आत्मकथा भाग-2 अंश-14

हमारे सेक्शन में चार महिला ऑपरेटर भी थीं। उनमें से श्रीमती कैलाश विरमानी सबसे अधिक सुन्दर थीं, लेकिन बुढ़ापे का प्रभाव आने लगा था। इसलिए होली पर प्रायः उन्हें यह टाइटिल दिया जाता था- ‘खंडहर बताते हैं कि इमारत बुलन्द थी।’ उनके दो प्यारी-प्यारी बच्चियाँ हैं- मोना और सोना। वे नादान महल इलाके में रहती थीं। एक बार मैं उनके घर भी गया था।
दूसरी, श्रीमती निर्मला दिनकर तमिल ईसाई थीं और एन.डी. के नाम से पुकारी जाती थीं। उनके पति एच.ए.एल. में प्रबंधक थे। बाद में वे दोनों कोरबा डिवीजन में चले गये थे और वहाँ से शायद बंगलौर। तीसरी, श्रीमती के.सी. उषा भी दक्षिण भारतीय थीं और अच्छा कार्य करती थीं। उनके पति श्री जी. कुमार भी एच.ए.एल. में अधिकारी थे। उनके एक प्यारी-सी बच्ची थी, जिसका नाम उन्होंने ‘जीशा’ रखा था अर्थात् पिता के नाम का पहला अक्षर और माता के नाम का अन्तिम अक्षर मिलाकर उन्होंने उसका नाम बनाया था। वह बच्ची शायद एयर होस्टेस बन गयी थी। एक बार एक फ्लाइट से उतरते समय मैंने उसको देखा था, लेकिन मैं उससे बात नहीं कर पाया। इसका मुझे आज तक अफसोस है।
चौथी और सबसे ज्यादा लोकप्रिय ऑपरेटर थीं श्रीमती उषा पांडेय। उनके पति भी एच.ए.एल. में कार्य करते थे। उषा पांडेय देखने में कुछ साँवली थीं, परन्तु बहुत हँसमुख थीं। उनके चेहरे पर हर समय मुस्कान खेलती रहती थी। काम भी वे अच्छा करती थीं तथा गजलें बहुत अच्छी तरह गाती थीं। उनके ऊपर मैंने एक बार एक कविता लिखी थी, जो एक पत्रिका ‘खिले अधखिले’ में छप भी चुकी है। वह कविता इस प्रकार है-
तुम्हारी ये मोहक मुस्कान।
देती मौन प्रणय आमंत्रण, हर लेती है प्राण।।
एक महकता शीतल झोंका, आता है नित साथ तुम्हारे।
कण-कण को मदहोश बनाते, मदमाते नयना कजरारे।।
मँड़राते हैं भँवरे, करने को अधरों का पान।
तुम्हारी ये मोहक मुस्कान।।
श्याम केश घुँघराले करते हैं सबकी साँसों को सुरभित।
मचल-मचल जाता है मन, छूने को अंग तुम्हारे विकसित।।
तुम्हें देखकर, सुध-बुध खोकर, बन जाते नादान।
तुम्हारी ये मोहक मुस्कान।।
यह कविता मैंने पहले नये ऑपरेटर लड़कों को सुनायी थी। उनको यह बहुत पसन्द आयी थी। उन्हीं में से किसी ने यह कविता मुझसे लेकर उषा जी को सुना दी थी। उनकी प्रतिक्रिया क्या रही, यह तो मुझे पता नहीं, परन्तु वे मुझसे नाराज नहीं हुई थीं। एक बार उन्होंने अपनी पुत्री का जन्म दिन मनाया था और सबको बुलाया था। तब अधिकारियों में से केवल मैं उनके यहाँ पहुँचा था।
ऑपरेटर कर्मचारियों के अलावा वहाँ दो चपरासी भी थे। उनमें से एक थे श्री अशोक कुमार पांडेय। वे प्रारम्भ में तो ठीक थे, लेकिन बाद में बहुत कामचोरी करने लगे थे। सभी अधिकारी और प्रबंधक उनसे असंतुष्ट रहते थे। उनके पिताजी भी एच.ए.एल. में चपरासी थे और उनके सिर पर श्री तायल साहब का हाथ भी था, इसलिए वे किसी को कुछ नहीं समझते थे और काम में कोताही करते थे। वैसे मेरे साथ उनका संबंध ठीक था और वे मेरी बहुत इज्जत करते थे।
दूसरे चपरासी जो बाद में आये थे वे थे श्री श्याम लाल। वे बहुत सज्जन और मेहनती थे। प्रारम्भ में वे बिल्कुल अनपढ़ थे। ककहरा भी ठीक से नहीं जानते थे। इसलिए मैंने उनसे कहा कि आप मेरे साथ आधा घंटा रोज बैठा करो, मैं हिन्दी और गणित सिखा दूँगा। वे राजी हो गये और एक-दो हफ्ते तक मुझसे पढ़े भी। फिर वे अपने घर पर अपने ही बच्चों से पढ़ने लगे और कुछ महीने बाद अखबार भी पढ़ने लग गये थे।
एक बार हमारे विभाग में कम्प्यूटर की ट्रेनिंग का कोर्स हुआ। कोर्स लगभग एक-डेढ़ माह लम्बा था और एक-एक हफ्ते के कई भागों में बँटा था। हम सभी अधिकारी अलग-अलग भागों के लिए नामांकित किये गये थे। उस कोर्स में अन्य मंडलों के कुछ अधिकारी भी आये थे। तब श्री श्याम लाल रोज तीन-चार बार सबके लिए स्पेशल चाय लेकर आते थे। कोर्स के समापन के दिन मैंने कहा था कि इस सेक्शन में श्री श्याम लाल अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने सभी कोर्स नियमित रूप से और पूरी गम्भीरता से अटेंड किये हैं। इस पर सब लोग खूब हँसे थे।
ये थे मेरे एच.ए.एल. के कम्प्यूटर विभाग के संगी-साथी। विभाग के बाहर के भी अनेक सज्जनों से मेरा घनिष्ट परिचय था। उन सबकी सूची तो बहुत लम्बी हो जाएगी और सम्भव है कि कई नाम मैं भूल भी जाऊँ। इसलिए उनके नामों का उल्लेख नहीं करूँगा। इसके लिए उनसे क्षमा चाहता हूँ। लेकिन अपने आगरा के चार मित्रों के बारे में अवश्य लिखूँगा, जिनके साथ मेरे अच्छे सम्बंध थे और जो मेरे पड़ोसी भी थे।
उनके नाम हैं सर्वश्री मदन मोहन वर्मा, योगेश कुमार शर्मा, विजय कुमार सिंह और देवेन्द्र कुमार जैन। ये सभी आगरा के हैं और इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद एच.ए.एल. में सर्विस कर रहे हैं। सभी एक साथ डिजायन विभाग में थे, जहाँ पुर्जों की डिजायन तैयार की जाती है। वर्मा जी से मेरा परिचय अपने मित्र श्री दिवाकर खरे के बड़े भाई श्री प्रभाकर खरे के माध्यम से हुआ था, जिनका जिक्र ऊपर कर चुका हूँ। सबसे पहले वर्मा जी ने ही मुझे इन्दिरा नगर में कमरा दिलवाया था। इनके साथ मेरी बहुत घनिष्टता थी। कई बार हम मिलकर खाना बनाते-खाते थे। ये सभी इन्दिरा नगर के ए-ब्लाॅक में पास-पास के घरों में रहते हैं। वहीं शर्मा जी ने मुझे भी एक कमरे का मकान किराये पर दिलवाया था, जिसमें मैं करीब डेढ़ साल रहा था।
वर्मा जी का विवाह मेरे सामने ही हुआ था, परन्तु उनकी शादी में मैं शामिल नहीं हो सका था। वास्तव में मैं उनकी बारात में शामिल होने ही लखनऊ से आगरा गया था, परन्तु दुर्भाग्य से उससे पिछली रात को ही मेरे 8 दिन के भतीजे (बड़े भाईसाहब श्री महावीर प्रसाद के नवजात पुत्र) की मृत्यु हो गई थी। इसी शोक के कारण मैं वर्मा जी के विवाह में नहीं जा सका। इसका मुझे आज तक दुःख है।
पहले जब मैं वाराणसी से लखनऊ आता था, तो कई बार वर्मा जी या शर्मा जी के यहाँ ही ठहरता था। लेकिन जब से कानपुर आया हूँ, तब से मिलना कम हो गया है, क्योंकि मैं घंटे-दो घंटे के लिए ही लखनऊ जाता हूँ और काम पूरा होते ही उसी दिन वापस कानपुर आ जाता हूँ।
(पादटीप- अब तक मेरे उपरोक्त सभी पड़ोसी मित्र रिटायर हो गये हैं और लखनऊ में ही उन्हीं घरों में रहते हैं।)
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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