आत्मकथा भाग-2 अंश-15
लखनऊ में रहते हुए मैं संघ कार्य में अधिक गम्भीरता से लगा। ज.ने.वि. में मैं शाखा अवश्य नियमित जाता था, परन्तु उसके अलावा और कोई संघ कार्य नहीं किया था। लेकिन लखनऊ आने पर मुझे संघकार्य में जुटने का पूरा अवसर मिला। वहाँ के संघ कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में मैं कैसे आया, इसका उल्लेख ऊपर कर चुका हूँ। एच.ए.एल. में मेरे ही सेक्शन में श्री विष्णु कुमार गुप्त संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थे और इनके अलावा श्री कृष्ण चन्द्र पंत भी स्वयंसेवक थे। इसलिए संघ की सभी सूचनाएँ मेरे पास तत्काल पहुँच जाती थीं और विष्णु जी के साथ स्कूटर पर जाकर मैं सभी कार्यक्रमों में शामिल होता था। संघ के अधिकांश कार्यक्रम रविवार अथवा किसी अन्य अवकाश के दिन रखे जाते हैं, इसलिए हमें उन कार्यक्रमों में शामिल होने में कोई कठिनाई नहीं होती थी।
हमारी शाखा भूतनाथ मंदिर के पास पानी की टंकी के सामने से बी-ब्लाॅक चौराहे की तरफ जाने वाली मुख्य सड़क पर एक तिकोने पार्क में लगती थी। हमारी शाखा का नाम दुर्गा शाखा था और नगर का नाम दयानन्द नगर था, जिसमें समस्त इंदिरा नगर, सर्वोदय नगर और आस-पास का क्षेत्र भी शामिल था। हमारी शाखा इस नगर की सबसे प्रमुख और नियमित लगने वाली शाखा थी।
हमारे नगर संघचालक थे श्री यशोदा नन्दन माहेश्वरी, जो लोहे के फाटक, खिड़की आदि बनाया करते थे। वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ चुके थे और वहाँ की काफी बातें बताया करते थे। वे वनस्पति विज्ञान के बहुत अच्छे जानकार थे और किसी भी पेड़-पौधे को दूर से देखकर तत्काल ही उसका नाम और गुण बता देते थे। उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था। वे प्रतिदिन 10 सूर्य नमस्कार करते थे और तब शाखा आते थे। जब तक मैं और वे लखनऊ में रहे, तब तक हम नियमित शाखा में आया करते थे। फिर मेरा स्थानांतरण वाराणसी हो गया और हमारा साथ छूट गया। वे मेरे विवाह में शामिल होने लखनऊ से आगरा भी आये थे। तभी उनके अन्तिम दर्शन हुए थे। बाद में वे अपने पुत्र के पास दिल्ली चले गये, जो टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में प्रसार व्यवस्थापक (सर्कुलेशन मैनेजर) थे। कुछ समय बाद सुना गया था कि दिल्ली में जल्दी ही उनका स्वर्गवास हो गया।
हमारे नगर कार्यवाह प्रारम्भ में श्री गोविन्द राम अग्रवाल थे। बाद में क्रमशः कई लोग नगर कार्यवाह बने, उनमें प्रमुख नाम है श्री प्यारेलाल कनौजिया का। वे बाद में दो बार नगर पार्षद भी चुने गये थे। हमारी शाखा के प्रमुख स्वयंसेवकों के नाम हैं- सर्वश्री दुर्गा प्रसाद पाण्डेय (जो बाद में नगर पार्षद भी बने), नन्दलाल राजानी, जय पाल सिंह, राजेन्द्र गौतम, राजेन्द्र सिंह बघेल (जो बाद में विद्या भारती में विद्यालय निरीक्षक और उससे भी ऊँचे पदों पर पहुँचे), टी. पोपटानी आदि। मेरी इन सबके साथ पर्याप्त घनिष्टता थी।
हमारी शाखा के अलावा दयानन्द नगर की अन्य शाखाओं से जुड़े हुए जो प्रमुख संघ कार्यकर्ता थे, उनमें श्री राम उजागिर सिंह का स्मरण न करना अक्षम्य होगा। वे उस समय सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य थे, जो एक किराये के मकान में चलता था। अपने परिश्रम से उन्होंने उस विद्यालय को न केवल आत्मनिर्भर बना दिया था, बल्कि एक जगह रियायती जमीन खरीदकर उस पर विद्यालय का अपना भवन भी बना लिया था। मैंने अब तक जिन संघ कार्यकर्ताओं के साथ कार्य किया है, उनमें श्री राम उजागिर सिंह जी का नाम सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ताओं में भी काफी ऊपर लिखना चाहूँगा। उनके साथ मेरे अनेक संस्मरण हैं। सन् 1983 में हम प्रयाग के शीत शिविर में गये थे। वहाँ उनके साथ उनके विद्यालय का एक छात्र भी गया था। उस विद्यार्थी के साथ राम उजागिर जी का व्यवहार ऐसा पितृवत् था कि मैं उस विद्यार्थी को उनका पुत्र ही समझता रहा। काफी बाद में मुझे पता चला कि वह उनका पुत्र नहीं, छात्र था। ऐसे आचार्य की महानता का वर्णन कौन कर सकता है?
एक बार इन्दिरा नगर के सरस्वती शिशु मंदिर की आर्थिक सहायता के लिए एक कार्यक्रम ‘गीत रामायण’ का आयोजन किया गया था। उस कार्यक्रम में शेखर सेन और कल्याण सेन नामक संगीतकार बन्धुओं ने स्वरचित गीतों के माध्यम से सम्पूर्ण रामायण को साकार कर दिया था। इस कार्यक्रम के टिकट बेचने और कार्यक्रम की व्यवस्था में मैंने भी थोड़ा बहुत सहयोग किया था, लेकिन मुख्य परिश्रम राम उजागिर जी का ही था। मैंने इस कार्यक्रम के अवसर पर एक स्मारिका का सम्पादन भी आचार्य श्री अवधेश कुमार सिंह के साथ मिलकर किया था। यह कार्यक्रम आशा से अधिक सफल रहा और शिशु मंदिर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी। श्री राम उजागिर सिंह जी का स्थानांतरण बाद में बस्ती जिले में हो गया था। उनसे बाद में भी मेरी कई बार भेंट हुई है, लेकिन इस समय कोई सम्पर्क नहीं है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एच.ए.एल. में सेवा करने वाले कई अन्य व्यक्ति भी सक्रिय थे। उनमें प्रमुख नाम हैं- सर्वश्री प्रभाकर भाटे, अशोक राय, सरदार मनजीत सिंह तथा जगदीश नारायण। इनमें श्री भाटे अधिकारी थे और अन्य सभी कर्मचारी वर्ग के थे। श्री भाटे बाद में महामना मालवीय मिशन में बहुत सक्रिय रहे। जगदीश जी जल्दी ही एच.ए.एल. छोड़ गये थे और उत्तर प्रदेश सरकार के किसी विभाग में जूनियर इंजीनियर हो गये थे। एक बार रेलगाड़ी में वाराणसी से लखनऊ आते समय प्रतापगढ़ के पास उनसे मेरी भेंट हुई थी। अशोक राय जी भारतीय मजदूर संघ के नेता थे और हालांकि एच.ए.एल. में उनकी यूनियन का अधिक प्रभाव नहीं था, फिर भी वे काफी सम्मानित थे। सरदार मंजीत सिंह भी भारतीय मजदूर संघ में सक्रिय थे और नियमित रूप से संघ के कार्यक्रमों में आते थे।
मंजीत सिंह जी के एक पुत्र हैं, जिनका नाम है ‘लखवीर सिंह’। मैंने एक दिन उससे पूछा कि आपके नाम का क्या अर्थ है, तो वह नहीं बता सका। तब मैंने बताया कि इसके दो अर्थ हैं। एक अर्थ है- ‘वह जो केवल देखने में ही वीर हो।’ यह अर्थ नकारात्मक है। दूसरा और सही अर्थ है- ‘वह जो लाखों लोगों के बराबर वीर हो।’ गुरु गोविन्द सिंह जी ने कहा था- ‘सवा लाख ते एक लड़ाऊँ’ अर्थात् एक-एक सिख वीर में सवा लाख सैनिकों वाली मुगलों की सेना से लड़ने की हिम्मत और ताकत है। इसी अर्थ में ‘लखवीर’ शब्द बना है। अपने नाम का यह अर्थ जानकर वह आश्चर्यचकित रह गया था।
एच.ए.एल. में एक उच्च अधिकारी भी स्वयंसेवक थे। उनका नाम था श्री अरुणाकर मिश्र। वे बहुत योग्य थे और कम उम्र में ही मुख्य प्रबंधक जैसे ऊँचे पद पर पहुँच गये थे। जब मैं एच.ए.एल. में आया था, तब वे वरिष्ठ प्रबंधक थे। वे प्रारम्भ से ही स्वयंसेवक थे और एक शाखा के मुख्य शिक्षक भी रहे थे। वे गीत बहुत अच्छा गाते थे और प्रायः गुरुदक्षिणा कार्यक्रम में एकल गीत सुनाया करते थे। उनके एक पुत्र था, जो बहुत होशियार था। एक या दो बार मैं उनके घर भी गया था। उनके साथ मेरी बहुत घनिष्टता तो नहीं थी (क्योंकि वे मुझसे काफी ऊँचे पद पर थे), फिर भी संघ के स्वयंसेवकों में जैसे आत्मीय सम्बंध होने चाहिए थे, हमारे सम्बंध वैसे ही थे।
लेकिन एक बार जब उन्होंने अपने पुत्र का जन्म दिन मनाया था, तो संघ के सभी लोगों को बुलाया था, एच.ए.एल. के अन्य बहुत से लोगों को भी बुलाया था, लेकिन मुझे भूल गये। जो लोग उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे और मुझे जानते थे, उन्हें भी आश्चर्य हुआ था कि मुझे क्यों नहीं बुलाया गया। मुझे भी काफी बुरा लगा था। इसलिए कुछ समय बाद जब उनका स्थानांतरण लखनऊ से बंगलौर हुआ, तो मैं उनसे मिलने भी नहीं गया। उसके लगभग एक साल बाद जब वे लखनऊ किसी काम से आये थे और हमारे कम्प्यूटर सेक्शन में पधारे थे, तो मेरी उनसे औपचारिक नमस्ते मात्र हुई थी। बाद में सुना गया कि उन्होंने बंगलौर में एच.ए.एल. छोड़कर अपनी कम्पनी खोल ली थी। उनके भाई संगीतकार थे और उस समय शेखर सेन-कल्याण सेन के साथ रहकर उनके कार्यक्रमों में तानपूरा या सितार बजाया करते थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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