ‘के’ का अर्थ था ‘किरण’ अर्थात् गुड़िया। मैं कई महीनों तक लगातार ‘के’ शिफ्ट में जाता रहा। इस शिफ्ट में काम भी ज्यादा होता था। बाद में जब काम का बोझ कम हो गया, तो मैंने ‘के’ शिफ्ट में जाना बन्द कर दिया और जनरल शिफ्ट में जाने लगा।
(पादटीप- बहुत बाद में मैंने श्रीमती किरण माथुर को फेसबुक पर खोज लिया और मैसेज भेजा। उन्होंने उत्तर भी दिया। पता चला कि भाग्य ने उनके साथ बहुत क्रूर मजाक किया है। उनके पति श्री अमिताभ को उनके सगे भतीजे ने बिजली का करेंट लगाकर मार दिया और उसे दुर्घटना का रूप दे दिया। किरण कई साल तक रोती रहीं, फिर सँभल गयीं। उनके अब दो पुत्रियाँ हैं। बड़ी का विवाह हो चुका है। किरण भी कुछ काम करती हैं, परन्तु इस समय कैंसर से पीड़ित हैं और एक बार ऑपरेशन हो चुका है। वे सभी अमेरिका में हैं और वहाँ के नागरिक हैं। मेरे साथ उनका सम्पर्क बना हुआ है, पर मिलने का अवसर अभी तक नहीं मिला। सूचना के लिए बता दूँ कि किरण अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की सगी मौसी हैं।)
(पादटीप- बहुत बाद में मैंने श्रीमती किरण माथुर को फेसबुक पर खोज लिया और मैसेज भेजा। उन्होंने उत्तर भी दिया। पता चला कि भाग्य ने उनके साथ बहुत क्रूर मजाक किया है। उनके पति श्री अमिताभ को उनके सगे भतीजे ने बिजली का करेंट लगाकर मार दिया और उसे दुर्घटना का रूप दे दिया। किरण कई साल तक रोती रहीं, फिर सँभल गयीं। उनके अब दो पुत्रियाँ हैं। बड़ी का विवाह हो चुका है। किरण भी कुछ काम करती हैं, परन्तु इस समय कैंसर से पीड़ित हैं और एक बार ऑपरेशन हो चुका है। वे सभी अमेरिका में हैं और वहाँ के नागरिक हैं। मेरे साथ उनका सम्पर्क बना हुआ है, पर मिलने का अवसर अभी तक नहीं मिला। सूचना के लिए बता दूँ कि किरण अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की सगी मौसी हैं।)
मैं बता चुका हूँ कि हमारे सेक्शन के भवन में कोरबा डिवीजन (जिला अमेठी) के दो अधिकारी भी बैठते थे। वे थे श्री अजय अग्रवाल और श्री राजीव श्रीवास्तव। दोनों बहुत मस्तमौला आदमी थे, चुटकुले सुनाने में माहिर थे। खास तौर से अजय अग्रवाल लगभग हर हफ्ते या 15 दिन में एक धाँसू चुटकुला लाते थे (जाने कहाँ से) और अपनी विशेष स्टाइल में सुनाते थे, तो सब लोटपोट हो जाते थे और कई दिनों तक हँसते रहते थे। जैसा कि स्वाभाविक है, उनके चुटकुलों में कुछ अश्लीलता का पुट होता था। मैंने उनके सुनाए हुए चुटकुले एक अलग काॅपी में लिख रखे थे, परन्तु वह काॅपी अब कहीं खो गयी है या शायद मैंने ही फेंक दी है।
अजय अग्रवाल का विवाह तब हुआ था, जब मैं एच.ए.एल. में नया-नया आया था। उस समय तक उनसे ठीक से परिचित नहीं था, लेकिन दूसरे अफसरों के साथ मैं भी उनकी बारात में शामिल हुआ था और डांस भी किया था। उनकी पत्नी कायमगंज की रहने वाली हैं और मेरे पत्र-मित्र श्री सुशील कुमार अग्रवाल को जानती हैं, जिनका उल्लेख में पिछले भाग में कर चुका हूँ।
राजीव श्रीवास्तव का विवाह बाद में हुआ था, पर लखनऊ से काफी दूर। इसलिए बारात में कोई नहीं गया था, परन्तु उनके रिसेप्शन में हम सब शामिल हुए थे। उस समय हमने यह नियम बनाया था कि जिसका विवाह होता था, उसको सबकी ओर से पार्टी दी जाती थी। सबसे पहले शशिकांत लोकरस, फिर आलोक खरे, फिर संजय मेहता, फिर जी.के. गुप्ता को ऐसी पार्टी दी गयी थी। लेकिन राजीव श्रीवास्तव को पार्टी नहीं दी गयी, तो मुझे बहुत बुरा लगा था।
बाद में कोरबा डिवीजन पूरी बन जाने पर अजय अग्रवाल, राजीव श्रीवास्तव और उनके सभी ऑपरेटर साथी हमारे सेक्शन से कोरबा चले गये थे। कई साल बाद जब मैं वाराणसी में था और एक बार अपने बैंक के काम से अमेठी गया था, तो पता चला कि एच.ए.एल. का कोरबा डिवीजन वहाँ से केवल 7-8 किमी दूर है। मैं समय निकालकर टैम्पो से कोरबा पहुँच गया। मैं खास तौर से अजय अग्रवाल से मिलने और उनके चुटकुले सुनने गया था, परन्तु संयोग से उस दिन वे छुट्टी पर थे। राजीव श्रीवास्तव सहित बाकी सभी से मेरी मुलाकात हुई थी। सभी मुझसे मिलकर बहुत खुश हुए थे। राजीव श्रीवास्तव के यहाँ मैंने दोपहर का खाना भी खाया था। उनकी पत्नी श्रीमती वन्दना ने बहुत अच्छा खाना बनाया था। इसके बाद उन लोगों से अभी तक मेरी मुलाकात नहीं हुई है।
हमारे सेक्शन के अधिकारियों में बहुत ही आत्मीय और पारिवारिक सम्बंध बन गये थे। प्रारम्भ में कुछ लोग ही शादीशुदा थे। उनके परिवारों का मिलन पहली बार श्री राकेश कुमार श्रीवास्तव के यहाँ उनकी पुत्री प्रुडी के जन्मदिन की पहली वर्षगाँठ पर हुआ था। वहाँ बाजपेयी जी को छोड़कर सभी विवाहित अधिकारी सपरिवार आये थे। उसके बाद जहाँ भी किसी अधिकारी के यहाँ कोई कार्यक्रम होता था, तो सबका मिलन हो जाता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें