आत्मकथा भाग-2 अंश-22

इसी बीच एच.ए.एल. से मेरा मोह भंग होने लगा था। प्रमुख कारण यह था कि वहाँ विकास के अधिक अवसर नहीं थे। वैसे भी कम्प्यूटर वालों को दो-चार साल बाद नौकरियाँ बदलते रहने से फायदा होता है। मेरे कई साथी अफसर एक-एक करके एच.ए.एल. छोड़कर जा रहे थे। मैंने भी इधर-उधर आवेदन भेजना शुरू कर दिया। कई जगह से इंटरव्यू काॅल भी आया। परन्तु प्राइवेट कम्पनी वाले मेरी कानों की बीमारी के कारण मुझे लेने में हिचकते थे। मैंने बजाज ऑटो लि. पुणे में आवेदन किया था। उनकी लिखित परीक्षा दिल्ली में हुई थी, उसमें भी मैं उत्तीर्ण हो गया था। इंटरव्यू के लिए मेरे पास वहाँ से तीन बार काॅल आया। परन्तु इंटरव्यू बैंगलौर में था, इसलिए मैं नहीं गया। वास्तव में मैं कोई अच्छी सरकारी नौकरी चाहता था, इसलिए मौके की प्रतीक्षा करता रहा।
सन् 1987 के आसपास मेरे ज.ने.वि. के सहपाठी पी. कृष्ण प्रसाद ने विशाखापटनम् में एक कम्पनी बना ली थी। वह चाहता था कि मैं आकर उसकी कम्पनी का काम सँभाल लूँ। मेरा भी विचार था कि दो-तीन माह एच.ए.एल. से छुट्टी लेकर विशाखापटनम् चला जाऊँ और देख लूँ कि मेरा काम जम सकता है या नहीं। के.पी. ने दो-तीन तार मुझे बुलाने के लिए भेजे थे, परन्तु मेरे घर वालों ने कड़ाई से मना कर दिया। इसलिए मामला वहीं खत्म हो गया। के.पी. को निराश करने पर मुझे बहुत दुःख हुआ, परन्तु क्या किया जा सकता था?
तभी कुछ ऐसी घटनाएँ घट गयीं कि एच.ए.एल. से मैं बुरी तरह रुष्ट हो गया। हुआ यह कि भारत सरकार की ओर से ब्रिटेन में पढ़ाई हेतु काॅमनवैल्थ स्काॅलरशिप के लिए आवेदन माँगे गये थे। मैंने उसमें आवेदन भेजा था। उसमें एक शर्त यह थी कि आवेदनकर्ता को अपने वर्तमान नियोक्ता से अनापत्ति प्रमाणपत्र (No objection certificate) जमा करना होगा। मैंने अपना आवेदन तो सीधे भेज दिया और एच.ए.एल. से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने के लिए प्रार्थनापत्र दे दिया। मुझे उम्मीद थी कि इंटरव्यू के समय तक मुझे प्रमाणपत्र मिल जाएगा। कुछ इसलिए भी कि इस पढ़ाई में एच.ए.एल. का एक पैसा भी खर्च नहीं होना था।
परन्तु एच.ए.एल. के कार्मिक विभाग का मैनेजर बहुत दुष्ट था। उसने मेरे प्रार्थनापत्र को जाने कहाँ छिपा दिया कि इंटरव्यू का काॅल आ गया, परन्तु प्रमाणपत्र नहीं मिला और न कोई जवाब ही मिला। मैंने उस विभाग में जाकर पूछताछ की, तो वे टालमटोल करने लगे और आँय-साँय बोलने लगे। तब मैंने ऊपर जनरल मैनेजर (महा प्रबंधक) से शिकायत करने का निश्चय किया। मेरे विभाग के मुख्य प्रबंधक श्री आर.के. तायल यहाँ मेरी सहायता करने के बजाय मेरी शिकायत को ही रोकने की कोशिश करने लगे। मुझे बड़ा क्रोध आया। मुझे बिना अनापत्ति प्रमाणपत्र लिये ही इंटरव्यू देने दिल्ली जाना पड़ा।
वहाँ इंटरव्यू तो हो गया, परन्तु उन्होंने अनापत्ति प्रमाणपत्र माँगा, तो मैंने कह दिया कि मैं जाते ही 2-3 दिनों में भेज दूँगा। इंटरव्यू से लौटकर मैंने फिर भागदौड़ की। काफी कोशिशों से लगभग 8 दिन बाद मुझे वह प्रमाणपत्र मिला। मैंने तत्काल उसे दिल्ली भेजा, लेकिन वह बेकार गया, क्योंकि तब तक वे अपना चयन कर चुके थे। इस अनुभव के बाद मेरा एच.ए.एल. से मोह पूरी तरह भंग हो गया और मैं पहला मौका मिलते ही एच.ए.एल. छोड़ने का निश्चय कर चुका था।
ऐसी ही एक घटना श्री राजीव किशोर के साथ घट गयी थी। उनका चयन कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया की ओर से जापान में 6 माह की ट्रेनिंग हेतु हो गया था, परन्तु काफी भाग-दौड़ करने के बाद भी उन्हें एच.ए.एल. से अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं मिला। उन्होंने इसके लिए दिन-रात एक कर दी थीं और बहुत दौड़-धूप की थी। मैंने तो उनकी तुलना में कुछ भी नहीं किया था। फिर भी उन्हें अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं मिला, तो नहीं ही मिला और उनके हाथ से जापान में ट्रेनिंग पाने का दुर्लभ अवसर फिसल गया। ऐसी स्थिति में कौन एच.ए.एल. में रहना चाहेगा?
उन्हीं दिनों अर्थात् सन् 1987 में एच.ए.एल. में हमारे ही विभाग में ग्रेड 2 के पदों के लिए खुला चयन करने का विज्ञापन निकला। मुझे एच.ए.एल. में आये चार साल हो चले थे और टाइम स्केल के अनुसार मेरा प्रोमोशन 5 साल में होना था। इसलिए मैंने सोचा कि एक साल पहले ही प्रोमोशन पाने का यह अच्छा मौका है। अतः मैंने आवेदन कर दिया। मेरा इंटरव्यू भी अच्छा हुआ था, परन्तु पता नहीं क्यों मेरा चयन नहीं हुआ। उसमें बाहर के भी कई लोग इंटरव्यू देने आये थे, लेकिन उनमें से भी किसी का चयन नहीं हुआ। इस असफलता से मुझे बहुत निराशा हुई।
उसके कुछ समय बाद ही एच.ए.एल. के कोरापुट (उड़ीसा) डिवीजन में ग्रेड 2 के पदों के लिए आन्तरिक चयन हो रहा था। मैंने भी आवेदन किया था। मेरे साथ दास बाबू ने भी फार्म भरा था। वहाँ से इंटरव्यू का काॅल आया। मैं जाने को तैयार था। मैंने सोचा था कि प्रोमोशन हो जायेगा, तो बाद में लखनऊ में अपना स्थानांतरण करा लूँगा। लेकिन गोविन्द जी तथा विष्णु जी ने समझाया कि एक बार वहाँ जाने के बाद लखनऊ लौटना असम्भव होगा, इसलिए यहीं रहो। अतः मैं इंटरव्यू देने नहीं गया और बीमारी का बहाना बनाकर अवकाश पर चला गया।
इंटरव्यू में न जाने के कारण हमारे मैनेजर आचार्य जी मुझसे बहुत नाराज हुए थे, परन्तु मैंने चिन्ता नहीं की, क्योंकि एच.ए.एल. से मेरा मोह पूरी तरह भंग हो चुका था। बाद में जुलाई 1988 में ही टाइम स्केल से मेरा प्रोमोशन ग्रेड 2 में हुआ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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