आत्मकथा भाग-2 अंश-20
प्रचारकगण ही नहीं बहुत से गृहस्थी स्वयंसेवक भी अपनी कर्मठता, निस्पृहता और सरलता से अन्य स्वयंसेवकों के सामने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करते हैं। यदि मैं अपने सम्पर्क में आये ऐसे स्वयंसेवकों की सूची बहुत कंजूसी से भी बनाऊँ, तो भी वह बहुत लम्बी हो जाएगी। फिर भी मैं लखनऊ के कुछ नामों का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगा।
इनमें पहला नाम है एक वकील साहब का। उनका पूरा नाम मुझे याद नहीं रहा (इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।) वे निशातगंज के आसपास के किसी स्थान के निवासी थे और मुख्य रूप से हिन्दू जागरण मंच में सक्रिय थे। एक बार हमारे नगर दयानन्द नगर (अर्थात् इन्दिरा नगर और उसके आस-पास का क्षेत्र) तथा उनके नगर की सम्मिलित शाखा दशहरे के दिन उनके नगर की एक शाखा के संघ स्थान पर (शायद बादशाह नगर में) हुई। उस समय तक मैं अपने नगर से बाहर के किसी स्थान पर नहीं गया था। शाखा के बाद वकील साहब ने मुझसे कहा- ”प्राचीन काल में राजा लोग विजयादशमी के दिन सीमोल्लंघन किया करते थे। आज आपने भी सीमोल्लंघन किया है।“ यह सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे नहीं पता कि उन्हें यह तथ्य कैसे ज्ञात था कि मैं पहली बार अपने नगर से बाहर की शाखा में आया हूँ।
लेकिन यहाँ उनका ससम्मान उल्लेख करने का कारण यह घटना नहीं है, बल्कि एक दूसरी घटना है। एक दिन हमारा एक दिवसीय शिविर निराला नगर के सरस्वती शिशु मंदिर में लगा था। वहाँ अन्य कार्यक्रमों और खेलों के साथ कबड्डी भी हुई थी। कबड्डी खेलते-खेलते उन वकील साहब को प्रतिपक्षी दल ने पकड़कर कुछ इस तरह पटका कि उनकी जाँघ में फ्रैक्चर हो गया। खेल रुक गया और उनको अस्पताल ले जाने का प्रबंध किया जाने लगा। सब लोग चिन्तित हो उठे थे। तभी मा. स्वांत जी ने तनाव दूर करने के लिए एक सामूहिक गीत गवाना प्रारम्भ कर दिया। वे वकील साहब भी एक पेड़ के नीचे पड़े हुए गीत दोहरा रहे होंगे।
गीत के बाद जब सबने ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया, जो सबसे जोर की आवाज वकील साहब की आयी। उसे सुनकर सब चौंक गये। मैं सोच रहा था कि इनमें कितनी जिजीविषा है कि अभी-अभी हड्डी तुड़वाकर पड़े हैं, फिर भी किसी खेद या शिकायत के बिना भारत माता का जयकारा लगा रहे हैं। मैंने मन ही मन अनेक बार उन्हें प्रणाम किया। वे वकील साहब लगभग 2-3 माह बिस्तर पर पड़े रहे। उनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके परिवार की सहायता के लिए स्वयंसेवकों ने यथासंभव अंशदान किया था। बाद में वे स्वस्थ होकर फिर संघकार्य में रम गये। संघ के कार्यक्रमों में प्रायः उनके दर्शन होते थे। आजकल वे कहाँ हैं, मुझे नहीं पता। मैं यहीं से उन्हें अपने शतशः प्रणाम अर्पित कर रहा हूँ।
एक अन्य स्वयंसेवक जिनका उल्लेख मैं यहाँ करना चाहता हूँ, वे हैं श्री नन्द किशोर श्रीवास्तव। वे पहले ‘स्वतंत्र भारत’ समाचारपत्र में एक साधारण पत्रकार थे। उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत साधारण थी। परन्तु वे कर्मठता और निष्ठा के धनी थे। इसमें वे किसी प्रचारक से भी कम नहीं ठहरते। वे लखनऊ महानगर के कार्यवाह थे। संघ का कोई भी कार्यक्रम होने पर वे सबसे पहले पहुँचकर व्यवस्था सँभाल लेते थे। मैं बहुत दिनों तक उन्हें प्रचारक ही समझता रहा था। मेरा उनसे सामान्य-सा ही परिचय था, कोई घनिष्टता नहीं। फिर भी मैं उनका उल्लेख कर रहा हूँ, तो एक घटना के कारण जिससे उनकी महानता का परिचय मिलता है।
एक बार हमारे लखनऊ संभाग के नगर-स्तरीय कार्यकर्ताओं का तीन दिवसीय शीत शिविर साकेत (अयोध्या/फैजाबाद) में लगना निश्चित हुआ था। यह शायद सन् दिसम्बर 1985 की बात है। मैं उस समय नगर में कोई दायित्व नहीं निभा रहा था, इसलिए पहले मुझे शिविर में जाने की अनुमति नहीं मिली। लेकिन मैं उन दिनों पांचजन्य साप्ताहिक और राष्ट्रधर्म मासिक का वितरण करता था, इसलिए मेरे आग्रह पर मुझे भी नगर का साहित्य प्रमुख मानकर शिविर में भाग लेने की अनुमति दे दी गयी। लखनऊ महानगर के कार्यकर्ता दो बसों में भरकर साकेत की ओर चले। रास्ता लम्बा होने के कारण मार्ग में भोजन के लिए पूड़ी और अरबी की सूखी सब्जी बनवाकर साथ रख ली गयी।
रास्ते में एक छोटे से चाय के ढाबे पर हमारा काफिला रुका। नन्द किशोर जी ने पूड़ी वितरण का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। प्रत्येक कार्यकर्ता को 4 पूड़ियाँ और थोड़ी सी सब्जी दी जा रही थी। उसी को सब प्रसन्नतापूर्वक खा रहे थे। मैंने भी इसी प्रकार अपना भोजन उदरस्थ कर लिया।
बाँटते-बाँटते जब सबको पूड़ी-सब्जी मिल गयीं, तो नन्द किशोर जी के पास अपने लिए मात्र 4 पूड़ियाँ और इतनी सी सब्जी बची कि उससे एक पूड़ी ही मुश्किल से खायी जा सकती थी। किसी तरह उन्होंने उसी सब्जी से दो पूड़ियाँ निगलीं। तब मैंने आश्चर्य से देखा कि उन्होंने चाय वाले से सहजतापूर्वक जरा सा नमक माँगा और फिर उसी नमक से लगा-लगाकर बाकी दोनों पूड़ियाँ खा गये। न कोई खेद, न कोई शिकायत। मैं कुछ दूर से चुपचाप यह देख रहा था। देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गये। ऐसे कार्यकर्ता की महानता का वर्णन कौन कर सकता है?
श्री नन्द किशोर जी अब अपनी अखबार की नौकरी से रिटायर हो चुके हैं और विश्व संवाद केन्द्र, लखनऊ में संवाद केन्द्र पत्रिका के सम्पादन का दायित्व सँभाल रहे हैं।
(पादटीप- कुछ दिनों पूर्व ही माननीय नन्द किशोर जी श्रीवास्तव का स्वर्गवास हो चुका है।)
(पादटीप- कुछ दिनों पूर्व ही माननीय नन्द किशोर जी श्रीवास्तव का स्वर्गवास हो चुका है।)
मैं संघ में अपनी सक्रियता के काल में ऐसे एक-दो नहीं, दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आया हूँ, जो अपनी सज्जनता, सरलता, निरभिमानता, कर्मठता और संघनिष्ठा के कारण सबके प्रेरणास्रोत बने रहते हैं। मैंने संघ निर्माता डाॅ. हेडगेवार को नहीं देखा है और न परमपूज्य श्री गुरुजी को प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य मिला है। इनके बारे में केवल पढ़ा ही है। लेकिन ऐसे स्वयंसेवकों को देखकर मैं डाॅ. साहब और श्री गुरुजी की महानता की कल्पना कर सकता हूँ। ऐसे ही कार्यकर्ताओं के कारण संघ तमाम अवरोधों को पार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ रहा है और बढ़ता जा रहा है।
इस शिविर में साकेत पहुँचने पर कुछ कार्यकर्ताओं ने श्रीराम जन्मभूमि पर बने हुए मन्दिर में दर्शन करने का विचार किया। मैं हालांकि मूर्तिपूजा नहीं करता, लेकिन श्रीराम जन्मभूमि देखने के लिए मैं भी उनके साथ लग लिया। हमारे काफिले में मुख्य रूप से श्री स्वांत जी, मा. ब्रज मोहन जी, मा. सुरेश चन्द्रा जी, गया प्रसाद जी मिश्र आदि शामिल थे। गलियों में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का कीर्तन करते हुए हम मन्दिर तक पहुँचे और वहाँ सीखचों के बाहर से ही श्री राम लला के विग्रह के दर्शन किये। उस दरवाजे पर एक पुराना बड़ा-सा ताला लटक रहा था, जिसे खोलने का आन्दोलन उन दिनों चल रहा था। मैंने उस ताले को उसी समय तोड़ देने की इच्छा व्यक्त की, तो मा. स्वांत जी और ब्रज मोहन जी ने मना कर दिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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